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निर्णायक मोड़ पर 'नक्सल-मुक्त देश' की मुहिम: छत्तीसगढ़ में 13 महीने में 282 नक्सली ढेर, 900 से अधिक आत्मसमर्पण
Tue, 11 Feb 2025 04:51 AM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला
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Published by: ज्योति भास्कर
Updated Tue, 11 Feb 2025 04:51 AM IST
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नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षाबलों की मुहिम (प्रतीकात्मक)
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विस्तार
देश में नक्सलियों के आखिरी बचे गढ़ छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के बेहद घने जंगलों में चलाए गए अभियान में सुरक्षाबलों द्वारा जिस तरह से घेर कर 31 नक्सलियों को ठिकाने लगाया गया, वह राज्य में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही रणनीतिक लड़ाई में महत्वपूर्ण सफलता है, जिससे यह संकेत भी मिलता है कि देश को नक्सल-मुक्त बनाने की मुहिम अब अपने निर्णायक दौर में पहुंच रही है।13 महीनों में 282 नक्सली ढेर, 925 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया
पिछले कुछ समय से सुरक्षाबल जिस तरह से ताबड़तोड़ अभियान चला रहे हैं, उससे मार्च, 2026 तक देश से नक्सलवाद के सफाए के गृहमंत्री द्वारा किए गए आह्वान के पूरा होने में भी अब कोई अड़चन नहीं दिख रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर, 2023 में छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार बनने के बाद अब तक तेरह महीनों में 282 नक्सली मारे जा चुके हैं और 925 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है।
डबल इंजन सरकार की संयुक्त इच्छाशक्ति का नतीजा
छत्तीसगढ़ में चल रहा नक्सल विरोधी अभियान केंद्र व राज्य सरकार के बीच अभूतपूर्व तालमेल की भी मिसाल है। यह डबल इंजन सरकार की संयुक्त इच्छाशक्ति का ही नतीजा है कि सुरक्षाबल दक्षिणी बस्तर के साथ अबूझमाड़ जैसी जगहों पर भी अपने कैंप स्थापित कर रहे हैं, जिनका पूरी तरह सर्वे तक नहीं हुआ है और जो अब तक नक्सलियों के लिए सुरक्षित क्षेत्र माने जाते रहे हैं। इन कैंपों की खासियत यह है कि नियाद नेल्लानार योजना के तहत इनमें ग्रामीणों को उनके उपयोग की वस्तुएं मुहैया कराई जाती हैं, ताकि स्थानीय स्तर पर एक सकारात्मक संदेश दिया जा सके।
दशकों पहले शुरू हुए नक्सलवादी आंदोलन, अब आतंकियों जैसा...
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2019 से 2024 के बीच बस्तर क्षेत्र में करीब 100 पुलिस कैंपों का निर्माण इसी रणनीति का हिस्सा है, जिसके नतीजे भी अब दिखने लगे हैं। अपने ही लोगों पर हिंसा करना दुखदायी है, लेकिन जल, जमीन और जंगल पर आदिवासियों के अधिकारों को लेकर दशकों पहले शुरू हुए नक्सलवादी आंदोलन ने पिछले कुछ दशक से जिस तरह से आतंकी समूहों जैसा बर्ताव करना शुरू किया है और अत्याधुनिक हथियारों तक अपनी पहुंच बनाई है, उसे देखते हुए उनकी गतिविधियों पर पूरी तरह अंकुश लगना जरूरी भी है।
निर्दोष आदिवासियों पर आंच न आए
गौरतलब है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी नक्सलियों को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माना था। बीजापुर का कामयाब अभियान यकीनन सुरक्षा बलों के हौसले बढ़ाएगा, लेकिन यह समझना जरूरी है कि सैन्य अभियानों की अपनी सीमाएं होती हैं। स्थानीय स्तर पर नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले लोगों का भरोसा जीतने के लिए जरूरी है कि बुनियादी ढांचे, शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं। नक्सलियों के खात्मे के उत्साह में निर्दोष आदिवासियों पर आंच न आए, इसका भी ख्याल रखना होगा।