गणतंत्र का चौथा संकट
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अनेक पश्चिमी पर्यवेक्षकों के अनुमान के विपरीत भारतीय गणराज्य एकजुट बना हुआ है। हालांकि सात दशकों में से उसने 1960, 70 और 80 के दशकों में तीन गंभीर संकटों का सामना किया। आज वह चौथे संकट का सामना कर रहा है।
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अनेक पश्चिमी पर्यवेक्षकों के अनुमान के विपरीत भारतीय गणराज्य एकजुट बना हुआ है। हालांकि सात दशकों में से उसने 1960, 70 और 80 के दशकों में तीन गंभीर संकटों का सामना किया। आज वह चौथे संकट का सामना कर रहा है।
जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है कि यदि भारत 1947 में कोई स्टार्ट अप होता तो, सर्वाधिक जोखिम उठाने वाला भी कोई उद्यमी पूंजीपति इसमें निवेश नहीं करता। किसी और नए राष्ट्र का जन्म ऐसी विषम परिस्थितियों में नहीं हुआ। देश का विभाजन ही अपने आप में भयावह था, जिसमें बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। बड़ी संख्या में लोग अपने घरों से विस्थापित हुए।
स्वतंत्रता मिलने के दो महीने बाद पाकिस्तान ने कश्मीर में घुसपैठिये भेजे, जिसकी वजह से युद्ध छिड़ गया। इसके बाद जनवरी, 1948 में एक हिंदू कट्टरपंथी ने राष्ट्रपिता की हत्या कर दी।
धार्मिक दक्षिणपंथ के इस हमले के बाद राजनीतिक वामपंथियों ने तब हमला कर दिया, जब महात्मा गांधी के निधन के महज छह महीने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने रूसी आकाओं के आदेश पर काम करते हुए भारतीय राज्य के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष शुरू कर दिया। यह सब खाद्य सामग्री के संकट, विदेशी मुद्रा की कमी और एक बड़ी तथा रणनीतिक रूप से अहम रियासत हैदराबाद द्वारा भारतीय संघ में जुड़ने से इनकार करने की पृष्ठभूमि में हुआ।
इन सबसे आखिर नवजात भारत कैसे निपटा? वह कई टुकड़ों में बिखर क्यों नहीं गया, जैसा कि अनेक पश्चिमी पर्यवेक्षकों ने दावा किया था? इसका जवाब उस समय के देश के असाधारण नेतृत्व में निहित है, जिसमें सरकार के भीतर आंबेडकर, नेहरू और पटेल जैसे नेता थे।
नागरिक समाज में कमलादेवी चट्टोपाध्याय, मृदुला साराभाई और अनीस किदवई थे और इनके साथ ही प्रतिभाशाली तथा बहुत शानदार तरीके से ध्यान केंद्रित करने वाले सरकारी अधिकारियों का एक समूह भी था। भारतीयों की इस विलक्षण पीढ़ी ने देश को राजनीतिक, भावनात्मक और सामाजिक रूप से एकजुट रखा और और इस एकता को एक दस्तावेज के जरिये वैधता प्रदान की, जिसे हम भारत का संविधान कहते हैं।
इन वर्षों में पैदा हुआ संकट
दूसरा संकट, 1970 के दशक के मध्य में पैदा हुआ, जब इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय ने भारतीय लोकतंत्र को भारी नुकसान पहुंचाया और खासतौर से पूरे उत्तर भारत में आतंक का शासन लागू कर दिया।
गणराज्य का तीसरा संकट, 1989 से 1992 के दौरान पैदा हुआ, जब इन वर्षों में हिंदू-मुस्लिम और जातिगत संघर्ष हुआ, इसके साथ ही विदेशी मुद्रा की कमी और केंद्र में जल्दी-जल्दी कई सरकारों के बनने-गिरने से यह संकट और बढ़ा।
