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ngt clears great nicobar mega project development vs environment Strait of Malacca Indo-Pacific Strategy
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विकास बनाम पर्यावरण: एनजीटी की ग्रेट निकोबार परियोजना को मंजूरी, विकास और पर्यावरण संतुलन की नई मिसाल
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) का ग्रेट निकोबार परियोजना को हरी झंडी देना ‘विकास बनाम पर्यावरण’ की बहस में एक अहम मोड़ है। यह निर्णय, खासकर पारिस्थितिकी के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों में प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु हो सकता है।
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राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा ग्रेट निकोबार मेगा स्ट्रक्चर परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी को बरकरार रखने का निर्णय एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जो विकास व पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की जटिल चुनौती का समाधान प्रस्तुत करता है। उल्लेखनीय है कि एनजीटी की विशेष बेंच ने कई याचिकाओं और पर्यावरणीय चेतावनियों को खारिज करते हुए कहा है कि परियोजना में पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं और इसके रणनीतिक महत्व को देखते हुए हस्तक्षेप का कोई ठोस आधार नहीं बनता। इस निर्णय के साथ ही करीब 81 हजार करोड़ रुपये की इस मेगा परियोजना के आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हो गया है, पर सख्त शर्तों के साथ। गौरतलब है कि ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित इस परियोजना के तहत, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एकीकृत टाउनशिप, सिविल व सैन्य हवाई अड्डा और एक ऊर्जा संयंत्र शामिल है, करीब दस लाख पेड़ों की कटाई होनी है। हालांकि, एनजीटी ने यह स्पष्ट किया है कि पर्यावरण मंजूरी में पहले से ही लेदरबैक समुद्री कछुए, निकोबार मेगापोड पक्षी, प्रवाल भित्तियों, मैंग्रोव वनों और शोम्पेन व निकोबारी जनजातियों के संरक्षण के पर्याप्त प्रावधान हैं। साथ ही, अधिकारियों को पर्यावरणीय मंजूरी की शर्तों, द्वीप तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019 तथा अन्य मानकों का सख्त अनुपालन सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए हैं। उल्लेखनीय है कि ग्रेट निकोबार मलक्का जलडमरूमध्य के निकट है, जो वैश्विक व्यापार का व्यस्ततम मार्ग भी है। यहां बंदरगाह और हवाई अड्डा बनने से देश की समुद्री निगरानी, रक्षा क्षमता व हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उपस्थिति मजबूत हो सकेगी, जिससे चीन के बढ़ते प्रभाव से मुकाबला करने में भी मदद मिलेगी। आर्थिक दृष्टि से देखें, तो यह अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट का हब बन सकता है, जिससे व्यापार बढ़ेगा और क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी। विकास परियोजनाओं के संदर्भ में यह देखा गया है कि पर्यावरणीय शर्तें अक्सर परियोजना शुरू होने के बाद गौण हो जाती हैं। ऐसे में, इस आदेश के बाद भी परियोजना की निरंतर निगरानी और पारदर्शी क्रियान्वयन अनिवार्य होगा। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में द्वीपीय क्षेत्रों की बढ़ती संवेदनशीलता का भी ध्यान रखना होगा, क्योंकि अगर पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता है, तो उसका प्रभाव केवल स्थानीय पारिस्थितिकी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह दीर्घकालिक आर्थिक व मानवीय संकट का कारण बन सकता है। वस्तुत: विकास को पूरी तरह रोक देना समाधान नहीं हो सकता। अत: इस परिप्रेक्ष्य में एनजीटी का निर्णय न केवल इस मेगा परियोजना, बल्कि भविष्य की रणनीतिक महत्व वाली, खासकर पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु हो सकता है।
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