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ईयू को संदेश: ब्रिक्स ने कार्बन बॉर्डर टैक्स का प्रस्ताव अस्वीकारा, यूरोपीय और विकासशील देशों के बीच टकराव...

Tue, 07 Oct 2025 04:07 AM IST
ज्योति भास्कर अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: ज्योति भास्कर Updated Tue, 07 Oct 2025 04:07 AM IST
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सार
ब्रिक्स का यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर टैक्स के प्रस्ताव को अस्वीकारना वैश्विक व्यापार व जलवायु नीतियों के संदर्भ में यूरोपीय और विकासशील देशों के बीच गहराते टकराव को ही दर्शाता है। पश्चिमी देशों के लिए ऐसे कठोर संदेश तब और जरूरी हो जाते हैं, जब उन्होंने इस मामले में दशकों से गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाया हुआ हो।
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Message to EU BRICS rejects carbon border tax proposal conflict between European and developing countries
भारत और यूरोपीय संघ। (प्रतीकात्मक तस्वीर)) - फोटो : ANI

विस्तार

ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका समेत कुल ग्यारह देशों के समूह ब्रिक्स का यूरोपीय संघ (ईयू) के कार्बन बॉर्डर टैक्स प्रस्ताव को अस्वीकार करना वैश्विक व्यापार और जलवायु नीतियों के संदर्भ में वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति तो है ही, यह इस मुद्दे पर यूरोपीय और विकासशील देशों के बीच गहराते टकराव को भी दर्शाता है।



उल्लेखनीय है कि कार्बन बॉर्डर समायोजन तंत्र (सीबीएएम), जिसे 2026 से लागू करने की योजना है, कार्बनयुक्त उत्पादों, मसलन, लोहा, इस्पात, एल्युमीनियम और सीमेंट के यूरोपीय संघ के 27 देशों में आयात पर शुल्क लगाने का प्रावधान करता है। ईयू का दावा है कि यह नीति कार्बन के रिसाव को रोकने और जलवायु लक्ष्यों को पाने के लिए जरूरी है।


इससे विकासशील देशों और इन उत्पादों के भारत और चीन जैसे बड़े निर्यातकों को भारी शुल्क का सामना करना पड़ेगा। इससे इन देशों से ईयू में निर्यात होने वाले स्टील, एल्युमीनियम जैसे आइटम काफी महंगे हो जाएंगे, जिससे इनका निर्यात प्रभावित होगा। ब्रिक्स का यह भी मानना है कि यूरोपीय संघ का यह प्रस्ताव विश्व व्यापार संगठन के नियमों और पेरिस समझौते का भी उल्लंघन है।

खास बात यह है कि इस एक मुद्दे पर भारत और चीन एक ही मंच पर खड़े दिख रहे हैं, जो अपने आप में एक दुर्लभ घटना है। ब्रिक्स का यह विरोध जलवायु नीतियों में निहित असमानता को रेखांकित करता है। ऐतिहासिक रूप से, विकसित देशों ने औद्योगीकरण के दौरान भारी कार्बन उत्सर्जन कर अपना विकास तो किया, लेकिन इसका खामियाजा आज पूरा विश्व भुगत रहा है।

कार्बन बॉर्डर टैक्स जैसे उपाय विकासशील देशों पर अनुचित बोझ डालते हैं, जो पहले से ही जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों, मसलन-बाढ़, सूखा और दूसरी चरम मौसमी घटनाओं से जूझ रहे हैं। भारत, जो 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य रखता है, ने लगातार मांग की है और ईयू के साथ चल रही मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) वार्ता में भी इस मुद्दे को प्राथमिकता के साथ उठाया है कि विकसित देश इस मामले में जिम्मेदार रवैया अपनाएं। यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर टैक्स प्रस्ताव दरअसल एक किस्म का हरित संरक्षणवाद ही है, जो पर्यावरण संरक्षण के नाम पर व्यापार बाधाएं खड़ी करता है।

पश्चिम का यह रवैया वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को तो प्रभावित करता ही है, विकासशील देशों की हरित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने की क्षमता को भी सीमित करता है। ब्रिक्स देशों का रुख उनके आर्थिक हितों की रक्षा करने के साथ जलवायु के क्षेत्र में न्याय और समानता का मजबूत संदेश भी देता है। पश्चिमी देशों को समय-समय पर ऐसे कठोर संदेश मिलने तब और जरूरी हो जाते हैं, जब वे वर्षों से अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी को स्वीकारने के मामले में ढीठ बने हुए हैं।

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