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Amritpal Case: क्या पंजाब में अमृतपाल जैसे अतिवादी के लिए कोई जगह है? राज्य के अतीत से सबक लेने की जरूरत
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अमृतपाल सिंह।
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
खालिस्तान का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर है। इस बार मामला कुछ ज्यादा ही पेचीदा नजर आ रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह पंजाब जैसे संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में एक नौसिखिया पार्टी की सरकार है। सत्तारूढ़ भाजपा के कई समर्थक पंजाब में आतंकवाद से निपटने हेतु केंद्रीय शासन की मांग कर रहे हैं। राहत इस बात की है कि पंजाब पुलिस हाथ धोकर जरनैल सिंह भिंडरावाले के राजनीतिक 'बॉडी डबल' अमृतपाल सिंह के पीछे पड़ी है और वह भागता फिर रहा है।
आखिर कौन है यह अमृतपाल सिंह? भारतीय खुफिया एजेंसी रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, अमृतपाल सिंह के फरवरी, 2022 में दुबई से भारत आने के ठीक छह महीने पहले पंजाब में गड़बड़ी करने और बखेड़ा खड़ा करने के लिए किसी बाहरी आदमी को तैयार किए जाने की संभावना के बारे में जानकारी मिली थी, जो पंजाब सरकार के साथ साझा की गई थी। लेकिन राज्य सरकार अमृतपाल सिंह के अमृत संचार मिशन में विश्वास रखने वाले सिखों के एक वर्ग को नाराज नहीं करना चाहती थी, लिहाजा उसने विशेष कुछ नहीं किया। वैसे भी इस तरह के मामले जटिल होते हैं। भिंडरावाले के खिलाफ कार्रवाई के दौरान अतीत का कोई संदर्भ नहीं था। लेकिन अब कार्रवाई करने के पहले यह सोचना पड़ रहा है कि किस तरह 1984 में केंद्र के हस्तक्षेप से राज्य के हालात बद से बदतर हो गए थे।
अमृतपाल के मिशन के बारे में उक्त अधिकारी का कहना है कि उसे पंजाब में अलगाववाद की चिंगारी दोबारा सुलगाने के लिए पाकिस्तान की इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) ने रोपा है। दुबई से वह जॉर्जिया गया, जहां उन्होंने उसे प्रशिक्षित किया। उसकी हालिया दृढ़ता इस बात से उपजी है कि उसे लग रहा है कि नई दिल्ली उसके खिलाफ कार्रवाई करने में ढिलाई बरत रही है और कुछ भी करने में अक्षम है।
पिछले दिनों हुई दो घटनाओं ने अमृतपाल की इस धारणा को बल दिया। बीती 23 फरवरी को उसने और उसके अनुयायियों ने तलवारें और बंदूकें लहराते हुए अमृतसर के निकट अजनाला थाने पर हमला कर दिया। वे अपहरण के मामले में गिरफ्तार अपने एक साथी की रिहाई की मांग कर रहे थे। इस हमले में छह पुलिसकर्मी घायल हुए, लेकिन अधिकारियों ने न तो हमलावरों पर गोली चलाई और न ही उन्हें गिरफ्तार किया। उलटे उन्हें आश्वासन दिया गया कि अपहरणकर्ता को छोड़ दिया जाएगा। बाद में पुलिस ने कहा कि वे हमलावरों को इस वजह से नहीं रोक पाए कि वे पवित्र गुरुग्रंथ साहिब की प्रति को ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे थे!
