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लंबे युद्ध के सबक: क्या 'मुक्तिदायक' के रूप में याद किया जाएगा इस्राइल-हमास टकराव!

Thu, 09 Oct 2025 07:30 AM IST
Brett Stephens ब्रेट स्टीफेंस
Updated Thu, 09 Oct 2025 07:30 AM IST
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सार
निश्चित रूप से फलस्तीन पीड़ित है, लेकिन इसका कारण हमास है। जो लोग इस्राइल विरोधी रैलियां निकालकर ‘तत्काल युद्ध विराम’ का राग अलाप रहे हैं, वे यह भूल जाते हैं कि सात अक्तूबर, 2023 से पहले तक युद्ध विराम ही था, जिसका हमास ने सबसे भयावह तरीके से उल्लंघन किया।
 
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Lessons from War: Will Israel-Hamas Confrontation Be Remembered as 'Liberating'?
इस्राइल-हमास संघर्ष के दो साल - फोटो : ANI

विस्तार

हालांकि यह तय नहीं है, लेकिन अगर इस हफ्ते गाजा में युद्ध रुक जाता है, तो मेरा मानना है कि इससे मिलने वाले सबक को लेकर एक अन्य बहस छिड़ सकती है। माया एंजेलो की चेतावनी पर वर्ष 1988 में ही यकीन करना चाहिए था, जब हमास ने अपनी स्थापना के वक्त ही यहूदियों का कत्लेआम करने की मंशा जाहिर की थी। लेकिन वैचारिक सुविधा के कारण इस्राइल हमास को बर्दाश्त करता रहा, क्योंकि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए विभाजित फलस्तीनी राजनीति अनुकूल थी और अंतरराष्ट्रीय जगत भी हमास को उखाड़कर फेंकने के प्रति अनिच्छुक था। इस दुर्दांत समूह को सात अक्तूबर, 2023 तक बर्दाश्त किया गया, जबकि उस दिन मारे गए 1,200 लोगों के लिए तब तक बहुत देर हो चुकी थी।



हमास और इस्राइल के बीच लगातार संघर्ष के बावजूद गाजा पर नियंत्रण करने की इस्राइल की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है, क्योंकि जैसा कि व्हाइल इस्राइल स्लीप्ट नामक किताब के सह-लेखक याकोव काट्ज ने मुझे लिखा, आयरन डोम जैसी तकनीकों के चलते इस्राइल इस भ्रम में रहा कि ‘वह अभेद्य’ है। लेकिन सात अक्तूबर को इस्राइल की सिग्नल इंटेलिजेंस, मिसाइल इंटरसेप्टर, दुरुस्त बाड़ और भूमिगत अवरोध जैसी उच्च तकनीकें हमास के कम तकनीकी क्षमता वाले पैराग्लाइडरों और बुल्डोजरों के आगे अनुपयोगी साबित हुईं।


डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने कहा था, ‘कमजोरी उत्तेजक होती है।’ लेकिन कमजोरी का आभास भी उत्तेजक होता है। हमास के दिवंगत नेता याह्या सिनवार ने तभी इस्राइल की कमजोर ग्रंथि का अंदाजा लगा लिया था, जब इस्राइल ने अपने सिर्फ एक सैनिक गिलाद शलित के बदले में उसे और अन्य सैकड़ों फलस्तीनी कैदियों को रिहा किया था। लेकिन सात अक्तूबर के हमले से कुछ महीनों पहले तक इस्राइल इतना कमजोर कभी नहीं दिखा था, क्योंकि नेतन्याहू सरकार ने न्यायिक ‘सुधार’ के लिए काफी जोर लगाया था।

इस्राइल की सरकार से बेहतर तो वहां के आम लोग हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण साठ वर्षीय सेवानिवृत्त जनरल नोआम टिबोन हैं, जो अपनी पत्नी गैली के साथ गाड़ी चलाकर अपने बेटे आमिर और उसके परिवार को बचाने के लिए किबुत्ज पहुंचे थे, जिस पर हमास का कब्जा हो गया था। अगले दिन टिबोन ने द टाइम्स से कहा था, ‘हम जानते थे कि अगर हम उन्हें बचाने नहीं गए, तो कोई नहीं जाएगा।’ नोआम ने अपने परिवार को बचाने में कामयाबी हासिल की, जबकि गैली ने घायल इस्राइलियों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। ऐसी कई कहानियां हैं। सामुदायिक जिम्मेदारी के ताल्मुद विचार-‘सभी इस्राइली एक-दूसरे के लिए जिम्मेदार हैं’-ने ही सात अक्तूबर को यहूदियों को बचाया था।

