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इस प्यार को क्या नाम दें: ठाकरे बंधुओं की सारी कसरत इस साल होने वाले बीएमसी चुनाव को लेकर, 74 हजार करोड़...
Thu, 10 Jul 2025 05:48 AM IST
ज्योति भास्कर
शेखर अय्यर, वरिष्ठ पत्रकार।
शेखर अय्यर, वरिष्ठ पत्रकार।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Thu, 10 Jul 2025 05:48 AM IST
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मनसे सुप्रीमो राज ठाकरे और महाराष्ट्र के पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे (फाइल)
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और मनसे प्रमुख राज ठाकरे कह रहे हैं कि वे एकजुट रहने के लिए एकसाथ आए हैं। बीस साल में पहली बार उन्होंने मराठी अस्मिता और हिंदी भाषा ‘थोपे’ जाने के मुद्दे पर राजनीतिक मंच साझा किया है। अगर किसी को इस बात पर संदेह हो कि अचानक ये दोनों पार्टियां क्यों हाथ मिला रही हैं, तो यह बिल्कुल स्पष्ट ही है। असल में महाराष्ट्र के पिछले विधानसभा चुनाव में इन दोनों पार्टियों को भारी नुकसान हुआ था। चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) ने 20 सीटें जीती थीं, जबकि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने 57 सीटें जीती थीं। मनसे को एक भी सीट नहीं मिली थी।
इसलिए उनके कार्यकर्ता हताश हो रहे थे और चाहते थे कि उनका विलय हो जाए, ताकि वे अपना भाग्य पुनः संवार सकें। यही कारण है कि राज ठाकरे ने चुटकी लेते हुए कहा कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दोनों चचेरे भाइयों को एकसाथ लाकर वह काम कर दिया है, जो शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे और अन्य नहीं कर सके। उद्धव का इरादा साफ था। मुंबई में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने घोषणा की, ‘हम साथ रहने के लिए साथ आए हैं। हम साथ मिलकर मुंबई नगर निगम और महाराष्ट्र में सत्ता हासिल करेंगे।’
इस साल के अंत में बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) और अन्य नगर निकायों के चुनाव होने वाले हैं। बीएमसी का बजट हजारों करोड़ रुपये में है। यह भारत का सबसे बड़ा नगरीय निकाय है। बीएमसी ने चार फरवरी, 2025 को वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए अपना बजट पेश किया, जिसका कुल परिव्यय 74,427.41 करोड़ रुपये है। यह पिछले बजटों की तुलना में 14 फीसदी अधिक है, जिसमें कई बुनियादी ढांचा परियोजनाएं शामिल हैं। इसलिए, पिछले साल के विधानसभा चुनाव के बाद बीएमसी दो राजनीतिक गठबंधनों (महायुति और महा विकास अघाड़ी) के लिए अगला युद्ध क्षेत्र है।
नगरीय निकाय की विधायिका 2022 में समाप्त हो गई और तब से इसे सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासक द्वारा चलाया जा रहा है। शिवसेना, जो 1985 से (1992-1996 को छोड़कर) नगर निकाय पर शासन कर रही है, इन चुनावों में अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है। लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों की तरह, एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले शिवसेना के दो गुट मुंबई में शिवसेना के मराठी वोट आधार के लिए आमने-सामने भिड़ने वाले हैं। मुंबई में अपनी पकड़ मजबूत कर रही भाजपा एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना के साथ मिलकर बीएमसी पर कब्जा करना चाहेगी।
