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राजनीतिक जमीन पर नया सूबा
मार्क टुली
Updated Wed, 31 Jul 2013 09:08 PM IST
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अलग तेलंगाना राज्य के गठन का फैसला पूरी तरह से राजनीतिक है। ऐसे किसी भी फैसले को अंतिम रूप देने से पहले सरकार को व्यापक हितों को ध्यान में रखना चाहिए था। देश भर में कई अन्य छोटे राज्यों की मांग को लेकर छोटे-बड़े आंदोलन चल रहे हैं। अब इस फैसले के बाद हरित प्रदेश, विदर्भ, पूर्वांचल, गोरखालैंड, बुंदेलखंड, बोडोलैंड जैसे कई छोटे राज्यों की मांग ने जोर पकड़ लिया है। जाहिर है, इससे न सिर्फ राजनीतिक उथल-पुथल तेज होगी, बल्कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी विभिन्न राज्यों के लिए चुनौती से कम नहीं होगा। यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि विभिन्न राज्यों के बंटवारे के विरोध में भी कई आंदोलन सक्रिय हैं।
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आंध्र के बाकी हिस्से के लोगों में इस फैसले को लेकर आक्रोश होना स्वाभाविक है। असली सवाल हैदराबाद का है, जिसे आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की संयुक्त राजधानी बनाया गया है। हैदराबाद शहर और उसके आसपास के इलाके से राज्य के राजस्व का 55 प्रतिशत हिस्सा आता है। सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में यह शहर दुनिया भर में मशहूर है। राज्य के बंटवारे का विरोध करने वाले आंध्र और रायलसीमा के लोगों का तर्क है कि आंध्र प्रदेश की स्थापना के बाद से हैदराबाद का जो विकास हुआ है, उसमें उनका भी हिस्सा है। हरियाणा और पंजाब के मामले में चंडीगढ़ को संयुक्त राजधानी बनाने जैसा फॉर्मूला यहां सफल हो पाएगा, इसमें भी संशय है।
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नए बने छोटे राज्यों के लोग बहुत खुश हैं, ऐसा भी नहीं है। अभी मैं देहरादून में था, तो वहां लोगों की शिकायत थी कि नया राज्य बनने से उन्हें आखिर मिला क्या? छोटे राज्यों के समर्थक मानते हैं कि इससे विकास होता है, लेकिन अब तक ऐसा कोई सुबूत मिला तो नहीं है।
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अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने 2000 में तीन नए राज्यों- झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड का गठन किया था। लेकिन अस्तित्व में आने के 13 साल बाद भी ऐसा नहीं दिखता कि ये राज्य विकास और सुशासन की कोई नई परिभाषा गढ़ रहे हैं। झारखंड बुरी तरह से राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा है। एक निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा को भी परिस्थितिवश वहां का मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है। हाल ही में हेमंत सोरेन ने राज्य के नौवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है। राजनीतिक अस्थिरता का संकट तेलंगाना में भी आ सकता है। कांग्रेस, तेलंगाना राष्ट्र समिति और तेलुगू देशम पार्टी इस क्षेत्र के प्रमुख राजनीतिक दल हैं। पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में भाजपा काबिज है। वह भी तेलंगाना में पैठ बनाने की पूरी तैयारी में है। इसीलिए वह अलग तेलंगाना राज्य का समर्थन कर रही है। इस तरह राज्य में चार प्रमुख राजनीतिक दल चुनावी जंग में होंगे, तो हालात झारखंड जैसे हों, तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।
अब सवाल यह है कि कांग्रेस को इस फैसले का कितना चुनावी लाभ होगा। आंध्र प्रदेश में विधानसभा की कुल 294 सीटें थीं। अब 119 सीटें तेलंगाना में आ चुकी हैं। वहीं आंध्र प्रदेश की कुल 42 लोकसभा सीटों में से 17 नए राज्य के हिस्से में आएंगी। कांग्रेस का सारा दांव यहीं है, क्योंकि राज्य के बाकी हिस्सों में जगन मोहन रेड्डी की वाईआरएस कांग्रेस और तेलुगू देशम पार्टी का वर्चस्व है। कांग्रेस नए राज्य के गठन का श्रेय लेकर तेलंगाना में सीटें झटकने की जुगत में है, पर मौजूदा हालात को देखते हुए लगता है कि ज्यादा फायदा टीआरएस को ही होगा, क्योंकि राज्य गठन के लिए व्यापक आंदोलन उसी ने चलाया। साथ ही, राज्य गठन के फैसले में लेटलतीफी का खामियाजा भी कांग्रेस को ही भुगतना पड़ सकता है। इतना ही नहीं, आंध्र के बाकी हिस्सों में कांग्रेस की रही-सही उम्मीदें अब ध्वस्त हो सकती हैं।
आंदोलन को देखकर अलग राज्य गठित करने की परंपरा खतरनाक साबित हो सकती है। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने इस फैसले का स्वागत करते हुए सूबे को चार हिस्सों में बांटने की वकालत की है। उनके कार्यकाल के दौरान राज्य विधानसभा एक ऐसा प्रस्ताव भी पारित कर चुका है। जबकि इस समय राज्य में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी राज्य के बंटवारे के खिलाफ है। ऐसे ही हालात कई अन्य राज्यों में भी हैं। दरअसल, इस तरह के फैसले सिर्फ राजनीतिक आधार पर नहीं लिए जाने चाहिए। नए राज्य के गठन के मामले में आर्थिक, सांस्कृतिक और अन्य पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए। केंद्र सरकार को नए राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन करके इस दिशा में बढ़ना चाहिए था।