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धूप आने दो: वहां शोक मनाने का वक्त नहीं मिलता, दुख की कोई रस्म नहीं होती
Sun, 02 Jun 2024 06:12 AM IST
निर्मल कांत
डेविड फ्रेंच
डेविड फ्रेंच
Published by: निर्मल कांत
Updated Sun, 02 Jun 2024 06:12 AM IST
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विस्तार
यह एक देश के सैनिकों की कथा नहीं है। हर सैनिक के लिए युद्ध में जिंदगी की यही लय है। कई लोग अपनी पूरी जिंदगी में जितनी मौतें, चोटें और नुकसान का अनुभव नहीं करते हैं, उससे ज्यादा दुखद घटनाओं का अनुभव सैनिकों को थोड़े समय में ही करना पड़ता है। जब किसी सैनिक का अपने परिवार के साथ संपर्क टूट जाता है, तो घर के लोगों को पता चल जाता है कि कुछ गड़बड़ हो गई है। आखिर सैनिक भी इंसान हैं। बटुए में रखी परिवार की तस्वीरें देखकर उनकी आंखों से भी आंसू निकलते हैं।कॉन्टैक्ट आईईडी', जब मैं इराक में तैनात था, तो रेडियो पर ये शब्द सुनता था और मेरा दिल बैठ जाता था। इसका मतलब था कि हमारा कोई वाहन इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोजिव डिवाइस (आईईडी) या सड़क के किनारे रखे गए बम की चपेट में आ गया है। इसका मतलब था नुकसान। इसका मतलब था चोटें। इसका मतलब था मौत। और जब आपके भाइयों की मौत होती है, तो यह आपके दिल पर एक गहरा घाव छोड़ जाती है, जो पूरी तरह से कभी नहीं भरता। एक सैनिक के रूप में देश की सेवा करने की एक अनोखी मांग यह भी है कि सैनिकों के लिए जिंदगी अलग ढंग से होती है, और मौत भी। सामान्य नागरिकों की दुनिया में, मौत हमारे जीवन में बाधा डालती है। हम किसी मरणासन्न रिश्तेदार या मित्र की मदद के लिए सब कुछ छोड़ देते हैं। समय ठहरा हुआ सा प्रतीत हो सकता है। हम सारा काम रोक देते हैं। पारिवारिक यात्राएं स्थगित कर देते हैं। शोक एवं राहत की रस्मों को प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि हम सारा काम-धाम छोड़कर परिवार के साथ बैठते हैं और शोक मनाते हैं। लेकिन युद्ध में ऐसा नहीं होता।
मौतों से युद्ध नहीं ठहरते
युद्ध में मौत से कुछ भी नहीं ठहरता। वक्त रुकता नहीं, बल्कि तेजी से भागता हुआ प्रतीत होता है। और यह बेहद अप्राकृतिक है। जिस क्षण दुश्मनों के साथ हिंसक मुठभेड़ के बारे में बताने के लिए वह कॉन्टैक्ट कॉल मुख्यालय में आती है, आप दो हिस्सों में बंट जाते हैं। आपके भीतर का मानवीय पक्ष यह जानना चाहता है कि क्या किसी को नुकसान हुआ है। और जब आप रेडियो पर वीएसआई (बहुत गंभीर रूप से घायल) या केआईए (कार्रवाई में शहीद) सुनते हैं, तो आप घबराते नहीं, बल्कि आंशिक रूप से भय और चिंता से उबर जाते हैं। लेकिन केवल आंशिक रूप से ही। उस क्षण और उस जगह पर दुख शत्रु है। आप उदास हो ही नहीं सकते। यह आपके दिमाग को धुंधला कर सकता है और आपके निर्णय को प्रभावित कर सकता है। चूंकि आपकी जिंदगी दांव पर लगी होती है, इसलिए आप इसे किनारे रख देते हैं और अपने काम पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
सिर्फ खुद को जिंदा रखना होता है
युद्ध के मैदान में आपको सिर्फ खुद को जिंदा रखना होता है। आप लड़ते हैं, अपने घायल साथी का उपचार करते हैं और मदद के लिए कॉल करते हैं। जब आप युद्ध में होते हैं, तो बस एक अलग तरह का उन्माद होता है। लड़ने और नुकसान का मुंहतोड़ जवाब देने, दोनों की तत्काल जरूरत होती है। सैनिकों का एक समूह लड़ाई का निर्देशन करता है, हवाई संसाधनों को हमले की जगह पर भेजता है, गोलीबारी में घिरे सैनिकों के समर्थन के लिए त्वरित प्रतिक्रिया बल यानी क्यूआरएफ को भेजता है और तात्कालिक खतरे का जवाब देने के लिए तोपखाने को गोले बरसाने का आदेश देता है। अन्य सैनिक मारे गए जवानों की निजी वस्तुओं को इकट्ठा करते हैं और फिर कुछ अन्य लोग इंटरनेट का प्लग खींच देते हैं, जिससे बेस का उसके दोस्तों और परिजनों से संपर्क खत्म हो जाता है।
बटुए में रखी परिवार की तस्वीर
