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खूनी संघर्ष के मुहाने पर म्यांमार: भारत चीन से सीखे, हितों की रक्षा के लिए जुंटा और विद्रोहियों से संवाद अहम
Fri, 24 Jan 2025 05:55 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
सुबीर भौमिक
सुबीर भौमिक
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Fri, 24 Jan 2025 05:55 AM IST
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एएनआई
विस्तार
सितवे (पूर्व में अक्याब) शहर को यूनाइटेड लीग ऑफ अराकान (यूएलए) की सैन्य शाखा अराकान आर्मी (एए) के लड़ाकों ने पूरी तरह घेर लिया है। वे रखाइन (पूर्व में अराकान) राज्य को म्यांमार की जुंटा सेना के नियंत्रण से मुक्त कराना चाहते हैं। एए के करीब 18,000 लड़ाकों ने रखाइन राज्य के प्रशासनिक मुख्यालय सितवे को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ने वाले सभी भूमि मार्गों को काट दिया है। अगर सितवे अराकान आर्मी के कब्जे में आ गया और विद्रोही स्वतंत्रता की घोषणा कर देते हैं, तो यह 1971 में बांग्लादेश के निर्माण के बाद एशिया में पहला सफलतापूर्वक अलगाववादी अभियान होगा।
सेना और एए समेत कई सूत्रों के अनुसार, फिलहाल सितवे बंदरगाह और आसपास के तटीय गांवों पर म्यांमार की सेना का नियंत्रण है। अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर सेना के एक भगोड़े ने बताया, ‘सेना समुद्री और हवाई मार्ग से भारी संख्या में सुरक्षा बल भेज रही है, लेकिन सड़क मार्गों को एए के लड़ाकों द्वारा काट दिया गया है।’ शीर्ष सूत्र ने म्यांमार नाउ वेबसाइट को बताया, ‘सेना सितवे को अराकान आर्मी के हाथों में जाने से बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।’ उसी सूत्र के अनुसार, एए लड़ाकों ने सितवे को घेर लिया और वे किसी भी वक्त बड़ा हमला बोल सकते हैं। म्यांमार नाउ ने कहा कि शासन ने एए से निपटने के लिए सुरक्षा इंतजाम पुख्ता करने से पहले आह म्यिंट क्यून, पा दा लेइक और बायिन फुयू गांवों के निवासियों को बाहर निकाल लिया है।
एए सूत्रों का कहना है कि विद्रोही निर्णायक हमला करने से पहले भोजन और गोला-बारूद जमा कर रहे हैं। म्यांमार सेना के भगोड़े ने कहा, ‘इस सफलता के लिए एए की घेराबंदी तकनीक जटिल है। कस्बों की घेराबंदी इतनी गहन और पूर्ण है कि घटती आपूर्ति के कारण सेना का मनोबल कमजोर हुआ है।’ लेकिन सितवे में बंदरगाह और आसपास के समुद्र तट पर नियंत्रण से सेना को आपूर्ति बढ़ाने में मदद मिलेगी। सेना के भगोड़े ने कहा, ‘जुंटा अब अपनी वायु शक्ति का अंधाधुंध और बेरहमी से उपयोग करेगी, इसलिए हताहतों की संख्या बढ़ जाएगी।’
रखाइन राज्य के 18 में से 15 नगर यूएलए-एए के नियंत्रण में हैं। इन क्षेत्रों में यूएलए-एए राज्य द्वारा नियुक्त प्रशासकों की जगह अपना खुद का शासन तंत्र स्थापित कर रहा है। मरौक-यू नगर के एक निवासी ने वेस्टर्न न्यूज को बताया कि प्रशासकों के बदलाव के पीछे एए को आशंका है कि जुंटा द्वारा नियुक्त किए गए अधिकारी हवाई हमलों के लिए जुंटा को मुखबिरी कर सकते हैं। मिनब्या के एक निवासी ने बताया कि एए ने जुंटा द्वारा नियुक्त कुछ अधिकारियों को पदों पर बरकरार रखा है, क्योंकि उन्हें ‘भरोसेमंद’ माना गया था। आशंका है कि अंतत: सितवे को लेकर खूनी संघर्ष छिड़ेगा। एए के एक अधिकारी ने कहा, ‘सेना ऐन या उत्तर में लैशियो (पूर्वोत्तर कमांड का पूर्व मुख्यालय) की तुलना में उनकी स्थिति का अधिक तीव्रता से विरोध करेगी। लेकिन हम इसके लिए तैयार हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि हमें क्या करना है।’
