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कश्मीर का राजनीतिक संकट

Mon, 25 Jun 2018 06:00 PM IST
harsh kakkad हर्ष कक्कड़
Updated Mon, 25 Jun 2018 06:00 PM IST
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Kashmir's political crisis
कश्मीर का राजनीतिक संकट
जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-भाजपा गठबंधन बेमेल था और शुरू से स्पष्ट था कि इसे मजबूरी में अंजाम दिया गया है। दोनों दलों में एक-दूसरे के एकदम विपरीत थे। भाजपा पत्थरबाजों और आतंकवाद के एकदम खिलाफ कड़ा रुख अखित्यार करने पर जोर देती रही, वहीं पीडीपी हथियार उठाने वाले स्थानीय युवाओं और पत्थरबाजों के प्रति उदार रुख चाहती थी और मानती थी कि वे भटके हुए युवा हैं। महबूबा का रुख घाटी के प्रति उदार था, वहीं उन्होंने जम्मू और लेह की उपेक्षा की, जबकि भाजपा जम्मू के अपने एजेंडे को आगे नहीं बढ़ा सकी। 

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ऐसी परिस्थितियों में भाजपा यह मान रही थी कि यदि वह गठबंधन का हिस्सा बनी रहती है, तो उसे 2019 में नुकसान हो सकता है। चूंकि पार्टी 2019 के आम चुनाव के लिए खुद को तैयार कर रही है, तो उसने पहले कदम के रूप में गठबंधन से खुद को अलग किया। उसे उम्मीद है कि इससे उसे अपनी खोई हुई जमीन हासिल करने में मदद मिलेगी। एकतरफा संघर्ष विराम और सैन्य अभियान रोकने का फैसला नाकाम साबित हुआ है, क्योंकि न तो आतंकवादी नरम पड़े और न ही अलगाववादी बातचीत के लिए तैयार हुए। 

दूसरी ओर पीडीपी को सिर्फ घाटी की चिंता थी, जहां से उसे ताकत मिलती है। जब सर्वोच्च अदालत में अनुच्छेद 35ए को हटाने के लिए याचिका दायर की गई, तो महबूबा ने इसे हटाने के जम्मू की मांग को नजरंदाज किया और इस मामले को राज्य के रूप में लड़ने का इरादा जताया। कठुआ बलात्कार मामले ने राज्य के दोनों हिस्सों के विभाजन को सामने ला दिया। रोहिंग्या लोगों की बढ़ती आबादी के कारण जम्मू क्षेत्र में पहले ही काफी नाराजगी थी, जिसे राज्य सरकार ने नजरअंदाज किया। 

इसके साथ ही गठबंधन के भीतर व्याप्त असहमतियों के कारण राज्य सरकार आतंकवादियों के समर्पण से संबंधित पैकेज की घोषणा और उस पर अमल नहीं कर सकी। महबूबा जहां उदारता बरतने के साथ ही बड़ा पैकेज चाहती थीं, ताकि भटके युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ा जा सके। भाजपा को महसूस हुआ कि जितनी राशि की पेशकश की गई है, वह पाकिस्तान से होने वाली फायरिंग और आतंकी हमले में होने वाली मौतों के एवज में दिए जाने वाले मुआवजे से अधिक है। घोषित की गई मासिक वृत्ति जम्मू-कश्मीर सरकार की शिक्षित युवाओं के लिए तय वेतन नीति के बराबर थी। 

आखिरी कसर रमजान के दौरान घोषित संघर्ष विराम की नाकामी ने पूरी कर दी, जिसके लिए हर किसी ने राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया। संघर्ष विराम का भाजपा की राज्य इकाई ने विरोध किया था, लेकिन केंद्र ने इसे आगे बढ़ाया। इसकी नाकामी ने भाजपा को वांछित अवसर दे दिया। भाजपा गठबंधन से अलग होने का कारण ढूंढ रही थी, जो उसे इस रूप में मिला। वहीं महबूबा में गठबंधन को लेकर शुरू से ही झिझक थी। उन्होंने कमान संभालने में तब तक देरी की, जब तक कि उन्हें प्रधानमंत्री से समर्थन का आश्वासन नहीं मिल गया। 

