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विचार: अकेलापन कोई महामारी नहीं, तलाशें ऐसा एकांत जहां हो अपने अस्तित्व की स्वतंत्रता पर गर्व
Sun, 05 Jan 2025 06:53 AM IST
शिव शुक्ला
जेसिका ग्रोस
जेसिका ग्रोस
Published by: शिव शुक्ला
Updated Sun, 05 Jan 2025 06:53 AM IST
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सार
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अकेलापन (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो :
Meta AI
विस्तार
प्राथमिक विद्यालय की मेरी सबसे ताजा स्मृतियों में से एक है, हम सभी बच्चों का एक स्थानीय संत की कब्र को देखने जाना। दरअसल, यह 19वीं सदी के एक विलक्षण जर्मन संत की कब्र है, जो कई भाषाओं में पारंगत थे। बाहर के लोग उन्हें पागल समझते थे, लेकिन गांव के लोग उन्हें एक ऐसा बुद्धिमान संत मानते थे, जो भीड़-भाड़ को पसंद नहीं करता थे और जंगलों के एकांत में अपनी स्वतंत्रता का आनंद उठाते थे। चौथी कक्षा की बच्ची के लिए यह अनुभव थोड़ा अजीब हो सकता है, लेकिन उस संत की यादें अब तक मेरे साथ हैं।
हालांकि मैं जानती हूं कि जंगल में यों अकेले रहना मुश्किल है और ऐसा करने की मेरी कोई मंशा भी नहीं। लेकिन मुझे अकेले समय बिताने का विचार आकर्षित करता है। लेकिन चिंता मुझे इस बात की है कि हम ऐसी संस्कृति बन गए हैं, जो एकांत के विचार को असहनीय और नकारात्मक मानती है। मैंने एक प्रख्यात लेखक का निबंध पढ़ा था, जिसमें बताया गया कि इंटरनेट ने परस्पर जुड़े एक ऐसे समाज का निर्माण किया है, जिसने एकांत ढूंढने की क्षमता ही खो दी है। मुझे लगता है कि एकांत की चाह रखने की भावना बिल्कुल सामान्य है, जो सभी की जिंदगी में कभी न कभी आती है। इसके लिए डॉक्टर को खोजने की जरूरत नहीं होती, इसे बस स्वीकारना होता है।
अकेलापन कोई महामारी नहीं है, लेकिन लोग इससे ऐसे घबराते हैं, मानो यह कोई महामारी हो। अकेलेपन का स्वास्थ्य पर भी बुरा असर बताया गया है। यहां तक कहा गया कि अकेलेपन और मृत्यु दर का संबंध एक दिन में पंद्रह सिगरेट पीने जैसा होता है। इस तरह के विचार दरअसल इतनी बार दोहरा दिए गए हैं, कि ये सत्य लगने लगते हैं। जबकि सच तो यह है कि एकांत पसंद करने और सामाजिक जुड़ाव में कमी, कमजोर सामाजिक समर्थन या समाज से अलग-थलग होने में अंतर है। एकांत की चाह रखना एक शारीरिक संकेत है कि हमें कुछ बेहतर संबंधों की जरूरत है। नए साल में मुझे उस संत-सरीखे एकांत की जरूरत महसूस हो रही है, तो इसका मतलब है कि मैं अकेलेपन को झेलने की ताकत खुद के भीतर पैदा करूंगी। अगर मैं ऐसा कर सकी, तो शायद मेरा एकांत भी एक खूबसूरत अनुभव बन सके। मैं उस शहरी व डिजिटल शोर से दूर होने की कोशिश करूंगी, जिसका फिलहाल मैं हर वक्त अनुभव करती हूं। मैं कोशिश करूंगी कि इस साल मैं भी अपनी स्वतंत्रता की भावना पर गर्व कर सकूं।