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ऐसे जिएं जैसे हर दिन नया हो: हर क्षण को नया मानते हुए जिज्ञासा के साथ जीना जरूरी, यही खुशी का सूत्र

Sun, 18 May 2025 07:02 AM IST
ज्योति भास्कर कैथरीन पियर्सन, द न्यूयॉर्क टाइम्स
कैथरीन पियर्सन, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: ज्योति भास्कर Updated Sun, 18 May 2025 07:02 AM IST
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सार
खुशी का सूत्र हर दिन को जीवन के आखिरी दिन की तरह जीने में नहीं, बल्कि हर क्षण को नया मानते हुए जिज्ञासा के साथ जीने में है।
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Live as if every day is new curiosity and considering every moment new vital this is formula of happiness
हैप्पीनेस (प्रतीकात्मक) - फोटो : adobe stock

विस्तार

हमने ब्रुकलिन में पहली बार ‘वेल फेस्टिवल’ का आयोजन किया, जिसमें स्वास्थ्य के क्षेत्र के कुछ सबसे बड़े नाम बातचीत के लिए एक साथ आए। ज्यादातर बातचीत सामान्य स्वास्थ्य पर केंद्रित थी, जैसे पोषण, मानसिक स्वास्थ्य और फिटनेस। लेकिन जब मैं दर्शकों के बीच बैठी, तो मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि बहुत-सी बातचीत इस पर केंद्रित थी कि एक स्वस्थ, सार्थक जीवन के के लिए खुशी कितनी जरूरी है। विशेषज्ञों ने खुशी बढ़ाने वाले तीन उपायों की चर्चा की।



रिश्तों पर ध्यान दें
मनोचिकित्सक डॉ. रॉबर्ट वाल्डिंगर, जो खुशी पर लंबे समय से जारी अध्ययन की देखरेख करते हैं, का कहना है कि अगर आप लंबा और खुशहाल जीवन जीना चाहते हैं, तो अपने रिश्तों पर ध्यान दें। अध्ययन में पाया गया है कि मजबूत रिश्ते उम्र बढ़ने के साथ लोगों में खुशी फैलाने के सबसे बड़े कारकों में से एक है। डॉ. वाल्डिंगर ने कहा कि अपने परिचितों से बेहतर संबंध रखना कोई बहुत कठिन काम नहीं है।


वह करें, जो खुशी दे
मनोवैज्ञानिक केली मैकगोनिगल बचपन में सुधारात्मक शारीरिक शिक्षा की कक्षा में पढ़ती थीं। उन्होंने आनंदपूर्ण गतिविधियों के इर्द-गिर्द अपना कॅरिअर बनाया। वह बताती हैं कि व्यायाम हमें अधिक प्रेरित और आशावान महसूस करने में मदद कर सकता है, और यह ‘हमारे मस्तिष्क के रसायन विज्ञान को इस तरह से बदलता है, जिससे दूसरों से जुड़ना आसान हो जाता है।’ बस अपने शरीर को हिलाने के ऐसे तरीके खोजें, जो आनंददायक हों, बोझिल न हों। इसलिए इस पर विचार करें कि आपको कैसी गतिविधियां अच्छी लगती हैं। कुछ लोगों को दौड़ना चुनौतीपूर्ण लग सकता है, जो उस समय तो खराब लगता है, लेकिन बाद में मजबूती का एहसास करता है। 

छोटे-छोटे क्षणों में खुशियां ढूंढें
बेस्टसेलर पुस्तक द बुक ऑफ अल्केमी की लेखिका सुलेका जौआद को बीस की उम्र में ल्यूकेमिया का पता चला था। पिछली गर्मियों में उन्हें फिर से बीमारी हुई, और कई लोगों ने सलाह दी कि हर दिन ऐसे जिएं, जैसे कि यह उनका आखिरी दिन हो। लेकिन हर बार ऐसा सुनकर उन्हें घबराहट होने लगती थी। उन्होंने कहा, ‘हर पारिवारिक डिनर को यथासंभव सार्थक बनाने की कोशिश करना थका देने वाला है, इसलिए मैंने ऐसा करना छोड़ दिया है। इसके बजाय, उन्होंने हर दिन को ऐसे जीने का विचार किया, जैसे कि यह जीवन का पहला दिन हो-जिज्ञासा, आश्चर्य और चंचलता की भावना के साथ।’ जौआद ने कहा, ‘ये हमेशा छोटे-छोटे क्षण होते हैं, जो खुशी देते हैं।’

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