मुझे इन तीनों संकटों में से प्रत्येक अच्छी तरह से याद है। 1960 के दशक में मैं देहरादून में एक छोटा लड़का था और ऐसे घर में बड़ा हो रहा था, जहां भारतीय वायुसेना के विमान ऊपर उड़ रहे होते थे और उनसे निकले धुएं से सब तरफ अंधेरा छा जाता था। हम मध्य वर्ग में आते थे, इसके बावजूद अनाज, दालों और खाने के तेल की कमी ने हमें भी बहुत परेशान कर दिया था।
नेहरू और शास्त्री की मौत को मेरे माता-पिता ने निजी क्षति की तरह महसूस किया, मानो वे हमारे परिवार के सदस्य रहे हों। 1970 के दशक में मैं दिल्ली में एक कॉलेज का छात्र था और एक सेंसर्ड अखबार पढ़ रहा था। साथ ही यूनिवर्सिटी कॉफी हाऊस में अकेले बैठे बकरे जैसी दाढ़ी रखे खुफिया ब्यूरो के एक अधिकारी से हम सतर्क थे, जो कि हमारी बातचीत को ध्यान से सुनने की कोशिश कर रहा था, जिसमें हम तुर्कमान गेट में मुस्लिमों के उत्पीड़न पर बात कर रहे थे।
1980 के दशक के आखिर और 1990 के दशक की शुरुआत में मैंने उत्तर भारत में अकादमिक यात्राएं करते हुए उन वर्षों में सामाजिक और धार्मिक ध्रुवीकरण के कारण हुई तबाही देखी।
दूसरी चीज जो मैं कहना चाहता हूं, वह यह कि संभवत: हम अब गणराज्य के इतिहास के चौथे गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। राज्य की अनेक अनावश्यक नीतियों ने हमारी सुधरती अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार दिया है, नागरिकों को एक दूसरे के खिलाफ भिड़ा दिया है और विश्व में भारत की हैसियत को नुकसान पहुंचाया है। पिछले साल मई में जब मोदी सरकार दोबारा निर्वाचित हुई, उस समय देश कुछ बड़ी संरचनात्मक समस्याओं का सामना कर रहा था।
इनमें, (1) बढ़ती बेरोजगारी और कृषि क्षेत्र की हताशा; (2) सार्वजनिक संस्थानों की गिरती क्षमता; (3) बढ़ती पर्यावरणीय गिरावट शामिल थीं। मई, 2019 के बाद से सरकार ने इन समस्याओं को सुलझाने के लिए कुछ नहीं किया। दूसरी ओर सरकार के कदमों ने देश के धार्मिक समुदायों और केंद्र तथा राज्यों के बीच विभाजन को गहरा कर समस्याओं को बढ़ाया ही है।
आखिर भारतीय गणराज्य अपनी स्थापना की 71वीं वर्षगांठ पर कैसा महसूस कर रहा है? इसका जवाब इस बात पर निर्भर है कि आप रह कहां रहे हैं। यदि मैं बरेली, गुवाहाटी या श्रीनगर में रह रहा होता, तो मैं संभवत: हालात को सचमुच भयावह पाता, यहां तक कि जीवन और राष्ट्र के लिए जोखिमभरा। अपेक्षाकृत शांत बंगलूरू में रहते हुए और संदेहपूर्ण मिजाज वाले एक इतिहासकार से इतर, मैं नहीं सोचूंगा कि हम सबके लिए कयामत बस आने ही वाली है।
इसके बावजूद, ऊपर की पंक्तियों में रेखांकित की गई संरचनात्मक समस्याओं के कारण, जिन्हें मौजूदा नीतियां और बदतर ही कर रही हैं, मैं यह मानता हूं कि भारतीय गणराज्य अपनी स्थापना के सत्तर साल बाद इस चौथे सबसे गंभीर संकट का सामना कर रहा है।
एक इतिहासकार वर्तमान को समझने के लिए अतीत का उपयोग कर सकता है, लेकिन एक इतिहासकार भविष्य का अनुमान नहीं लगा सकता। मैं यह नहीं कह सकता कि आने वाला यह पूरा साल या यह दशक भारत और भारतीयों के लिए कैसा होगा। लेकिन गणराज्य इतिहास के अत्यंत संकटपूर्ण चरण से गुजर रहा है, यह दिख रहा है। इसमें ऐसे प्रबुद्ध नेतृत्व का अभाव है, जो हमें संकटों से बाहर निकाल सके, यह और भी स्पष्ट रूप से दिख रहा है।