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जानना जरूरी है: श्री हरि ने किया असुर पुत्रों का उद्धार, षड्गर्भ को पूर्वजन्म में शाप से जुड़ी है पौराणिक कथा
Sun, 13 Sep 2026 06:08 AM IST
राकेश कुमार
आशुतोष गर्ग, लेखक एवं अनुवादक
आशुतोष गर्ग, लेखक एवं अनुवादक
Published by: राकेश कुमार
Updated Sun, 13 Sep 2026 06:08 AM IST
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श्रीकृष्ण जन्म कथा
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
जब भगवान विष्णु और देवताओं के अंश पृथ्वी पर अवतरित होने लगे, तब देवर्षि नारद कंस को उसके निकट आते विनाश की सूचना देने मथुरा पहुंचे। उन्होंने कंस से कहा, ‘तुम्हारी छोटी बहन देवकी का आठवां गर्भ तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगा। वह गर्भ देवताओं का सर्वस्व और स्वर्गलोक का आश्रय होगा।’ यह सुनते ही कंस भयभीत हो उठा। उसने अपनी रक्षा के उपायों पर मंत्रियों के साथ विचार करना शुरू किया।
श्रीहरि ने यह सब जानकर सोचा कि कंस देवकी के सात गर्भों को नष्ट कर देगा। इसलिए, अपनी अवतार-योजना को पूरा करने के लिए पहले से ही आवश्यक व्यवस्था करनी होगी। उसी समय भगवान का ध्यान पाताल लोक में रहने वाले छह दैत्यों की ओर गया। ये छहों हिरण्यकशिपु के वंशज और कालनेमि के पुत्र थे। कालनेमि ने इन छहों को मिलाकर ‘षड्गर्भ’ नाम दिया था। वे अपने पितामह हिरण्यकशिपु को छोड़कर ब्रह्मा जी की तपस्या करने लगे। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी उनके सामने प्रकट हुए और बोले, ‘दानवकुल के वीरो! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं। तुम जो वर चाहते हो, मांग लो।’ षड्गर्भ ने एक ही स्वर में वर मांगा, ‘भगवन! हमारा वध देवताओं, नागों, यक्षों, गंधर्वों, सिद्धों, चारणों और मनुष्यों से न हो। महर्षियों के शाप से भी हमारा अहित न हो।’ ब्रह्मा जी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और उन्हें अभय का वर प्रदान करके ब्रह्मलोक चले गए।
जब हिरण्यकशिपु को पता चला कि उसके पौत्रों ने ब्रह्मा जी की आराधना की है, तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ। उसने कहा, ‘तुमने मुझे छोड़कर ब्रह्मा जी से वर प्राप्त किया है, इसलिए अब तुम मेरे प्रिय नहीं रहे। तुमने अपने ही कुल और मेरे स्नेह का अपमान किया है।’ क्रोध में उसने उन्हें शाप दे दिया, ‘तुम छहों अगले जन्म में गर्भ में रहोगे और तुम्हारा वध होगा। तुम देवकी के गर्भ में जन्म लोगे और कंस तुम्हें एक-एक करके मार डालेगा।’ समय आने पर भगवान विष्णु ने अपनी योजना के अनुसार पाताल लोक का स्मरण किया। वहां षड्गर्भ नामक वे छहों दैत्य जल के भीतर एक गर्भगृह में योगनिद्रा में सो रहे थे। भगवान उनके पास पहुंचे और अपनी शक्ति से उनके जीवों को निद्रा की अधिष्ठात्री देवी के संरक्षण में सौंप दिया।
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फिर उन्होंने निद्रा देवी से कहा, ‘मेरी प्रेरणा से इन छहों जीवों को पृथ्वी पर ले जाओ और क्रमशः देवकी के गर्भ में स्थापित करो। कंस इन्हें जन्म लेते ही मार डालेगा। इस प्रकार इनके पूर्वजन्म का शाप भी पूरा होगा और मेरी आगे की योजना का मार्ग भी प्रशस्त होगा।’ भगवान ने आगे कहा, ‘देवकी का सातवां गर्भ मेरा सौम्य अंश होगा। वह मेरा बड़ा भाई बनेगा। जब गर्भ सात महीने का हो जाए, तब तुम उसे देवकी के गर्भ से निकालकर रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर देना। गर्भ के इस प्रकार खींचे जाने के कारण वह ‘संकर्षण’ नाम से प्रसिद्ध होगा। लोग उसे बलराम के नाम से जानेंगे।’ फिर, भगवान ने कहा, ‘जब मैं आठवें गर्भ के रूप में देवकी के यहां जन्म लूंगा, तब कंस मुझे मारने का प्रयास करेगा। उसी समय तुम नंदगोप की पत्नी यशोदा के गर्भ से कन्या के रूप में जन्म लेना। जब मैं देवकी के यहां जन्म लूंगा, तब मुझे यशोदा के पास पहुंचा दिया जाएगा और तुम मेरे स्थान पर देवकी के पास आ जाओगी। कंस इस रहस्य को समझ नहीं सकेगा।’ कंस जब उस कन्या को देवकी का आठवां पुत्र समझकर शिला पर पटकना चाहेगा, तब वह उसके हाथ से निकलकर आकाश में चली जाएगी और दिव्य देवी का रूप धारण कर लेगी।
