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कानून: सियासी सरगर्मियों के बीच 'नागरिकता' चुनावी मुद्दा बनता नहीं दिख रहा; सीएए पर सन्नाटा क्यों है?
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नागरिकता संशोधन कानून के तहत भारतीय नागरिकता देने का नियम
- फोटो :
ani
विस्तार
जिस कानून के चलते तकरीबन पूरा उत्तर भारत महीनों तक धरना और प्रदर्शनों का गवाह बना रहा, जिसके विरोध की आड़ में देश की राजधानी दिल्ली में दंगे हुए, क्या वह अब चुनावी मुद्दा नहीं रहा? यह सवाल नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के संदर्भ में उठ रहा है। लेकिन मौजूदा चुनावी दौर में इस कानून की खुले तौर पर कहीं चर्चा सुनाई नहीं दे रही है।संसद की मंजूरी के बाद जिस अल्पसंख्यक वर्ग ने इस कानून का विरोध किया था, हो सकता है कि उस समुदाय के बीच अब भी इसे लेकर कुछ सवाल हों, लेकिन हर तरफ चुप्पी है। अगर कहीं इसकी थोड़ी-बहुत चर्चा है भी, तो वह पश्चिम बंगाल और केरल जैसे ही राज्य हैं, जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है और वामपंथी दलों का असर है। दिलचस्प यह है कि आचार संहिता लागू होने के दो दिन पहले यानी 14 मार्च को ही अमित शाह कह चुके हैं कि किसी भी हालत में सीएए वापस नहीं लिया जाएगा।
चुनाव के मुद्दे मोटे तौर पर दो तरह से बनते हैं। एक तो किसी मुद्दे, विषय या कानून को लेकर जनता के बीच गहरा असंतोष हो, जिसकी बुनियाद पर वोटों की फसल काटने के लिए विपक्षी दल उसे हवा दे रहे हों या फिर किसी नीति के जरिये सरकार कोई बड़ी कामयाबी हासिल कर चुकी हो या सरकार के किसी फैसले के चलते सकारात्मक बदलाव आया हो। नाकामियों और असंतोष को जहां विपक्षी खेमा चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश करता है, वहीं सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों और कामयाबियों को चुनावी मैदान में लोकमत संग्रह का जरिया बनाता है। सत्ताधारी भाजपा प्रत्याशी स्थानीय स्तर पर भले ही सीएए को उपलब्धि बता रहे हों, लेकिन केंद्रीय स्तर पर भाजपा अभी तक इसे चुनावी मुद्दा बनाते नहीं दिख रही है। वैसे भी भाजपा ने अभी अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी नहीं किया है, लेकिन कांग्रेस ‘न्याय
पत्र’ नाम से अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी कर चुकी है। लेकिन उसके घोषणा पत्र में इस पर चुप्पी साध ली गई है।
दिसंबर, 2019 में जब संसद के दोनों सदनों ने नागरिकता संशोधन विधेयक को मंजूरी दी थी, तब कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और एआईएमआईएम ने कड़ा विरोध जताया था। वामपंथी दल और राष्ट्रीय जनता दल भी इसके विरोध में थे। मुस्लिम संगठन भी इसके विरोध में सड़कों पर उतर आए थे। पीएफआई जैसे संगठन इस कानून के विरोध में देश विरोधी षड्यंत्र रचने में पीछे नहीं रहे। दिल्ली का शाहीन बाग इलाका तो इस कानून के विरोध प्रदर्शन का प्रतीक बन गया। देश भर में, विशेषकर मुस्लिम बहुल इलाकों में जबर्दस्त विरोध-प्रदर्शन हुए। उस समय लगता था कि यह विरोध-प्रदर्शन और धरना अंतहीन रहेगा। लेकिन इस बीच कोरोना महामारी आ गई और शाहीन बाग का धरना खत्म हुआ। लेकिन पूर्वी दिल्ली का इलाका दंगे की आग में धधक उठा था।
इस कानून के पारित होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को राष्ट्रीय स्तर पर एक खास वर्ग ने निशाना बनाया। इस कानून के लिए अमित शाह विशेष रूप से निशाने पर रहे, क्योंकि इस कानून को पारित कराने में उनकी ही भूमिका प्रमुख रही। भाजपा की पार्टी लाइन पर इस कानून में संशोधन करने की उन्होंने हिम्मत दिखाई। विरोध प्रदर्शनों के जरिये विपक्षी खेमे और कानून विरोधियों ने सरकार को झुकाने की खूब कोशिश की, लेकिन सरकार ने कानून वापस नहीं लिया। दरअसर अल्पसंख्यक, विशेषकर मुस्लिम समुदाय में यह भ्रम फैला कि अगर यह कानून पारित हुआ, तो उनकी नागरिकता चली जाएगी, जबकि सरकार इससे बार-बार इन्कार करती रही।
इन्हीं वजहों से माना जा रहा था कि चुनाव के दौरान यह कानून कम से कम विपक्षी खेमे के जरिये मुद्दा जरूर बनेगा। लेकिन कांग्रेस ने एक तरह से इस मसले को कम से कम चुनावों तक के लिए टाल दिया है। हालांकि माकपा अपनी ओर से लोकसभा चुनाव में इसे मुद्दा बनाने की कोशिश जरूर कर रही है। उसने अपने चुनाव घोषणा पत्र में भी इस कानून को हटाने का वादा किया है। इसके अलावा, कांग्रेस की चुप्पी पर माकपा भी सवाल उठा रही है। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने तो इसको लेकर कांग्रेस को खरी-खोटी सुनाई है। सीएए का चुनावी मुद्दा न बनने पर क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि इस कानून को लेकर जो भ्रम और अविश्वास की स्थिति एक खास वर्ग में थी, वह छंट चुकी है? इसका जवाब तो चुनाव नतीजों के बाद ही यह पता चल पाएगा, लेकिन फिलहाल हालात ऐसे ही लग रहे हैं।