विडंबना है कि मॉन्ट्रियल से लेकर मेलबर्न तक के इस्राइल-विरोधी, जो यूरोपीय भाषाएं बोलते हैं और ऐसी जमीन पर रहते हैं, जो अक्सर मूल निवासियों से छीनी गई थी, हिब्रू भाषी इस्राइल को उपनिवेशवाद का प्रतीक मानने लगे हैं। इस्राइली समर्थकों को एक यहूदी राज्य के रूप में अपने अस्तित्व के अधिकार के बारे में दलील देने की जरूरत है। यह आयरिश लोगों के आयरिश राज्य या यूनानियों के ग्रीक राज्य के अधिकार से अलग नहीं है। यह बहस का विषय नहीं हो सकता कि यहूदी ज्यादा पीड़ित हैं या फलस्तीनी। इस्राइल का जन्म यहूदियों के उत्पीड़न को खत्म करने के लिए हुआ था, न कि उसे प्रदर्शित करने के लिए।

यहूदी लोगों के प्रति शत्रुता यहूदी-विरोध को जन्म देता है और यहूदी-विरोध यहूदी लोगों के प्रति शत्रुता पैदा करता है। बीते हफ्ते योम किप्पुर के दिन जिहाद अल-शमी नाम के एक ब्रिटिश व्यक्ति ने मैनचेस्टर के एक यहूदी उपासना गृह में अपनी कार घुसा दी, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई। पुलिस ने कहा कि वह ‘हमले के पीछे की मंशा को समझने की कोशिश कर रही है।’ वाकई, यह हमला दर्शाता है कि कैसे अकादमिक सेमिनारों और वामपंथी पत्रिकाओं के बाहर ‘यहूदी’ और ‘यहूदीवाद’ के बीच का अंतर उन लोगों के लिए या तो अदृश्य है या दिखावटी, जो किसी न किसी को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं।

निश्चित रूप से फलस्तीन पीड़ित है, लेकिन इसका कारण हमास है। बीते दो वर्षों से जो लोग इस्राइल विरोधी रैलियां निकालकर ‘तत्काल युद्ध विराम’ का राग अलाप रहे हैं, वे यह भूल जाते हैं कि सात अक्तूबर, 2023 से पहले तक युद्ध विराम ही था, जिसका हमास ने सबसे भयावह तरीके से उल्लंघन किया। जो लोग फलस्तीनी नागरिकों की पीड़ा की निंदा करते हैं, उन्हें इसकी भी निंदा करनी चाहिए कि हमास लगातार और जानबूझकर आम गाजावासियों को युद्ध छेड़कर खतरे में डालता रहा है। बीते दो वर्षों में यदि हमास ने हथियार डाल दिए होते, तो यह युद्ध कब का समाप्त हो गया होता, जिससे वह अब भी कतरा रहा है। इस्राइल से लगातार युद्ध विराम की मांग करने वाले प्रदर्शनकारी यह मांग हमास से क्यों नहीं करते?

यदि हमास या कोई अन्य आतंकी समूह सैन्य या राजनीतिक ताकत के रूप में बचे रहेंगे, तो कोई फलस्तीनी राज्य नहीं होगा। हाल ही में फ्रांस, ब्रिटेन और अन्य कम महत्व के देशों ने इस्राइल पर दबाव बनाने के लिए फलस्तीनी राज्य को मान्यता देने का निरर्थक कूटनीतिक कदम उठाया है, जिससे कोई फायदा नहीं होने वाला है। स्थायी फलस्तीनी राज्य का एकमात्र व्यावहारिक उपाय फलस्तीनियों के बीच एक सांस्कृतिक क्रांति है, जो इस्राइल के विनाश की कल्पना को हमेशा के लिए समाप्त कर दे।

तमाम भयावहताओं के बावजूद यह युद्ध मुक्तिदायक के रूप में याद किया जाएगा। यह युद्ध लेबनानियों के लिए मुक्तिदायक रहा है, जिन्हें दो पीढ़ियों में पहली बार हिजबुल्ला के क्रूर नियंत्रण से मुक्त होने का अवसर मिला है। सीरियाई लोग बशर अल-असद के शासन को उखाड़ फेंकने में सक्षम नहीं होते, अगर इस्राइल ने हिजबुल्ला समेत असद के मददगारों का सफाया न किया होता। दक्षिणी सीरिया के ड्रूज के लिए भी यह मुक्तिदायक है, जिन्हें इस्राइली सेना द्वारा संरक्षित किया जा रहा है। यह गाजावासियों के लिए मुक्तिदायक है, जो हमास के युद्ध शुरू करने की इच्छा के कारण पीड़ित थे, जिन्हें पता था कि इससे पीड़ा होगी। तीन हजार वर्षों के इतिहास के बावजूद यहूदियों की हालत पहले जैसी संकटपूर्ण है। अच्छे दोस्त और साथियों के बावजूद वे आज भी अकेले हैं।       

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