मोदी-ट्रंप की जुगलबंदी
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देश में जहां कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी लगातार जीएसटी, विमुद्रीकरण, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग के विनाश और लाखों भारतीय युवाओं के रोजगार छिनने का आरोप लगाते हुए प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी पर हमलावर हैं, वहीं मनीला में 31वें आसियान शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री का कद बढ़ता दिखा। आसियान बिजनेस फोरम को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि दुनिया भर के नेता उत्साह के साथ हैरानी जता रहे हैं कि कैसे हमारी सरकार ने 1,200 पुराने कानूनों को खत्म किया और भारत में व्यवसाय करने के लिए माहौल को सुधार कर अनुकूल बनाया, जिसके चलते ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में भारत ने 30 पायदान की छलांग लगाई, जो पिछले साल किसी भी देश द्वारा लगाई गई सबसे ऊंची छलांग है, जिसे विश्व बैंक ने स्वीकार किया है। उन्होने जोर देकर कहा कि भारत को बदलने का कार्य अभूतपूर्व स्तर पर चल रहा है। उन्होंने पिछले तीन वर्षों में अपनी सरकार की सभी परिवर्तनकारी पहल का जिक्र किया और आसियान क्षेत्र से निवेश आमंत्रित किया। भारतीय प्रवासियों को संबोधित करते हुए उन्होंने भगवान बुद्ध, रामायण, महात्मा गांधी और भारत की शांतिरक्षक भूमिका का जिक्र किया तथा आसियान क्षेत्र के साथ भारत के सदियों पुराने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित किया।
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हैरानी की बात है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप, जिन्हें देश और विदेशों में बहुत गलत समझा जाता है, जिनके साथ उन्होंने आसियान शिखर सम्मेलन में तीसरी बार मुलाकात की, उनके सबसे बड़े प्रशंसक प्रतीत होते हैं। हालांकि इस बार जादू की झप्पी नहीं थी, लेकिन उन्होंने गर्मजोशी से हाथ मिलाया और अपनी बड़ी मुस्कराहट तथा सकारात्मक देह-भाषा से यह सब जता दिया। मोदी उन्हें उनके पहले नाम 'डोनाल्ड' कहकर नहीं बुलाते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि मोदी और ट्रंप की दोस्ती गहराने लगी है। इसी तरह के एक शिखर सम्मेलन में वर्ष 2015 राष्ट्रपति ओबामा ने मोदी को 'मैन ऑफ एक्शन' कहा था। इस बार ट्रंप ने मोदी की भरपूर प्रशंसा करते हुए कहा, वह हमारे मित्र बन गए हैं। वह एक महान काम कर रहे हैं। बहुत सारी चीजें हल हो गई हैं और हम एक साथ काम करना जारी रखेंगे।
मोदी ने ट्रंप को भारत के बारे में उच्च और आशावादी बातें कहने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने यह भी दावा किया कि 'भारत और अमेरिका के रिश्ते व्यापक और गहरे हो रहे हैं। और भारत-अमेरिका भारत के हितों से परे एशिया के भविष्य और दुनिया में मानवता के कल्याण के लिए मिलकर काम करते रहेंगे।' उन्होंने यह भी वायदा किया कि भारत 'अमेरिका और विश्व की उम्मीदों पर खरा उतरने' की कोशिश करेगा। उनके काम में बहुत ही महत्वाकांक्षी दृष्टि और उच्च उम्मीदें हैं। यह तो समय ही बताएगा कि वास्तव में इसका क्या असर होगा और भारत कैसे उम्मीदों को पूरा करेगा।
लगता है कि अरबपति अमेरिकी राष्ट्रपति अमेरिका में व्यापार संतुलन और रोजगार सृजन के मुद्दे पर सफलता चाहते हैं, उन्होंने बेहिचक अमेरिकी सहयोगियों और अमेरिकी दोस्तों को ज्यादा अमेरिकी हथियार खरीदने के लिए कहा है! उन्होंने सऊदी अरब और जापान के दौरे के दौरान ऐसा किया था। मनीला में मोदी-ट्रंप की मुलाकात के बाद व्हाइट हाउस में पढ़ा गया बयान भी यही संकेत करता है। प्रमुख रक्षा साझेदारों के रूप में रक्षा सहयोग बढ़ाने के प्रति वचनबद्ध होने के अलावा इस संकल्प का भी उल्लेख किया गया कि 'दुनिया के दो बड़े लोकतंत्रों के पास दुनिया की सबसे बड़ी सेनाएं भी होनी चाहिए।' यह आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में भारत की वैश्विक भूमिका के लिए स्पष्ट रूप से अमेरिकी समर्थन था। 45 मिनट की बैठक में द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की गई। मोदी-ट्रंप के बीच खुशमिजाजी के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार, व्यवसाय एवं निवेश से संबंधित मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं। आतंकवाद, पाकिस्तान और अफगानिस्तान को लेकर हमारे विचार अलग हैं।
आसियान शिखर सम्मेलन से अलग अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया के प्रतिनिधियों की एक आधिकारिक बैठक भी हुई, जिसमें एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती आर्थिक एवं सैन्य ताकत पर चर्चा की गई। पड़ोसी देशों के प्रति चीन की बढ़ती आक्रामकता के चलते इस 'क्वाड' यानी चतुर्भज समूह को फिर से शुरू किया गया। चीन ने वर्ष 2007 में चतुर्भुज समूह का विरोध किया था। कुछ टिप्पणीकारों का दावा है कि यह चतुर्भुज समूह एशिया-प्रशांत क्षेत्र को सुरक्षित करने में मदद करेगा। लेकिन ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी।
पर सच्चाई यह है कि इस चतुर्भुज समूह का कोई भी सदस्य अकेले या सामूहिक रूप से चीन विरोधी रवैया नहीं अपना सकता। वर्ष 2016 में अमेरिका ने 416 अरब डॉलर की चीनी वस्तु का आयात किया, चीन को 346 अरब डॉलर का अधिशेष मिला। सस्ते चीनी माल के बिना वॉलमार्ट बंद हो जाएगा, जिसके कारण हजारों नौकरियों का नुकसान होगा। चीन के पास दस खरब डॉलर से ज्यादा अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स हैं। कोई भी समझदार अमेरिकी राष्ट्रपति चीन के साथ संबंध खराब नहीं करेगा। सेनकाकू द्वीप को लेकर चीन और जापान के बीच भयंकर तनाव के दौरान भी अमेरिका ने जापान समर्थक रुख नहीं अपनाया। अपने हाल के दौरे में ट्रंप ने शी जिनपिंग की प्रशंसा की और शी ने भी उन्हें राजकीय सम्मान दिया। ट्रंप के दौरे के दौरान 250 अरब डॉलर के सौदे के लिए समझौता ज्ञापन हुआ, जो ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अन्य सभी देशों से हुए सौदे से ज्यादा है! चीन-आसियान व्यापार करीब 400 अरब डॉलर का है, आसियान के कुल आयात का 17.5 फीसदी चीन से आयात होता है। ऐसे में यह चतुर्भुज समूह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक नियम आधारित व्यवस्था के पालन के लिए चीन को दबाव बनाकर प्रोत्साहित कर सकता है। लेकिन वह चीन के उभार को न तो चुनौती दे सकता है और न ही उसे देना चाहिए।