अराकान आर्मी के लड़ाके रखाइन राज्य को हासिल करने के लिए सितवे के संघर्ष को स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई के रूप में देखते हैं, जिसे अराकानियों ने वर्ष 1784 में गंवा दिया था। एए अधिकारी ने क्रूर और भीषण संघर्ष के संकेत दिए हैं। लेकिन यूएलए-एए को राजनीतिक दुविधा का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उसके लड़ाके रखाइन राज्य को मुक्त कराने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। एए थ्री ब्रदरहुड गठबंधन का हिस्सा है (कोकांग समूह एमएनडीडीए और टैंग समूह टीएनएलए गठबंधन के अन्य सदस्य हैं)। इसका काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी के साथ घनिष्ठ संबंध है, जिसने 2007-08 में एए को बढ़ाने में मदद की और बर्मी मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के पूर्व सांसदों और नेताओं से बनी राष्ट्रीय एकता सरकार (एनयूजी) के साथ कार्यात्मक संबंध बनाए रखा है।
क्या यूएलए-एए रखाइन से म्यांमार की सेना को खदेड़ने के बाद स्वतंत्रता की घोषणा कर देगा या फिर सेना के हार मानने के लिए मजबूर होने और संघीय सरकार के गठन होने तक अपने पत्ते नहीं खोलेगा? बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि अन्य प्रतिरोधी ताकतें कितनी सफल हैं और सेना कितनी जल्दी इसे खत्म कर देगी। भारत के लिए बड़ा दांव है। समुद्र-नदी-सड़क द्वारा भूमि से घिरे पूर्वोत्तर से जुड़ने के दूसरे विकल्प के रूप में भारत द्वारा वित्त पोषित कलादान मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट परियोजना की सफलता रखाइन और चिन राज्यों की स्थिति पर निर्भर करती है। एए न केवल रखाइन के अधिकांश हिस्से को नियंत्रित करता है, बल्कि चिन राज्य में पलेटवा के महत्वपूर्ण नदी संगम को भी नियंत्रित करता है। हालांकि एए शुरू में दक्षिणी मिजोरम में अपने ठिकानों के खिलाफ शुरू किए गए सैन्य अभियान ‘सनराइज’ के लिए भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण था, लेकिन संबंधों को सामान्य बनाने के लिए पिछले कुछ समय में गुप्त प्रयास किए गए हैं। इसके बाद विद्रोही समूह ने कहा है कि वह रखाइन अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद विदेशी निवेश का समर्थक है।
एए सितवे पर हमला करने के लिए पूरी तरह से बेशक तैयार है, लेकिन वह चीन द्वारा वित्तपोषित गहरे समुद्री बंदरगाह क्याउकफ्यू पर किसी हमले की योजना नहीं बना रहा है और उस क्षेत्र में विशेष आर्थिक क्षेत्र में निर्माण कार्य बिना किसी रुकावट के जारी हैं। भारत को म्यांमार में अपने हितों की रक्षा के लिए चीन से सीख लेते हुए जुंटा और विद्रोही बलों, दोनों से बातचीत करनी चाहिए, जो भारत की महत्वाकांक्षी ‘एक्ट ईस्ट’ नीति की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। इस बीच, हाल ही में एसोसिएशन ऑफ साउथईस्ट एशियन नेशंस (आसियान) के विदेश मंत्रियों ने म्यांमार के सैन्य शासन से फिलहाल चुनाव कराने के बजाय सभी विद्रोही समूहों से बातचीत कर सुलह करने की सलाह दी है। मलयेशिया के विदेश मंत्री मोहम्मद हसन ने कहा कि हम जानना चाहते हैं कि आखिर म्यांमार के मन में क्या है। चुनाव समावेशी आधार पर हो, जिसमें सभी शामिल हों। उन्होंने कहा कि हमारी प्राथमिकता हिंसा रोकना है, न कि चुनाव।