हम नहीं चाहते कि शहीद सैनिक के परिजनों को टैक्स्ट मैसेज या सोशल मीडिया पोस्ट से नुकसान का पता चले। इससे भी बुरी बात यह होती है कि ऑनलाइन अफवाह से हताहत व्यक्ति की गलत पहचान हो सकती है, जिससे अनावश्यक ही परेशानी बढ़ सकती है। सैनिकों के परिवार जानते हैं कि हताहत होने की सूचना व्यक्तिगत रूप से दी जाती है और जब किसी सैनिक का अपने परिवार के साथ संपर्क टूट जाता है, तो घर के लोगों को पता चल जाता है कि कुछ गड़बड़ हो गई है। हम जानते हैं कि हमारे परिवार के लोग डरे हुए हैं, लेकिन हम उनसे संपर्क नहीं कर सकते। हम उन्हें नहीं बता सकते कि हम ठीक हैं। दरअसल, जब इंटरनेट बंद हो जाता है, तो यह बेस पर मौजूद सैनिकों के लिए भी पहला संकेत होता है कि किसी की मौत हो गई है। हम लगातार अपने कर्तव्यों को पूरा करने में डटे रहते हैं, लेकिन हम हैं तो आखिर इन्सान ही। आदेशों पर जान देने के लिए तैयार बैठे हम सैनिकों की भी सभी की तरह निजी भावनाएं होती हैं। बटुए में रखी परिवार की तस्वीरें देखकर हमारी आंखों से भी आंसू निकलते हैं।
टोरे एक दोस्त, पति और पिता भी था
‘क्यूआरएफ छोटे हथियारों से गोलीबारी का सामना कर रही है।' 'इसकी पुष्टि हो चुकी है। हमने फॉक्स सिक्स को खो दिया। हमने टोरे को खो दिया।' अगले ही पल मुझे ऐसा लगा, मानो किसी ने पेट में मुक्का मार दिया हो। मैं उल्टी करना चाहता था। मेरी आंखों में आंसू तैर रहे थे। फॉक्स ट्रूप, सेकेंड स्क्वाड्रन, थर्ड आर््मर्ड कैवेलरी रेजिमेंट का कमांडर टोरे मल्लार्ड मेरा दोस्त था। वह एक पति और पिता भी था। हमने उसकी मौत से एक दिन पहले ही सेना से बाहर निकलने के बाद की योजनाओं पर बात की थी। वह बहुत कुछ कर सकता था, लेकिन अब वह चला गया। अब हमें अपने काम पर ध्यान केंद्रित करना था।
युद्ध में जिंदगी
कमांड-डिटोनेटेड आईईडी का मतलब था कि विस्फोट मैन्युअल तरीके से किया गया था। इसका यह मतलब भी था कि वे अभी पास में ही हो सकते हैं। संभवतः हम उन्हें खोज सकते थे। या हो सकता है कि दूसरे विद्रोही भी पास में हों और यह बड़े हमले की शुरुआत भर हो। युद्ध में जीवन और मृत्यु की यही लय है। वहां शोक मनाने का समय नहीं होता। कई लोग अपनी पूरी जिंदगी में जितनी मौतें, चोटें और नुकसान का अनुभव नहीं करते हैं, उससे ज्यादा दुखद घटनाओं का अनुभव सैनिकों को थोड़े समय में करना पड़ता है। उनके छोटे-छोटे स्मारक हैं, लेकिन सच्ची अंत्येष्टि नहीं। यहां दुख की कोई रस्म नहीं होती। इसलिए आप दुख को दूर धकेलते रहते हैं। लेकिन आप इससे पूरी तरह भाग नहीं सकते। और जिन दोस्तों को आपने खोया, उनकी यादें आपको परेशान करती हैं। टोरे की मृत्यु के बाद कई दिनों तक मैं परेशान रहा। वह मुझे दिखता था। उसकी हंसी मुझे सुनाई देती थी। जब लगता था कि युद्ध थोड़ा धीमा हुआ है, अब कुछ ठहरा जा सकता है, तभी अचानक दूसरी कॉल आती है- कॉन्टैक्ट आईईडी। और, आपका दिल फिर से बैठ जाता है, आप फिर से काम पर ध्यान लगाते हैं और ऐसा आप बार-बार तब तक करते हैं, जब तक कि आप लौटकर घर नहीं आ जाते।
जिंदगी का युद्ध ज्यादा मुश्किल
मैं जब उन पुराने सैनिकों से बात करता हूं, तो दो बातें सामने आती हैं। एक तो यह कि हम उद्देश्य के खोने से जूझते हैं। मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा, मुझे अपनी तैनाती से नफरत थी, लेकिन मुझे यह तो पता होता था कि मैं वहां क्यों हूं और मुझे वहां क्या करना है। जिंदगी की लड़ाई ज्यादा खतरनाक है, जहां पता ही नहीं होता कि हम यहां क्यों हैं। दूसरी बात यह कि घर लौटने पर हम उन दुखों का सामना करते हैं, जिनसे हम किनारा कर चुके थे। अपने शहीद साथियों की यादें उमड़ने लगती हैं। आज बेशक हम अपने परिवार के साथ हैं, लेकिन जब हम अपने परिवार से दूर थे, तब बेहद मुश्किल हालातों में वही सैनिक तो हमारा परिवार थे।
वह यादगार रात
आज हम भले ही पूरे देश में बिखरे हुए हैं, लेकिन हमें अब भी एक-दूसरे की जरूरत थी। उन गर्मियों में हम अपने साथी एवन के घर गए, जो हमारी टुकड़ी का अंतिम शहीद था। हम उसके दोस्तों से मिले, उसके माता-पिता और बहन से भी मिले। उनकी आंखें हममें एवन को देख रही थीं। हमने खूब बातें कीं। वे सभी बड़े खुश थे। वह रात यादगार थी।