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हम सब आत्ममंथन करें: आईने में खुद को गौर से देखकर पूछना होगा, लोकतंत्र और बहुलवाद के मूल्यों पर समर्पण...

Sun, 18 May 2025 06:58 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 18 May 2025 06:58 AM IST
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सार
पहलगाम हमले के बाद उपजे हालात में हमें आईने में खुद को गौर से देखना चाहिए और पूछना चाहिए कि क्या यह समय आ गया है कि हम लोकतंत्र और बहुलवाद के अपने संस्थापक मूल्यों के प्रति खुद को फिर से समर्पित करें।
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Let us all introspect look in mirror and ask our dedication to values of democracy and pluralism
पहलगाम आतंकी हमला - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत और पाकिस्तान का उदय एक ही समय पर हुआ था। दोनों को एक समान राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विरासत मिली। अपने अस्तित्व के लगभग आठ दशकों में दोनों की किस्मत में काफी अंतर आ गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था अधिक तेजी से आगे बढ़ी है और भारत में प्रति व्यक्ति आय अब पाकिस्तान से लगभग दोगुनी है। भारत एकजुट रहा, जबकि पाकिस्तान ने 1971 में अपना अधिक आबादी वाला पूर्वी हिस्सा खो दिया, जो बांग्लादेश के रूप में संप्रभु राष्ट्र बन गया। भारत में नियमित रूप से और कड़ी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा वाले आम चुनाव होते हैं, जबकि पाकिस्तान में चुनाव का समय और परिणाम, सेना के जनरल द्वारा तय किए जाते हैं।



भारत ने पाकिस्तान से इतना बेहतर प्रदर्शन क्यों किया है? आजादी के बाद हमारे नेताओं ने तर्कसंगत सोच विकसित करने और आर्थिक प्रगति को बढ़ावा देने में आधुनिक विज्ञान के महत्व पर जोर दिया। पाकिस्तान की सोच जिस तरह की रही है, उसमें मोहम्मद अली जिन्ना का कार्यकाल अगर जवाहर लाल नेहरू जितना लंबा होता, तब भी यह शायद ही मुमकिन हो पाता कि वहां आईआईटी या टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च जैसे उत्कृष्ट केंद्र स्थापित होते। 1991 में परमिट कोटा राज खत्म होने के बाद भारत ने ढाई दशक तक अच्छा आर्थिक विकास किया। यह मुमकिन नहीं हो पाता, अगर भारत क्षेत्रीय टुकड़ों में बंटा होता, निरंकुश ढंग से चलता या धर्मशासित राज्य होता। पाकिस्तान शीत युद्ध के बाद मिले आर्थिक अवसरों का लाभ नहीं उठा सका, क्योंकि राजनीति में सेना की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो गई और इस्लाम का कट्टरपंथ रोजमर्रा की जिंदगी पर हावी हो गया। पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने, ओसामा बिन लादेन को पनाह देने और परमाणु प्रसार में उसकी भूमिका की वजह से और धूमिल हो गई।


भले ही दोनों देशों ने अलग-अलग रास्ते चुने, वैश्विक कल्पना में भारत और पाकिस्तान की बात कभी-कभी एक ही सांस में की जाती थी। ऐसा इसलिए था, क्योंकि दोनों देशों ने कश्मीर पर तीन युद्ध लड़े थे। हालांकि 2000 के दशक की शुरुआत तक भारत आर्थिक और राजनीतिक रूप से इतना आगे निकल गया था कि शायद ही कोई तब भारत और पाक को लेकर प्रश्न करता था। भारत को चीन के साथ जोड़ने की बात भी हुई, जैसा कि ‘चिंडिया’ के विचार में था। चीन का आर्थिक उत्थान अधिक महत्वपूर्ण था, भारत की लोकतांत्रिक और बहुलवादी साख ने इसे यूरोप, उत्तरी अमेरिका और जापान में भी एक आकर्षक विकल्प बना दिया।

हालांकि पहलगाम में हुए हमले और हमारी सरकार की जवाबी कार्रवाई के बाद कई सवाल खड़े हो गए। डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान को महान देश और उनके साथ अपने अच्छे रिश्ते का हवाला देते हुए दोनों को युद्धविराम के लिए मनाया और कहा, उम्मीद है कि जब तक दोनों देश आपस में अच्छा व्यवहार करेंगे, तब तक वह उनके साथ व्यापार करते रहेंगे। जले पर नमक छिड़कते हुए ट्रंप ने हजारों साल पुराने कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता करने की भी बात कही।

ट्रंप एक अनिश्चित और अप्रत्याशित छवि वाले ऐसे व्यक्ति हैं, जो व्यक्तिगत अहंकार से प्रेरित हैं। फिर भी वह दुनिया के सबसे अमीर और शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति हैं। ऐसे में हमें उनकी बातों को गंभीरता से लेना चाहिए। शनिवार 10 मई को जब भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे पर मिसाइल और ड्रोन से हमले कर रहे थे, ‘द फाइनेंशियल टाइम्स’ ने ‘दो धार्मिक बाहुबलियों की लड़ाई’ शीर्षक से रिपोर्ट छापी। इसमें पाकिस्तानी जनरल असीम मुनीर को कट्टर मुसलमान और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कट्टर हिंदू के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसी अखबार में छपे एक अन्य लेख में नरेंद्र मोदी की चीन समर्थित पाकिस्तान के साथ दुश्मनी का भी जिक्र किया गया है।