अब राज्यपाल शासन से सुरक्षा बलों को कार्रवाई करने के लिए और अधिक अधिकार तथा स्वतंत्रता मिलेगी, हालांकि इसका हमेशा नकारात्मक प्रभाव हो सकता है। आगामी अमरनाथ यात्रा राजस्व प्राप्ति का बड़ा स्रोत है और स्थानीय कश्मीरी इसका उत्सुकता से इंतजार करते हैं, वहीं इस बड़े धार्मिक तीर्थ स्थल की यात्रा में देश से श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं, जबकि आतंकवादी भी इसे निशाना बनाना चाहते हैं। लिहाजा इसे निर्विघ्न संपन्न कराना सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चिंता का कारण है। 

राज्यपाल शासन के कारण अलगावादियों से बातचीत की संभावनाएं क्षीण हो गई हैं। वार्ताकार भले ही अपना काम जारी रखें, लेकिन इससे बहुत कुछ होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। घाटी के हालात अचानक बिगड़ने के पीछे स्पष्ट तौर पर हुर्रियत का हाथ है और पाकिस्तान इसे अंजाम दे रहा है। इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि एनआईए और प्रवर्तन निदेशालय सहित तमाम सरकारी एजेंसियों और राज्य खुफिया तंत्र को उनके खिलाफ कार्रवाई करने और उन्हें अलग-थलग करने के लिए पूरी छूट दी जाए, जबकि पीडीपी ने ऐसी कार्रवाई को रोके रखा था।

राज्यपाल शासन यह संदेश प्रचारित करेगा कि सरकार घाटी को नियंत्रित करने में नाकाम रही। वहीं अलगाववादी और पाकिस्तान यह दुष्प्रचार करेंगे कि घाटी पर सुरक्षा एजेंसियों (इसे सेना पढि़ए) का कब्जा है। और यदि सरकार जम्मू-कश्मीर में एन एन वोहरा की सेवानिवृत्ति पर किसी पूर्व सैन्य अधिकारी को वहां का राज्यपाल नियुक्त करती है, जैसा कि चर्चा है, तो यह बात और स्पष्ट हो जाएगी। ऐसे में कोई भी एक घटना जिसमें मौतें हो जाएं, उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भुनाए जाने की कोशिश से इन्कार नहीं किया जा सकता।

बुरहान वानी के मारे जाने के बाद जब हिंसा चरम पर थी, उस समय भी तथ्य यह है कि वहां एक राजनीतिक सरकार थी, जिसके कारण राष्ट्रविरोधी और पाकिस्तान यह दावा नहीं कर सके कि घाटी को सुरक्षा बलों के हवाले कर दिया गया है। उन्होंने सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजों पर भारी बल तथा पैलेट गन का इस्तेमाल करने के आरोप तो लगाए, लेकिन वे कभी यह दावा नहीं कर सके कि राज्य सुरक्षा बलों के नियंत्रण में है। अब हालात बदल गए हैं, इसलिए सुरक्षा बलों को एहतियात बरतना होगा। 

ऐसा लगता है कि भाजपा ने बड़ा दांव चला है, क्योंकि उसके पास कोई और विकल्प नहीं बचा था। गठबंधन में मेल नहीं होने के कारण वह जम्मू में अपना आधार खोती जा रही थी और फिर से अपना आधार हासिल करने के लिए बेताब थी। यदि राज्यपाल शासन हालात को सामान्य स्तर के कुछ हद तक करीब (सामान्य स्थिति अब भी बहुत दूर है) लाने में सफल नहीं होता, तो फिर नाकामी के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

यदि सुरक्षा बल, एनआईए और प्रवर्तन निदेशालय के साथ मिलकर हुर्रियत को अलग-थलग कर देते हैं और हिंसा में कमी लाते हैं, तो देशभर में भाजपा को प्रशंसा मिलेगी। जाहिर है, आने वाले कुछ महीने भाजपा के लिए काफी अहम हैं।
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