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मुद्दा: स्वच्छ और सुरक्षित पानी का अधिकार सभी को, अगले 20 वर्ष में जल-संकट भयावह हो सकता है
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जलसंकट (फाइल)
- फोटो :
पीटीआई
विस्तार
आधी दुनिया साफ और सुरक्षित पानी के संकट से जूझ रही है। पानी के लिए लोग एक-दूसरे का खून बहा रहे हैं। साल 2023 इसका जीता-जागता सबूत है, जिसमें पानी से जुड़े हिंसा के 347 मामले सामने आए हैं। हमारा देश भी इस मामले में पीछे नहीं है, जहां इस दौरान हिंसा के 25 मामले सामने आए, जबकि 2022 में इस तरह के देश में कुल 10 मामले सामने आए थे। यह प्रमाण है कि 2022 की तुलना में पानी के मामले में हिंसा में 50 फीसदी से भी ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। इन मामलों में कई लोग मारे भी गए हैं।दरअसल पानी से संबंधित हिंसा के मामलों में बांधों, पाइप लाइनों, कुओं, उपचार संयंत्रों और संयंत्रों पर कार्यरत कामगारों पर हमले प्रमुख हैं। हकीकत यह है कि हिंसा के इन मामलों में सिंचाई के पानी के संघर्ष ज्यादा चर्चा में रहे हैं। इनके अलावा सूखे और आपसी विवादों ने इन संघर्षों को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। वहीं, मध्य पूर्व में इनमें अभूतपूर्व बढ़ोतरी दर्ज हुई है। इनमें खासतौर पर लैटिन अमेरिका, मध्य पूर्व, सब सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशियाई देश शीर्ष पर हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के हालिया अध्ययन का निष्कर्ष साइनस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है, के अनुसार आज दुनिया में 4.4 अरब लोगों के पास सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं है। यह आंकड़ा पहले से जारी संख्या से दोगुने से भी ज्यादा है, जो भयावह खतरे का संकेत है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, अभी दुनिया की तकरीबन 26 फीसदी आबादी स्वच्छ पेयजल के संकट का सामना कर रही है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2050 तक दुनिया की 1.7 से 2.4 अरब शहरी आबादी को पेयजल संकट का सामना करने का अंदेशा है। इसमें सबसे ज्यादा भारत के प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की गई है। यूनेस्को की मानें, तो हालात इतने गंभीर हैं कि इस वैश्विक संकट के नियंत्रण से बाहर जाने से पहले मजबूत अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तत्काल स्थापित करने की जरूरत है। विश्व जल विकास रिपोर्ट 2023 के अनुसार, 2030 तक दुनिया के सभी लोगों को स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता की उपलब्धता का लक्ष्य काफी दूर है। असलियत यह है कि बीते 40 वर्षों में दुनिया में जल के उपयोग की दर प्रति वर्ष एक फीसदी बढ़ी है। दुनिया की आबादी बढ़ने और सामाजिक-आर्थिक बदलावों को देखते हुए इसके वर्ष 2050 तक इसी तरह बढ़ने के आसार हैं। यह एक गंभीर चुनौती है।
सच्चाई यह भी है कि पानी में दूषित पदार्थों की मौजूदगी और बुनियादी ढांचे में कमी के चलते दक्षिण एशिया, उप सहारा अफ्रीका, पूर्वी एशिया और कई अफ्रीकी देशों के लगभग 69 करोड़ से अधिक लोग ऐसी जगहों पर रहने के लिए विवश हैं, जहां पानी पहुंचाने की व्यवस्था ही नहीं है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 1.96 करोड़ आवासों में रहने वाले लोगों की फ्लोराइड और आर्सेनिक युक्त पानी पीना नियति बन गई है। पानी से होने वाली बीमारियों पर हर साल करीब 42 अरब रुपये का आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।
जहां तक एशिया का सवाल है, तो यहां की तकरीबन 80 फीसदी खासकर पूर्वोत्तर चीन, भारत और पाकिस्तान की आबादी भीषण पेयजल संकट से जूझ रही है। यदि इस वैश्विक अनिश्चितता को खत्म नहीं किया गया और इसका शीघ्र समाधान नहीं निकाला गया, तो निश्चित ही इस संकट का सामना करना बेहद मुश्किल होगा। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस भी कहते हैं कि पेयजल मानवता के लिए रक्त की तरह है। इसलिए जल की बर्बादी रोकना और संचय बेहद जरूरी है। इसमें दो राय नहीं कि जलवायु परिवर्तन और मौसम के बदलाव के चलते दुनिया में जल सुरक्षा के खतरे दिनोंदिन तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। इससे दुनिया के पांच अरब लोगों पर यह संकट भयावह रूप अख्तियार करता जा रहा है।
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रकोप के कारण पानी की यह विकट स्थिति होती जा रही है। कारण यह है कि लोगों को अभी भी मौसम से जुड़े पर्यावरणीय खतरों की कोई जानकारी नहीं है। यही नहीं वे जलवायु परिवर्तन और जल सुरक्षा के बीच के संबंध को जानते तक नहीं हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, अगले 20 वर्ष में यह संकट भयावह रूप धारण कर लेगा और लोगों के लिए पानी गंभीर खतरा बन जाएगा। दरअसल सबसे बड़ी जरूरत पर्यावरणीय मुद्दों को ठोस और प्रासंगिक बनाने की है, तभी कुछ बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। साफ और सुरिक्षत पानी के लिए यदि दुनिया भर में ईमानदारी से प्रयास किए जाते हैं और उनमें सुधार आता है, तो यह दुनिया की एक महान उपलब्धि होगी।