आतंकवाद निर्यात करने वाले देश और दुनिया की बड़ी कंपनियों को सीईओ देने वाले देश की तुलना नहीं की जा सकती है। फिर भी हमें खुद से इस बात को पूछना चाहिए कि क्या हम हाल के वर्षों में पिछड़ गए हैं? क्या राष्ट्रपति बुश, ओबामा या बाइडेन कभी भारत-पाकिस्तान को एक साथ जोड़ते या दोनों के बीच मध्यस्थता करने की बात कहते? क्या ‘द फाइनेंशियल टाइम्स’ ने कभी मनमोहन सिंह, नरसिंह राव, राजीव गांधी, देवगौड़ा, यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी को धार्मिक कट्टर कहा?

एक इतिहासकार और नागरिक के तौर पर मैं यह तर्क दूंगा कि भारत पिछले कुछ दशक में पिछड़ गया है। हमारे यहां नियमित रूप से राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तरों पर चुनाव होते हैं, इसके बाद भी चिंता जताई जाती है कि क्या ये पूरी तरह से स्वतंत्र और निष्पक्ष होते हैं? मीडिया का एक बड़ा वर्ग सत्ता के प्रचार का माध्यम बन गया है। हमारी जांच एजेंसियां पक्षपाती हो गई हैं। विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में राज्यपाल हमारे संघीय ढांचे को कमजोर कर रहे हैं। साथ ही हमारे धर्मनिरपेक्ष और बहुलवादी चरित्र पर हमले भी हो रहे हैं। संघर्ष के दौरान महिला मुस्लिम सैन्य प्रवक्ता के प्रतीकात्मक महत्व को एक वरिष्ठ भाजपा नेता की टिप्पणियों ने जल्द ही धूमिल कर दिया। हालांकि देर से ही सही, उन्होंने माफी मांग ली। प्रतिभाशाली मोहम्मद जुबैर, जिन्हें मिसाइलों के उड़ान भरने के दौरान तथ्यों की जांच करने के लिए सराहा गया था, को तब से धमकियां मिल रही हैं। यह देखना अभी बाकी है कि हाल के वर्षों में नोएडा मीडिया और हिंदुत्व विचारकों द्वारा मुसलमानों को जिस तरह से शैतान के रूप में पेश किया जा रहा है, यह आने वाले समय में कम होगा या नहीं। पहलगाम हमले के बाद कश्मीर में मनमाने ढंग से गिरफ्तारियां और घरों को गिराना कोई शुभ संकेत नहीं है। जहां तक हमारे प्रधानमंत्री को ‘धार्मिक ताकतवर व्यक्ति’ के रूप में चित्रित करने की बात है तो अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन पर जिस तरह से उन्होंने समारोह के संचालक की भूमिका निभाई, यह उस बात को और पुष्ट करता है।

हमारे लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ढांचे में दरार पड़ने के साथ-साथ हमारी आर्थिक प्रगति भी रुक गई है। चीन और भारत के बीच का अंतर अब इतना बड़ा हो गया है कि ‘चिंडिया’ शब्द प्रचलन से बाहर हो गया है। वियतनाम जैसे छोटे देश ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को चीन से दूर स्थानांतरित करने की पश्चिम की इच्छा का अधिक लाभ उठाया है।

मैं आतंकवाद-रोधी मामलों का कोई विशेषज्ञ होने का दावा नहीं करता, इसलिए इस बहस में नहीं पड़ूंगा कि क्या पहलगाम में पर्यटकों पर हुए बर्बर हमले का कोई बेहतर जवाब हो सकता था? या हमारे सशस्त्र बल ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कई दिनों तक चली भीषण गोलीबारी से क्या सबक सीखा? मेरी चिंता है कि अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में संकट का प्रतिनिधित्व हमें क्या सिखा सकता है। भारत को पाकिस्तान के साथ जोड़ने के नए प्रयासों पर हमें क्या प्रतिक्रिया देनी चाहिए? एक तरफ अंधराष्ट्रवादियों के पास इस विकल्प को छोड़कर दूसरा बचा ही नहीं है कि वे खुद को पीड़ित मान लें, जॉर्ज सोरोस और कथित ‘शहरी नक्सलियों’ को दोष दें और फिर जोर देकर इस बात को कहें कि भारत अब भी विश्व गुरु है और हमेशा रहेगा। दूसरी ओर, विचारशील देशभक्त आत्मपरीक्षण की प्रक्रिया शुरू करेगा। पिछले दशक में भारत में निरंकुशता और बहुसंख्यकवाद का लगातार विस्तार हुआ है। यही वह बात है, जिसकी वजह से उस पड़ोसी देश के साथ हमारी ये नई तुलनाएं सामने आई हैं, जिससे हम लाक्षणिक और शाब्दिक रूप से उसके जन्म के समय अलग हो गए थे। इसलिए हमें आईने में खुद से पूछना चाहिए कि क्या यह समय आ गया है कि हम लोकतंत्र और बहुलवाद के अपने संस्थापक मूल्यों के प्रति खुद को फिर से समर्पित करें।

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