इस प्रकार श्रीहरि की योजनानुसार घटनाएं घटित हुईं। षड्गर्भों का पूर्वजन्म का शाप पूरा हुआ, देवकी के सातवें गर्भ से बलराम का प्राकट्य हुआ और आठवें गर्भ से स्वयं भगवान विष्णु श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए। यशोदा के यहां योगमाया ने जन्म लिया और दोनों शिशुओं की अदला-बदली हो गई। आगे चलकर श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया और पृथ्वी को उसके अत्याचार से मुक्त किया।
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श्रीहरि ने यह सब जानकर सोचा कि कंस देवकी के सात गर्भों को नष्ट कर देगा। इसलिए, अपनी अवतार-योजना को पूरा करने के लिए पहले से ही आवश्यक व्यवस्था करनी होगी। उसी समय भगवान का ध्यान पाताल लोक में रहने वाले छह दैत्यों की ओर गया। ये छहों हिरण्यकशिपु के वंशज और कालनेमि के पुत्र थे। कालनेमि ने इन छहों को मिलाकर ‘षड्गर्भ’ नाम दिया था। वे अपने पितामह हिरण्यकशिपु को छोड़कर ब्रह्मा जी की तपस्या करने लगे। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी उनके सामने प्रकट हुए और बोले, ‘दानवकुल के वीरो! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं। तुम जो वर चाहते हो, मांग लो।’ षड्गर्भ ने एक ही स्वर में वर मांगा, ‘भगवन! हमारा वध देवताओं, नागों, यक्षों, गंधर्वों, सिद्धों, चारणों और मनुष्यों से न हो। महर्षियों के शाप से भी हमारा अहित न हो।’ ब्रह्मा जी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और उन्हें अभय का वर प्रदान करके ब्रह्मलोक चले गए।
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जब हिरण्यकशिपु को पता चला कि उसके पौत्रों ने ब्रह्मा जी की आराधना की है, तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ। उसने कहा, ‘तुमने मुझे छोड़कर ब्रह्मा जी से वर प्राप्त किया है, इसलिए अब तुम मेरे प्रिय नहीं रहे। तुमने अपने ही कुल और मेरे स्नेह का अपमान किया है।’ क्रोध में उसने उन्हें शाप दे दिया, ‘तुम छहों अगले जन्म में गर्भ में रहोगे और तुम्हारा वध होगा। तुम देवकी के गर्भ में जन्म लोगे और कंस तुम्हें एक-एक करके मार डालेगा।’ समय आने पर भगवान विष्णु ने अपनी योजना के अनुसार पाताल लोक का स्मरण किया। वहां षड्गर्भ नामक वे छहों दैत्य जल के भीतर एक गर्भगृह में योगनिद्रा में सो रहे थे। भगवान उनके पास पहुंचे और अपनी शक्ति से उनके जीवों को निद्रा की अधिष्ठात्री देवी के संरक्षण में सौंप दिया।
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फिर उन्होंने निद्रा देवी से कहा, ‘मेरी प्रेरणा से इन छहों जीवों को पृथ्वी पर ले जाओ और क्रमशः देवकी के गर्भ में स्थापित करो। कंस इन्हें जन्म लेते ही मार डालेगा। इस प्रकार इनके पूर्वजन्म का शाप भी पूरा होगा और मेरी आगे की योजना का मार्ग भी प्रशस्त होगा।’ भगवान ने आगे कहा, ‘देवकी का सातवां गर्भ मेरा सौम्य अंश होगा। वह मेरा बड़ा भाई बनेगा। जब गर्भ सात महीने का हो जाए, तब तुम उसे देवकी के गर्भ से निकालकर रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर देना। गर्भ के इस प्रकार खींचे जाने के कारण वह ‘संकर्षण’ नाम से प्रसिद्ध होगा। लोग उसे बलराम के नाम से जानेंगे।’ फिर, भगवान ने कहा, ‘जब मैं आठवें गर्भ के रूप में देवकी के यहां जन्म लूंगा, तब कंस मुझे मारने का प्रयास करेगा। उसी समय तुम नंदगोप की पत्नी यशोदा के गर्भ से कन्या के रूप में जन्म लेना। जब मैं देवकी के यहां जन्म लूंगा, तब मुझे यशोदा के पास पहुंचा दिया जाएगा और तुम मेरे स्थान पर देवकी के पास आ जाओगी। कंस इस रहस्य को समझ नहीं सकेगा।’ कंस जब उस कन्या को देवकी का आठवां पुत्र समझकर शिला पर पटकना चाहेगा, तब वह उसके हाथ से निकलकर आकाश में चली जाएगी और दिव्य देवी का रूप धारण कर लेगी।
इस प्रकार श्रीहरि की योजनानुसार घटनाएं घटित हुईं। षड्गर्भों का पूर्वजन्म का शाप पूरा हुआ, देवकी के सातवें गर्भ से बलराम का प्राकट्य हुआ और आठवें गर्भ से स्वयं भगवान विष्णु श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए। यशोदा के यहां योगमाया ने जन्म लिया और दोनों शिशुओं की अदला-बदली हो गई। आगे चलकर श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया और पृथ्वी को उसके अत्याचार से मुक्त किया।