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चीन से सीखें भाषाई बोध: राष्ट्रभाषा के बीच शाब्दिक ही नहीं, भावात्मक फर्क भी

Wed, 07 Jan 2026 07:38 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Wed, 07 Jan 2026 07:38 AM IST
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सार
चीन ने हर वर्ष सितंबर के तीसरे हफ्ते को 'राष्ट्रीय सामान्य भाषा और लिपि संवर्धन एवं प्रचार सप्ताह' के रूप में मनाना तय किया है।
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Learn linguistic wisdom from China National languages have not only literal but also emotional differences
राष्ट्र भाषा से भावनात्मक लगाव जरूरी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिंदी के संदर्भ में देखें, तो राजभाषा और राष्ट्रभाषा के बीच शाब्दिक ही नहीं, भावात्मक फर्क भी है। फिर भी एक बड़ा वर्ग हिंदी को राष्ट्रभाषा भी मानता है। यही वजह है कि हर साल ग्रेगोरियन कैलेंडर के नौंवे महीने के दस्तक देने के साथ ही, हर सरकारी दफ्तर राजभाषा पखवाड़े या महीने को लेकर उत्साह से भर उठता है। कुछ ऐसा ही पड़ोसी चीन में भी अब होता नजर आ रहा है। अब वहां सितंबर का तीसरा सप्ताह 'राष्ट्रीय सामान्य भाषा और लिपि' को समर्पित होगा। सितंबर के महीने में भारत में जहां राष्ट्रभाषा बनाने की आस में हिंदी के राजभाषा ओहदे को याद किया जाएगा, वहीं चीन मंदारिन को बाकायदा राष्ट्रभाषा के तौर पर और आगे बढ़ाएगा।


हालांकि, चीन और भारत के भाषाई चिंतन और व्यवहार में फर्क साफ नजर आता है। चीन की सर्वोच्च विधि निर्माता संस्था 'राष्ट्रीय जन प्रतिनिधि सभा' की स्थायी समिति द्वारा बीते 27 दिसंबर को इससे जुड़ा कानून पारित करना इसी सोच का प्रतीक है। इस कानून में हर वर्ष सितंबर के तीसरे सप्ताह को 'राष्ट्रीय सामान्य भाषा और लिपि संवर्धन एवं प्रचार सप्ताह' के रूप में मनाना तय किया गया है। यह कानून पुराने राष्ट्रीय भाषा कानून में संशोधन के बाद आया है। चीन में दो तरह की मंदारिन का प्रयोग होता है, एक लिखित और दूसरी मौखिक। इसमें दोनों का ध्यान रखा गया है।


चीन अपनी भाषा और लिपि को अपने राष्ट्र का प्रतीक मानता है। चीन में इन दिनों प्रौद्योगिकी और डिजिटल जगत में लगातार प्रगति हो रही है। यहां ऑडियो-विजुअल प्रोग्रामिंग और गेमिंग भी बढ़ी है। कहा जा सकता है कि चीनी राष्ट्रभाषा और लिपि कानून में यह संशोधन तेजी से विकसित हो रही संचार प्रौद्योगिकियों और ऑनलाइन सामग्री के विस्तार के बीच भाषा के मानकीकरण को मजबूत करने की कोशिश है। इसके तहत अब ऑनलाइन सांस्कृतिक कार्यक्रमों, वेब सीरीज, ऑनलाइन फिल्मों, ऑनलाइन गेम और अन्य डिजिटल प्रकाशनों में मानक चीनी भाषा यानी मंदारिन और मानकीकृत चीनी अक्षरों को मूल भाषा के रूप में उपयोग करना जरूरी होगा।

इसके साथ ही चीन में होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों, कॉन्फ्रेंस, इवेंट्स आदि के साइनबोर्ड, लेबल या प्रमोशनल मैटीरियल में विदेशी भाषाओं के साथ ही मानक चीनी भाषा भी शामिल करने पर जोर दिया गया है। इसकी तुलना में भारतीय राष्ट्रभाषा और आधुनिक प्रौद्योगिकी संग उसके तालमेल पर नजर डालें, तो फर्क साफ नजर आता है। भारत अब भी राष्ट्रभाषा से दूर है। हिंदी को राष्ट्रभाषा मानने वाली ताकतों के सुर भी अब धीमे पड़ते जा रहे हैं। लेकिन चीन आर्थिक उदारीकरण के बावजूद अपनी भाषा की ओर लौटता नजर आ रहा है।

इसके साथ ही चीन के भाषाई आंकड़ों पर भी नजर डालना जरूरी है। यहां की करीब 80 प्रतिशत से अधिक आबादी मंदारिन बोल सकती है। चीन में करीब 97.33 प्रतिशत लोग साक्षर हैं। इनमें करीब 95 प्रतिशत से अधिक लोग मानक चीनी अक्षरों का प्रयोग करते हैं। चाइना इंटरनेट नेटवर्क इन्फॉर्मेशन सेंटर की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, बीते जून तक चीन में एक अरब 12 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता थे। चीन में इंटरनेट इस्तेमाल की दर 79.7 प्रतिशत तक पहुंच गई है। भाषाई कानून में इन आंकड़ों के मद्देनजर सरकारी और पब्लिक सर्विस वेबसाइट और मोबाइल एप्लिकेशन के लिए भी सरकारी नियमों और मानकों के अनुसार, राष्ट्रीय मानक भाषा का इस्तेमाल करना जरूरी हो गया है।

इस कानून का लक्ष्य 'चीनी राष्ट्र के प्रति मजूबत सामुदायिक भावना का विकास' व 'सांस्कृतिक आत्मविश्वास की मजबूती' है। कानून इस बात पर भी जोर देता है कि बोली और लिखी जाने वाली चीनी भाषा के इस्तेमाल का मकसद राष्ट्रीय संप्रभुता, एकता और जातीय एकजुटता होनी चाहिए। यह कानून शिक्षा में भी मानक चीनी भाषा की भूमिका पर बल देता है। कानून के अनुसार, शिक्षण और पाठ्य सामग्री में मानक मंदारिन ही बुनियादी भाषा होगी। यह भारत की नई शिक्षा नीति जैसा ही है, जिसमें प्राथमिक स्तर पर भारतीय भाषाओं के जरिये शिक्षण पर जोर दिया गया है। इस कानून के तहत संस्कृति, पर्यटन और परिवहन जैसे क्षेत्रों में सेवा देने वाले कर्मचारियों के लिए मानक मंदारिन जानना जरूरी होगा। इसमें मानक चीनी भाषा सीखने या प्रयोग में बाधा डालने पर सजा का प्रावधान भी है। जबकि भारत में भाषा को नकारने को लेकर कोई सजा का प्रावधान नहीं है।

वैसे इस कानून के दुरूपयोग की चिंता भी जताई जा रही है। तिब्बतियों को आशंका है कि इस कानून के तहत उनके खिलाफ दमन का एक और चक्र शुरू हो सकता है। बहरहाल, चीन अपनी मानक भाषा को स्थापित करने का कानून लेकर आया है। हालांकि, भारत के मौजूदा राजनीतिक हालात के मद्देनजर ऐसे कानून का सुझाव देना संभव नहीं लगता। लेकिन चीन के इस भाषाई बोध के बहाने यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि एक दिन भारत में भी ऐसी सोच जरूर विकसित होगी।
 
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