फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   It is important to know: Why did the sages oppose pratigraha?

जानना जरूरी है: ऋषियों ने प्रतिग्रह का विरोध क्यों किया? संस्कृति के पन्नों से जानें पूरी कहानी

Sun, 23 Mar 2025 05:08 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 23 Mar 2025 05:08 AM IST
विज्ञापन
It is important to know: Why did the sages oppose pratigraha?
संस्कृति के पन्नों से...। - फोटो : अमर उजाला

एक बार कुछ ऋषि पृथ्वी पर विचर रहे थे। इसी बीच भारी सूखा पड़ा और लोग कष्ट में पड़ गए। तब ऋषियों को कष्ट में देखकर तत्कालीन राजा ने दुखी होकर उनसे कहा, ‘प्रतिग्रह (दान स्वीकार करना) उत्तम वृत्ति मानी गई है। अतः आप लोग मुझसे दान में गांव, धान, अन्न, घृत-दुग्धादि ग्रहण कर लीजिए।’ ऋषियों ने कहा, ‘राजन! प्रतिग्रह भयंकर वृत्ति है। वह स्वाद में मधु के समान, लेकिन परिणाम में विष के समान घातक है। आप क्यों हमें लोभ में डाल रहे हैं? जो ब्राह्मण लोभ से मोहित होकर राजा का प्रतिग्रह स्वीकार करता है, वह घोर नरक में जाता है। अतः महाराज! यह दान आप किसी और को दे दीजिए।’


loader

यह कहकर ऋर्षि वन में चले गए। लेकिन राजा ने अपने मंत्रियों से कहकर गूलर के फलों में सोना भरकर उन्हें पृथ्वी पर बिखेर दिया, जब सप्तर्षि अन्न के दाने बीनते हुए वहां पहुंचे, तो उन गूलर के फलों को भी उठाकर देखा। उन भारी फलों को देखकर अत्रि मुनि ने कहा, ‘ये फल ग्रहण करने योग्य नहीं हैं। हमारे ज्ञान पर मोह का पर्दा नहीं पड़ा है, हम मंदबुद्धि नहीं हैं। हम समझदार हैं, ज्ञानी हैं, अतः समझते हैं कि गूलर के फल सुवर्ण से भरे हैं। धन केवल इसी लोक में सुख देता है, मृत्यु के बाद उसके कटु परिणाम होते हैं। अतः जो सुख की इच्छा रखता हो, उसे यह फल नहीं लेना चाहिए।’ फिर वशिष्ठ ने कहा, ‘धन की अपेक्षा तपस्या का संचय श्रेष्ठ है। सब प्रकार के लौकिक संग्रहों का परित्याग करने से उपद्रव शांत हो जाते हैं। संग्रह करने वाला मनुष्य कभी सुखी नहीं रह सकता। ब्राह्मण प्रतिग्रह का त्याग करता है, तो संतोष के कारण उसके तेज में वृद्धि होती है।’ 

महर्षि कश्यप बोले, ‘धन-संपत्ति मोह में डालने वाली होती है और मोह नरक में गिराता है। इसलिए अपना कल्याण चाहने वाले व्यक्ति को धन का दूर से परित्याग कर देना चाहिए। कीचड़ को लगाकर फिर उसे धोने की अपेक्षा उसका स्पर्श न करना ही उत्तम है। धन द्वारा अर्जित धर्म का क्षय हो जाता है।’

फिर महर्षि भरद्वाज ने कहा, ‘मनुष्य का शरीर जीर्ण होने पर भी धन की आशा जीर्ण नहीं होती। वह सदा नई बनी रहती है। तृष्णा से संसार का विस्तार होता है। तृष्णा का कोई ओर-छोर नहीं है, उसका पेट भरना कठिन है। उसमें सैकड़ों दोष होते हैं और उसके द्वारा बहुत-से अधर्म होते हैं। अतः तृष्णा का परित्याग ही उचित है।’

इसी विषय पर महर्षि गौतम बोले, ‘लोभग्रस्त होने से सभी मनुष्य संकट में पड़ जाते हैं। जिसके चित्त में संतोष है, उसके लिए सर्वत्र धन-संपत्ति भरी है। संतोष रूपी अमृत से तृप्त चित्त वाले पुरुषों को जो सुख प्राप्त है, वह धन के लोभी लोगों को कहां से प्राप्त हो सकता है! असंतोष सबसे बड़ा दुख और संतोष ही सबसे बड़ा सुख है।’ विश्वामित्र ने कहा, ‘किसी व्यक्ति की यदि एक कामना पूरी होती है, तो दूसरी नई उत्पन्न होकर उसे पुनः बाण के समान बींधने लगती है। भोगों की इच्छा उपभोग के द्वारा शांत नहीं होती, बल्कि घी डालने से प्रज्वलित होने वाली अग्नि की भांति अधिकाधिक बढ़ती जाती है।’ इसके बाद महर्षि जमदग्नि बोले, ‘जो प्रतिग्रह लेने का सामर्थ्य रखते हुए भी उसे ग्रहण नहीं करता, वह मनुष्य सनातन लोकों को प्राप्त होता है। जो ब्राह्मण राजा से धन लेता है, वह शोक करने के योग्य है; उस मूर्ख को नरक-यातना का भय नहीं दिखाई देता। प्रतिग्रह लेने में समर्थ होकर भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि प्रतिग्रह से ब्राह्मणों का तेज नष्ट हो जाता है।’

तब अरुंधती ने कहा, ‘तृष्णा का आदि-अंत नहीं है, वह सदा शरीर के भीतर व्याप्त रहती है। दुष्ट बुद्धि वाले तृष्णा का त्याग नहीं कर सकते, क्योंकि वह शरीर के जीर्ण होने पर भी जीर्ण नहीं होती तथा प्राणांतकारी रोग के समान है। इसलिए उस तृष्णा का त्याग कर देना ही उत्तम है। अंत में महर्षि पशुसख बोले, ‘धर्मपरायण विद्वान पुरुष जैसा आचरण करते हैं, आत्म-कल्याण की इच्छा रखने वाले विद्वान पुरुष को वैसा ही आचरण करना चाहिए।’ इस प्रकार प्रतिग्रह का विरोध करते हुए सभी महर्षि उन सुवर्ण युक्त गूलर के फलों को छोड़कर चले गए।


इसे भी पढ़ें- स्मृति: हमारे समय में भगत सिंह की याद... फांसी के 94 साल बाद भी भविष्य के विप्लवमार्गियों के लिए प्रकाशपुंज...
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed