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सियासत: जनतंत्र में जनादेश के जलसे, राजनीति के कुछ दृश्यों को बदलने के लिए जरूरी है कानूनी सख्ती
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देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार (फाइल फोटो)
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एएनआई
विस्तार
आज जो कुछ महाराष्ट्र में हो रहा है या इससे पहले जो कुछ अन्य राज्यों में हुआ, उससे सवाल उठता है कि क्या जनादेश का कोई मतलब रह गया है। जनादेश का सम्मान क्या मायने खो चुका है? कुछ साल पहले विधानसभा चुनावों के नतीजों पर चर्चा के दौरान मैंने एक टिप्पणी की थी कि कौन जीतेगा यह तो पता नहीं, लेकिन इतना जरूर पता है कि सरकार कौन बनाएगा। अब यह बात हकीकत बनती जा रही है, बल्कि बात इससे भी आगे बढ़ गई है।
महाराष्ट्र में तो जनादेश का जनाजा निकालने का सालाना जलसा हो गया है। भाजपा के साथ मिलकर चुनाव जीतने वाली शिवसेना ने पहले कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई। फिर कुछ ही समय में शिवसेना दो फाड़ हो गई। तब एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे आपस में शिवसेना के चिह्न, दफ्तर एवं चल-अचल संपत्ति को लेकर उसी तरह झगड़ रहे थे, जैसे अभी राकांपा को लेकर चाचा-भतीजा झगड़ रहे हैं। कहा जा रहा है कि दिसंबर में चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए आचार संहिता अक्तूबर में लागू हो जाएगी, लिहाजा आने वाले दिनों में और भी बहुत कुछ हो सकता है।
वैसे इस मामले में सिर्फ भाजपा को दोष देना ठीक नहीं है। बिहार में नीतीश कुमार ने जिस तरह से जनादेश का जनाजा निकाला है, वह सबके सामने है। कर्नाटक में 2018 के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद कांग्रेस ने अपने से आधी सीटें हासिल करने वाले दल को मुख्यमंत्री पद सौंपकर जनादेश का जनाजा निकाला था। अब एक साल से हम महाराष्ट्र में यही देख रहे हैं।
जब दो दल मिलकर चुनाव लड़ते और जीतते हैं, तो सरकार बनाते वक्त धुर-विरोधी दल से कैसे मिल जाते हैं? जाहिर है, सबको सत्ता में हिस्सा चाहिए। उस पर से तुर्रा यह कि उसे जनता की खुशहाली के लिए लिया गया फैसला बताया जाता है। एक वक्त था, जब नेता दल बदलते थे, लेकिन खुद को असली पार्टी बताने का दावा नहीं करते थे। एक वक्त था, जब मुख्य दल छोटे दलों के साथ गठबंधन करता था और विवादास्पद मुद्दे ताक पर रख दिया करता था। फिर वक्त बदला। बड़ी पार्टी छोटे दल को अपने में शामिल हो जाने का दबाव डालने लगी। लेकिन वक्त के साथ छोटे दल भी अपनी शक्ति पहचानने लगे और मोल-भाव करने लगे। बड़े दल को भी मजबूरन मोल-भाव करना पड़ा।
अब गुट टूटता है और टूटने के साथ ही खुद को असली पार्टी घोषित कर देता है। महाराष्ट्र में पहले शिवसेना के एकनाथ शिंदे और अब राकांपा के अजित पवार इस राजनीति के अगुआ हैं। भारतीय राजनीति में यह नए किस्म का आयाराम-गयाराम फॉर्मूला है। बड़े दल को इससे दोहरा लाभ होता है। एक तो चुनावी चुनौती देने वाली छोटी पार्टी दो फाड़ हो जाती है। दूसरे, छोटी पार्टी का वजूद कम करके सत्ता की चाबी उससे छीनी जा सकती है।
जिस समय भाजपा उभर रही थी, उसी समय ये प्रादेशिक दल भी अपने-अपने राज्यों में पनप रहे थे। अब उनमें टूट हो रही है, तो कहा जा रहा है कि छापों के डर से ऐसा हो रहा है। सवाल उठता है कि आखिर नेता छापों से डरते क्यों हैं। अगर वे पाक-साफ हैं, तो ईडी या सीबीआई क्या बिगाड़ लेगी। लेकिन वे जानते हैं कि बात इतनी भर नहीं है। वे जानते हैं कि जांच एजेंसियों के पास इतने सारे पैंतरे होते हैं कि उनमें उलझाया जा सकता है। तो इसका तोड़ क्या है? कायदे से इसमें चुनाव आयोग को दखल देना चाहिए। कुछ जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए।
चुनाव सुधार के मामलों में सुप्रीम कोर्ट पहले भी बड़े-बड़े फैसले दे चुका है। दो साल से ज्यादा की सजा पाने वालों की सदस्यता रद्द करना और छह साल चुनाव पर रोक लगाने का फैसला भी सुप्रीम कोर्ट ने ही दिया था। अब दल-बदल कानून पर भी कोर्ट को सख्त रुख अपनाने की जरूरत है, ताकि राजनीतिक पार्टियां इसका दुरुपयोग न कर सकें। हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि जनता को निर्णायक जनादेश देना होगा, ताकि कोई भी दल जनादेश का मखौल उड़ाने की हिम्मत न कर सके। लेकिन क्या सियासत के ठेकेदारों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती?