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थोड़ा-सा रूमानी, थोड़ा-सा रूहानी: नाना पाटेकर एक खुदरंग अभिनेता के रूप में दर्ज रहेंगे, अपनी तरह के खालिस
सार
नाना पाटेकर हमारे बीच से उठकर चले गए हैं। लेकिन, शायद ऐसे अभिनेता पूरी तरह नहीं जाते, वे अपने किरदारों में बचे रहते हैं। नाना पाटेकर एक खुदरंग अभिनेता के रूप में दर्ज रहेंगे, अपनी तरह के खालिस।
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नाना पाटेकर
- फोटो : एएनआई-वीडियो ग्रैब
विस्तार
कुछ अभिनेताओं की मृत्यु पर हम उनकी फिल्मों की सूची बनाने लगते हैं। कौन-सी फिल्म हिट थी, कौन-सा संवाद लोकप्रिय हुआ, कितने पुरस्कार मिले, कौन-सा किरदार यादगार रहा। फिर, धीरे-धीरे आदमी पीछे छूट जाता है और उसका फिल्मी कॅरिअर आगे आ जाता है। नाना पाटेकर के साथ ऐसा करना शायद उनके साथ सबसे बड़ी नाइन्साफी होगी।
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मेरी निगाह में, नाना पाटेकर उन अभिनेताओं में से थे, जिन्होंने हिंदी सिनेमा में ‘हीरो’ होने की परिभाषा को ही थोड़ा बदल दिया। वह परंपरागत अर्थों में सुंदर नायक नहीं थे। उनकी आवाज में मिठास नहीं, खुरदरापन था। चेहरे पर स्टार जैसी चमक के बजाय जीवन की धूप थी। वह पर्दे पर आते थे, तो लगता था कि कोई अभिनेता नहीं, कोई आदमी आ गया है-अपने गुस्से, अपनी बेचैनी, अपनी कमजोरियों और अपनी तमाम अधूरी कहानियों के साथ।
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उन्होंने अपनी फिल्मों में भी साबित किया कि अभिनेता का चेहरा नहीं, उसकी उपस्थिति महत्वपूर्ण होती है, और नाना की उपस्थिति बहुत बड़ी थी। वह चुप रहते थे, तो भी दृश्य में रहते थे, बोलते थे, तो दृश्य बदल जाता था। नाना पाटेकर को याद करते हुए मुझे उनके व्यावसायिक सिनेमा से कहीं ज्यादा उनका वह सिनेमा याद आता है, जो धीरे चलता था, जो दर्शक से थोड़ा धैर्य मांगता था, जिसमें नायक दुनिया बचाने नहीं, कभी-कभी सिर्फ किसी एक आदमी के भीतर बची हुई उम्मीद को जगाने आता था। इसीलिए, थोड़ा सा रूमानी हो जाएं मेरे लिए नाना पाटेकर की बहुत महत्वपूर्ण फिल्म है। 1990 में अमोल पालेकर के निर्देशन में बनी यह फिल्म 160 मिनट की एक अजीब, काव्यात्मक और लगभग स्वप्न जैसी फिल्म है। इसमें अनीता कंवर, नाना पाटेकर और विक्रम गोखले प्रमुख भूमिकाओं में थे। फिल्म चित्रा पालेकर ने लिखी थी। इसका आधार अमेरिकी नाटककार एन रिचर्ड नैश का मशहूर नाटक द रेन मेकर था।
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आज की तेज, शोर से भरी सिनेमा की दुनिया में शायद इस फिल्म को देखना एक तरह का अपराध लगे। लेकिन, उस समय यह कोई आसान फिल्म नहीं थी। इस फिल्म का संसार सूखे से जूझ रहा है। लेकिन, असली सूखा सिर्फ धरती पर नहीं है। लोगों के भीतर भी कुछ सूख गया है। अनीता कंवर की बिन्नी एक ऐसी लड़की है, जो अपने आसपास की सामाजिक अपेक्षाओं में फिट नहीं बैठती। और, तभी नाना पाटेकर का किरदार आता है-एक रहस्यमय, लगभग जादुई आदमी, जो दावा करता है कि वह बारिश ला सकता है। वह सिर्फ मौसम बदलने नहीं आता। वह लोगों की नजर बदलने आता है। और यही इस फिल्म की खूबसूरती है।
