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बढ़ा हुआ ओबीसी आरक्षण असांविधानिक: मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण पर रोक, 14% कोटा बहाल; अब क्या बदलेगा?

Sat, 10 Oct 2026 08:41 AM IST
Vinay Jhelawat विनय झैलावत
Updated Sat, 10 Oct 2026 08:41 AM IST
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Madhya Pradesh Increased OBC Quota unconstitutional high court denied 27pc 14 pc quota restored know changes
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (फाइल) - फोटो : अमर उजाला

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अशिता दुबे और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य मामले में सुनाए गए अपने फैसले में मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने के उपायों को असांविधानिक घोषित कर दिया। डिवीजन बेंच ने बढ़े कोटे के लिए सांविधानिक आधार, पर्याप्त प्रतिनिधित्व साबित करने के लिए इस्तेमाल की गई जानकारी, आरक्षण की स्वीकार्य सीमा और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से सलाह लेने की जरूरत की जांच की।


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इस फैसले में बढ़े हुए आरक्षण की वैधता और इसके तहत पहले ही की जा चुकी नियुक्तियों पर पड़ने वाले असर, दोनों पर बात की गई है। उच्च न्यायालय ने यह माना कि राज्य सरकार ओबीसी आरक्षण को 27% तक बढ़ाने का मामला साबित नहीं कर पाई, लेकिन साथ ही कोर्ट ने 29 सितंबर 2022 से पहले की गई कुछ खास नियुक्तियों को सुरक्षित रखने और उसके बाद की नियुक्तियों को नियमित करने के निर्देश भी जारी किए।

यह विवाद राज्य सरकार के ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने के फैसले से शुरू हुआ। इससे पहले 30 जून 2003 के एक प्रस्ताव के जरिए यही बढ़ोतरी करने की कोशिश को भी चुनौती दी गई थी। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आनंद पाठक एवं न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ के मौजूदा फैसले में बताया गया है कि 'मनीष मिश्रा और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य' मामले में 13 अक्तूबर 2014 को उस प्रस्ताव को रद्द कर दिया गया था, और इसकी कार्यवाही सर्वोच्च न्यायालय में लंबित बताई गई है। इसके बाद राज्य ने बढ़ी हुई कोटा व्यवस्था को लागू करने के लिए 8 मार्च 2019 को अध्यादेश नंबर 2 (2019) जारी किया और फिर 2019 का संशोधन अधिनियम लाया। कई रिट याचिकाओं में इन कदमों को सांविधानिक आधार पर चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं ने मौजूदा प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण बढ़ाने के औचित्य, सहायक डाटा की पर्याप्तता और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के साथ परामर्श की सांविधानिक जरूरत के पालन पर सवाल उठाए।

मुख्य सवाल था... क्या आरक्षण बढ़ाना वैध है?
मुख्य सवाल था कि क्या ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने को सही ठहराती है। अनुच्छेद 16(4) राज्य को किसी ऐसे पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की इजाजत देता है, जिसका राज्य की राय में सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। इसलिए, सांविधानिक सवाल सिर्फ यह नहीं था कि क्या ओबीसी आरक्षण के हकदार हैं, बल्कि यह था कि क्या आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाना सही था।

ओबीसी प्रतिनिधित्व से जुड़े आंकड़े पर भी किया विचार
उच्च न्यायालय ने उच्च शिक्षा और सरकारी सेवाओं में ओबीसी के प्रतिनिधित्व से जुड़े आंकड़ों पर भी विचार किया। अपने आखिरी सारांश में, न्यायालय ने कहा कि पहले के पैराग्राफ और टेबल में बताए गए आंकड़ों से पता चलता है कि अनुच्छेद 16 (4) के मकसद के हिसाब से ओबीसी का प्रतिनिधित्व पर्याप्त था।

आरक्षण में बढ़ोतरी गलत
कोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में ओबीसी आरक्षण को पूरी तरह खारिज नहीं किया। बल्कि, यह निष्कर्ष निकाला कि आरक्षण में बढ़ोतरी, न्यायालय द्वारा जांची गई परिस्थितियों और तथ्यों के आधार पर सही नहीं थी। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 338वी (9) के तहत सलाह-मशविरे की जरूरत पर भी अलग से विचार किया। फैसले में बताए गए सांविधानिक बदलावों के बाद, इस प्रावधान का एक अपवाद अनुच्छेद 342ए (3) में बताए गए मकसद के लिए सलाह-मशविरे को जरूरी नहीं मानता; यह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की राज्य सूची तैयार करने और उसे बनाए रखने से जुड़ा है।

2022 से पहली की नियुक्ति बरकरार रहेंगी
न्यायालय ने माना कि सिर्फ सलाह-मशविरा न होने की वजह से ही कानून को रद्द करना निर्णायक हो भी सकता है और नहीं भी। निष्कर्ष निकाला कि अध्यादेश संख्या 2 (2019) और संशोधन अधिनियम (2019) इंद्रा साहनी तथा जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल मामलों में तय की गई 50% की सीमा के खिलाफ थे। न्यायालय ने निर्देश दिया कि 29 सितंबर 2022 से पहले ओबीसी के लिए पहले के 14% कोटे से ज्यादा (27% तक) की गई नियुक्तियों को बरकरार रखा जाएगा।

(लेखक, पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।)

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