जलियांवाला बाग हत्याकांड: इन घटनाओं ने अंग्रेजों को किया था नाराज, फिर निहत्थे लोग बने निशाना
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जलियांवाला बाग हत्याकांड आज भी हमारी यादों में जिंदा है, ना केवल इसलिए कि यह भयावह और हृदयविदारक था, बल्कि इसलिए भी कि यह स्वतंत्रता संग्राम में एक अहम मोड़ था। जिसकी वजह से यह और अधिक व्यापक हुआ। हालांकि अंग्रेजों ने नरसंहार की जानकारी को दबाने की पूरी कोशिश की, ताकि उस समय के राष्ट्रवादियों को नरसंहार के दौरान और उसके बाद हुए अत्याचारों की सही जानकारी ना मिल सके।
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जलियांवाला बाग हत्याकांड आज भी हमारी यादों में जिंदा है, ना केवल इसलिए कि यह भयावह और हृदयविदारक था, बल्कि इसलिए भी कि यह स्वतंत्रता संग्राम में एक अहम मोड़ था। जिसकी वजह से यह और अधिक व्यापक हुआ। हालांकि अंग्रेजों ने नरसंहार की जानकारी को दबाने की पूरी कोशिश की, ताकि उस समय के राष्ट्रवादियों को नरसंहार के दौरान और उसके बाद हुए अत्याचारों की सही जानकारी ना मिल सके।
पर महात्मा गांधी और अन्य लोगों ने पंजाब में यातना की पूरी जानकारी को सामने लाने का निरंतर प्रयास किया। पंडित मदनमोहन मालवीय और अन्य लोगों के साथ उन्होंने हंटर कमेटी द्वारा प्रकाशित आधिकारिक ब्रिटिश रिपोर्ट को चुनौती देने के लिए पंजाब के लोगों की आंखों देखी जानकारियां एकत्र करनी शुरू की।
हंटर कमेटी की रिपोर्ट प्रायः सार्वजनिक तौर पर साक्ष्य एकत्र कर तैयार की गई थी और यह काफी विस्तृत थी, लेकिन यह स्पष्ट तौर पर पूर्वाग्रही थी। क्योंकि जो लोग पंजाब में लागू मार्शल लॉ के तहत कैद किए गए थे, वे गवाही नहीं दे पाए क्योंकि उनमें से कई जेल में थे, और करीब 18 लोगों को मृत्युदंड दिया गया था।
अब जब हम महात्मा गांधी और अन्य लोगों की बदौलत पूरे पंजाब से इकट्ठा की गई गैर-आधिकारिक जानकारियों को पढ़ते हैं, तो हमें एहसास होता है कि लोगों को किस हद तक पीड़ा और भयावह यातना दी गई थी। कर्नल डायर द्वारा चेतावनी दिए बिना ना केवल लोगों को बेरहमी से मारा गया, बल्कि बचे हुए लोगों और शहीदों के परिवार निरंतर अंग्रेजों के निशाने पर रहे।
अमृतसर, जहां इसे अंजाम दिया गया, ब्रिटिश सरकार का विशेष लक्ष्य बन गया था। जो कि 10 अप्रैल के दंगे में पांच अंग्रेजों को मारने का दुस्साहस करने के लिए शहरवासियों को सबक सिखाना चाहती थी। वास्तव में 9 और 10 अप्रैल की घटनाओं को कम प्रचार मिला, पर यही घटना थीं, जिन्होंने अंग्रेजों को नाराज किया, जो सोचते थे कि क्रांति की आग सुलग रही है।
उस समय पंजाब के नागरिक प्रशासन की मुख्य चिंता यह थी कि वे सत्याग्रह के दौरान अमृतसर की सड़कों पर बढ़ती हिंदू-मुस्लिम एकता के सामने खुद को असहाय मानते थे। जिसे महात्मा गांधी ने साल के शुरू में बेरहम रॉलेट ऐक्ट के खिलाफ शुरू किया था।
बड़ी संख्या में लोग, पूर्ण सांप्रदायिक सद्भाव में, गांधी के आह्वान पर चल रहे थे, और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने के लिए नियमित बैठकें कर रहे थे। लेकिन 10 अप्रैल को अंग्रेजों ने सोचा कि इस एकता को तोड़ने का यही वक्त है और उन्होंने दो प्रमुख नेताओं-डॉ. सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू (एक हिंदू और एक मुस्लिम) को अमृतसर में गिरफ्तार कर लिया।