यहां, नाना का किरदार कोई पारंपरिक प्रेमी नहीं है, वह किसी लड़की को पाने नहीं आया था, वह उसके भीतर यह भरोसा जगाता है कि वह जैसी है, वैसी भी सुंदर हो सकती है, कि जीवन केवल दूसरों की स्वीकृति से नहीं चलता। फिल्म का सबसे सुंदर विचार शायद यही है-कभी-कभी बारिश बाहर नहीं होती, पहले भीतर होती है। और, इस भूमिका में नाना का अभिनय उनके गुस्सैल, विस्फोटक किरदारों से बिल्कुल अलग है। नाना नरम हैं, रहस्यमय हैं, थोड़े शरारती हैं, और सबसे बढ़कर, उम्मीद से लबालब भरे हुए हैं।
नाना की सबसे प्रसिद्ध चीज उनकी आवाज थी, लेकिन हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि अभिनेता की असली ताकत आवाज में नहीं, आवाज के पहले और बाद की खामोशी में होती है। नाना को यह अच्छी तरह मालूम था। वह संवाद बोलते नहीं थे, उसे अपने भीतर से निकालते थे। उनकी आवाज में कभी महाराष्ट्र की मिट्टी सुनाई देती थी, कभी मुंबई की सड़क, कभी किसी छोटे आदमी का गुस्सा और कभी किसी बूढ़े आदमी की थकान। नाना पाटेकर की सामाजिक चिंता को उनकी अभिनय-यात्रा से अलग करके देखना भी ठीक नहीं होगा। उन्होंने गरीबी देखी थी। बचपन में परिवार की आर्थिक मुश्किलों के कारण कम उम्र में काम करना पड़ा। उन्होंने बाद में बताया था कि तेरह साल की उम्र में वह फिल्मी पोस्टर रंगने का काम करते थे और रोज कई किलोमीटर पैदल जाते थे। शायद इसलिए किसान का दुख उनके लिए अखबार की कोई खबर नहीं थी।
2015 में महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित इलाकों में किसानों की आत्महत्याओं और उनके परिवारों की हालत को लेकर नाना ने जमीनी स्तर पर मदद शुरू की। यहां नाना पाटेकर का एक अलग ही चेहरा दिखाई देता है। फिल्म का आदमी अपने संवादों से तालियां पा सकता है। लेकिन, गांव में किसी विधवा के घर जाकर बैठना, किसी किसान परिवार की बात सुनना, पानी के सवाल को समझना, इससे कोई तालियां नहीं मिलतीं।
नाना के किरदार अक्सर टूटे हुए थे, गुस्से में थे, व्यवस्था से लड़ रहे थे, कभी हिंसक थे, कभी असहाय। लेकिन, नाना के भीतर का अभिनेता हमेशा किसी न किसी संभावना की तलाश करता था। यही बात थोड़ा सा रूमानी हो जाएं में सबसे साफ दिखाई देती है। वहां वह आदमी बारिश का वादा करता है। लेकिन असल में वह कह रहा होता है ‘मुश्किल है जीना, उम्मीद के बिना।’ और, शायद यही नाना की अपनी जिंदगी का भी एक रूपक है। एक अभिनेता, जिसने अपने हिस्से की गरीबी देखी, कला की कठिन राह देखी, स्टारडम देखा, गुस्सा देखा, राजनीति देखी, किसानों का दुख देखा, और फिर भी आदमी पर से भरोसा नहीं उठने दिया। आज उन्हें याद करने का सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि किसी शाम उनकी वह पुरानी फिल्म लगाई जाए-थोड़ा सा रूमानी हो जाएं। धीरे-धीरे देखिए। शायद आपको वहां वह नाना मिलें, जो जानते थे कि आदमी को सिर्फ गुस्से की जरूरत नहीं होती। उसे सपने भी चाहिए, उसे बारिश भी चाहिए, उसे प्रेम भी चाहिए, और सबसे बढ़कर उम्मीद चाहिए।
नाना पाटेकर हमारे बीच से उठकर चले गए हैं। लेकिन, शायद ऐसे अभिनेता पूरी तरह जाते नहीं, वे अपने किरदारों में बचे रहते हैं, किसी किसान की आंख में, किसी बूढ़े आदमी की आवाज में, किसी अकेली लड़की के अचानक मुस्कुरा देने में, और उस सूखी हुई जमीन पर गिरती पहली बारिश में, जहां कोई दूर से अब भी कह रहा है-थोड़ा सा रूमानी हो जाएं। नाना एक खुदरंग अभिनेता के रूप में दर्ज रहेंगे, अपनी तरह के, खालिस। शायद आज नाना को याद करने के लिए इतना ही काफी है।