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जानना जरूरी है: ययाति स्वर्ग से गिरकर पुनः पहुंचे स्वर्ग, जानिए नहुष के पुत्र से जुड़ी प्रेरक कथा
Sun, 22 Dec 2024 05:33 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
आशुतोष गर्ग, लेखक एवं अनुवादक
आशुतोष गर्ग, लेखक एवं अनुवादक
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Sun, 22 Dec 2024 05:33 AM IST
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ययाति स्वर्ग से गिरकर पुनः पहुंचे स्वर्ग
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अमर उजाला
विस्तार
यह उस समय की बात है, जब राजा ययाति ने अपने छोटे पुत्र पुरु को उसका यौवन लौटाकर अपना बुढ़ापा उससे ले लिया था। इसके बाद पुरु को राजपाट सौंपकर ययाति तपस्या करने के लिए वन में चले गए। उसी तपस्या के बल पर उन्हें स्वर्ग में स्थान मिला और वह देवराज इंद्र के साथ आनंद से वहां रहने लगे। एक दिन इंद्र ने ययाति से पूछा, ‘नहुषनंदन! आपने गृहस्थाश्रम-धर्म का पालन करके वानप्रस्थाश्रम स्वीकार किया था। मैं आपसे पूछता हूं कि आप तपस्या में किसके समकक्ष हैं?’ इसके उत्तर में ययाति ने कहा, ‘देवता, मनुष्य, गंधर्व और महर्षियों में अपने समान तपस्वी मुझे कोई नहीं दिखाई पड़ता।’
ययाति का दंभपूर्ण दावा सुनकर इंद्र बोले, ‘राजन, आपने बड़े, छोटे लोगों और अपने समान सभी लोगों का तिरस्कार किया है। अपने मुख से अपनी प्रशंसा करने के कारण आपका पुण्य क्षीण हो गया है। इसलिए अब आप स्वर्ग में नहीं रह सकते। आपको पृथ्वी पर लौटना पड़ेगा।’ ययाति ने कहा, ‘ठीक है। यदि सबका अपमान करने से मेरा पुण्य क्षीण हो गया, तो मैं धरती पर संतों के बीच में ही गिरूं।’ इंद्र ने ययाति की इच्छा पूरी कर दी, जिसके फलस्वरूप राजा ययाति देवलोक से च्युत होकर उस स्थान पर गिरने लगे, जहां अष्टक, प्रतर्दन, वसुमान और शिवि नाम के तपस्वी तप करते थे।
ययाति को गिरते देखकर अष्टक ने कहा, ‘आपका रूप इंद्र के समान है। आपको गिरते देखकर हम चकित हैं। आप जहां तक आ गए हैं, वहीं ठहर जाइए। हम सत्पुरुषों के सामने इंद्र भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। दुखी और दीन पुरुषों के लिए संत ही परम आश्रय हैं। अपनी व्यथा हमें सुनाओ।’ ययाति ने कहा, ‘मैं समस्त प्राणियों का तिरस्कार करने के कारण स्वर्ग से च्युत हुआ हूं। मुझमें अभिमान था और अभिमान नरक का मूल कारण है। धन पाकर फूलना नहीं चाहिए। विद्वान होकर अहंकार नहीं करना चाहिए। दुख और सुख दोनों में समान रहना उचित है। मैं विधाता के विधान के विपरीत नहीं जा सकता, इसलिए संतुष्ट हूं।’
बातचीत के उपरांत ययाति ने कहा, ‘देवता शीघ्रता करने के लिए कह रहे हैं। मैं अब नीचे गिरूंगा। इंद्र के वरदान से मुझे आप जैसे सत्पुरुषों का समागम प्राप्त हुआ है’।
अष्टक ने कहा, ‘मुझे अपने पुण्य कर्मों से जो भी लोक प्राप्त होने वाले हैं, वे सब मैं आपको देता हूं, आप गिरें नहीं।’ परंतु ययाति ने अष्टक के पुण्य लेने से मना कर दिया और कहा, ‘मैं ब्राह्मण नहीं हूं, इसलिए दान नहीं ले सकता।’ फिर प्रतर्दन ने कहा, ‘मुझे जिन-जिन लोकों की प्राप्ति होने वाली है, मैं आपको देता हूं। आप यहां न गिरें, स्वर्ग में जाएं।’ लेकिन ययाति ने कहा, ‘मैं क्षत्रिय हूं और क्षत्रिय होकर दान लेना अधर्म है।’ फिर वसुमान बोले, ‘राजन! मैं अपने सभी लोक आपको देता हूं। आपको यदि दान लेने में संकोच होता है, तो आप एक तिनके के बदले में इन्हें खरीद लीजिए।’ परंतु ययाति बोले, ‘यह क्रय-विक्रय मिथ्या है। मैंने ऐसा मिथ्याचार कभी नहीं किया। इसलिए मैं यह काम नहीं करूंगा।’ अंत में शिवि बोले, ‘महाराज! मैं शिवि हूं। आप मेरे पुण्यों का फल स्वीकार कर लीजिए। मैं इन्हें आपको भेंट करता हूं।’ परंतु ययाति ने शिवि की बात भी नहीं मानी और कहा, ‘मैं दूसरे के पुण्य-फल का उपभोग नहीं कर सकता।’
उसी समय उन्हें आकाश में पांच स्वर्णिम रथ दिखाई दिए, जिन्हें देखकर ययाति ने उन चारों को बताया, ‘ये स्वर्णिम रथ हम सबको स्वर्ग ले जाने के लिए आए हैं।’ दरअसल, अष्टक, प्रतर्दन, वसुमान और शिवि द्वारा अपने पुण्य देने का आग्रह अस्वीकार करके ययाति ने जिस संयम और त्याग का परिचय दिया, उसके बदले ययाति फिर से स्वर्ग के अधिकारी हो गए थे। फिर वे सभी रथों पर बैठकर स्वर्ग की ओर चल पड़े। इस प्रकार राजा ययाति ने अपने सद्गुणों के बल पर फिर से स्वर्ग में अपने लिए स्थान प्राप्त कर लिया। बाद में अष्टक ने ययाति से पूछा, ‘महाराज! आप कौन हैं? इतना त्याग हमने पहले कभी नहीं सुना।’ तब ययाति ने उन्हें बताया, ‘मैं नहुष का पुत्र ययाति हूं। मेरी पुत्री माधवी, तुम्हारी माता हैं, इसलिए मैं तुम लोगों का नाना हूं!’