दूसरी ओर, कांग्रेस को अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी होगी। वह राज्य में कोई बड़ी पार्टी नहीं है। विधानसभा चुनाव में उद्धव और राज की अपमानजनक हार के बाद, ये नगर निगम चुनाव उनके लिए पुनरुद्धार की कुछ उम्मीद जगाते हैं।
राज ठाकरे ने 2005 में अपने चचेरे भाई के साथ तीखे मतभेदों के चलते शिवसेना छोड़ दी थी, जिसके बाद उन्होंने मनसे का गठन किया। वह मनसे को भूमिपुत्रों के हित के सच्चे हिमायती के रूप में पेश कर रहे थे। लेकिन वह उन लोगों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाए, जो उनकी आक्रामक शैली का समर्थन नहीं करते थे, यानी महाराष्ट्र के मराठी भाषी लोग। उन्होंने उद्धव को पसंद किया, जिन्हें एक उदारवादी नेता के रूप में देखा जाता था। तब से, शिवसेना और मनसे ने एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा है, हालांकि उनके कुछ शुभचिंतकों ने हाथ मिलाने की अपील भी की। इसलिए, जब फडणवीस सरकार ने त्रि-भाषा नीति पर थोड़ी ढिलाई बरती, तो उन्हें एक बड़ा अवसर दिखाई दिया।
तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को शामिल करने से उद्धव और राज ठाकरे के लिए एक बहुत जरूरी साझा मुद्दा सामने आया। मनसे और शिवसेना (यूबीटी) के लिए असली चुनौती यह है कि मुंबई में 45 प्रतिशत से ज्यादा मतदाता गैर-मराठी भाषी हैं। वे शिवसेना की कट्टरपंथी राजनीति और उनके खिलाफ हिंसा से सावधान हैं। वे भाजपा को पसंद करते हैं, क्योंकि कांग्रेस का पतन हो रहा है। इसके अलावा, महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र भी हिंदी भाषी क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों में हिंदी के प्रति कोई नकारात्मक भावना नहीं है, क्योंकि मराठी भाषी अन्य लोगों के साथ सौहार्दपूर्ण तरीके से रहते हैं। इसलिए, अगर ये दोनों पार्टियां गैर-मराठी भाषियों के खिलाफ अपने आंदोलन को बहुत आगे ले जाती हैं, तो वे हार सकती हैं।
हम पहले ही देख सकते हैं कि यूबीटी सेना चुप रहना चाहती है। यह गैर-मराठी भाषियों के खिलाफ एमएनएस कार्यकर्ताओं द्वारा की गई हिंसा का समर्थन नहीं कर सकती। यह भी सच है कि ठाकरे बंधुओं द्वारा एकजुट मराठी मंच एकनाथ शिंदे के लिए समस्या बन सकता है। लेकिन अगर गैर-मराठी मतदाता डर गए, तो यूबीटी सेना और मनसे के लिए यह कोई बड़ी जीत का फॉर्मूला नहीं है। ठाकरे की रैली से एक दिन पहले, पुणे में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सामने एकनाथ शिंदे द्वारा ‘जय गुजरात’ का नारा लगाए जाने को नई स्थिति के प्रति उनकी चिंता की अभिव्यक्ति के रूप में देखा गया। यही कारण है कि शिवसेना (यूबीटी) ने हिंदी पर अपने रुख और तमिलनाडु में दिख रहे ज्यादा कट्टर विपक्ष के बीच एक स्पष्ट रेखा खींच दी है।
मुंबई में चचेरे ठाकरे भाइयों की ‘विजय रैली’ के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की कड़ी टिप्पणियों से शिवसेना (यूबीटी) खुद को दूर कर रही है। पिछले वर्ष विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 288 सीटों वाली विधानसभा में 132 सीटें जीती थीं। महाराष्ट्र में यह सबसे प्रभावशाली राजनीतिक पार्टी बनी हुई है। इसका वोट शेयर 26.77 फीसदी है, जो दूसरे स्थान पर रहने वाली कांग्रेस के वोट शेयर से दोगुना है, जिसका वोट शेयर 12.42 फीसदी है। फिर भी, मुंबई, ठाणे, पुणे और नासिक जैसे शहरों में मतदाताओं का थोड़ा-सा भी मानसिक बदलाव पार्टी को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। इसलिए यह किसी भी पार्टी के लिए जीत वाली स्थिति नहीं है।