इसी तरह कुछ अर्सा पहले चंडीगढ़ में 20 साल से जेल में बंद खालिस्तानियों को रिहा करने की मांग को लेकर सिख आंदोलनकारियों की पुलिस से झड़प हुई। पुलिस पीछे हट गई, क्योंकि उन्हें डर था कि अगर भागे नहीं, तो आंदोलनकारी उन्हें जान से मार देंगे। हमलावरों ने आंसू गैस की गन, असलहा और अन्य पुलिस उपकरण भी छीन लिए। पुलिस ने प्राथमिकी तो दर्ज करवा दी, लेकिन किसी को गिरफ्तार नहीं किया। पंजाब के किसी भी राजनीतिक दल ने खालिस्तानियों के खिलाफ कोई आह्वान नहीं किया।
बहरहाल, पंजाब सरकार ने अमृतपाल पर शिकंजा कसा और पंजाब पुलिस उसके कई सहयोगियों को गिरफ्तार करने में कामयाब हो गई। अमृतपाल पुलिस के चंगुल से बच निकला और इन पंक्तियों के लिखे जाने तक फरार है। फिलहाल वह भागता फिर रहा है, लेकिन सवाल है कि क्या अमृतपाल दूसरा भिंडरावाले साबित होगा? इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या पंजाब में उसके जैसे अतिवादी के लिए कोई जगह है? इसका उत्तर थोड़ा जटिल है।
जो पंजाब को जानते हैं, वे उस राजनीतिक शून्य की बात करते हैं, जिसे अमृतपाल और उसके जैसे लोग हमेशा भरने की कोशिश करते रहेंगे। पंजाब उस मोड़ पर है, जहां दो मुख्य दल–अकाली दल और कांग्रेस-पूरी तरह तहस-नहस हो चुके हैं। अकाली दल का मुख्य आधार ग्रामीण खेतिहर वर्ग और खासकर उसका युवा वर्ग उससे दूर जा रहे हैं। यही वे लोग हैं, जिन्होंने पिछले चुनावों में आम आदमी पार्टी को मौका दिया है, लेकिन कुछ ही महीनों में संगरूर लोकसभा उपचुनाव में इस पार्टी का प्रत्याशी सिमरनजीत सिंह मान से हार गया। पार्टी को यह संदेश मिल गया कि आगामी सफलता इतनी सरल नहीं होगी।
पंजाब विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि राज्य को मादक पदार्थों, बेरोजगारी, अनिवार्य पलायन और कृषि संबंधी संकट के मद्देनजर त्वरित हस्तक्षेप की आवश्यकता है। शायद यही कारण है कि जब अमृतपाल ने नशे की समस्या की बात की, तो वह उन्हें समझ में आई। दूसरी जटिलता प्रतिरोध के ढांचे की है, सिख धर्म में रचे-बसे शहादत के विचार की है, जिसे अमृतपाल ने भुनाने की कोशिश की।
ज्ञातव्य है कि 1980 के पूरे दशक और 1990 की शुरुआत के एक साल के दौरान खालिस्तानियों ने पूरे पंजाब पर आतंक का साम्राज्य स्थापित कर दिया था। आतंकवाद की लगाम थामने में केंद्रीय शासन और सैनिक कानून (मार्शल लॉ), दोनों ही नाकामयाब साबित हुए थे। आतंकवाद को अंतत: दो सिखों ने ही कुचला। ये दोनों थे-पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री सरदार बेअंत सिंह और तत्कालीन पंजाब पुलिस प्रमुख कंवरपाल सिंह (के.पी.एस.) गिल। उन्होंने जो अतिरिक्त न्यायिक तरीके अपनाए, वह किसी अन्य धर्म के शासकों-खासकर हिंदुओं-द्वारा नहीं अपनाए जा सकते थे। एक अनुमान के अनुसार, इस लड़ाई में 20,000 से अधिक लोग मारे गए थे। यह तयशुदा है कि खालिस्तानी आतंकवाद को बाहर से नहीं कुचला जा सकता।
बात बिलकुल साफ है। यदि भारतीय जनता पार्टी-बहैसियत हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी-पंजाब में केंद्रीय शासन लगा कर कोई भी कार्रवाई करती है, तो यह घातक होगा। इससे हिंदुओं द्वारा सिखों के दमन का आख्यान आगे बढ़ेगा। और हां, पाकिस्तान पंजाब पर अपनी गिद्ध जैसी नजरें लगाए बैठा है। यह इस बात से जाहिर होता है कि उसके ड्रोन हमले निरंतर जारी हैं। पिछले तीन सालों में 28 ड्रोन पकड़े गए हैं, जिनमें ड्रग्स, हथियार और विस्फोटक मिले हैं। पाकिस्तान बांग्लादेश को अलग करवाने का बदला पंजाब को अलग करवा कर लेना चाहता है और इसके लिए वह पूरी तरह से कमर कसे हुए है।