मंथन: भारत का अध्ययन क्या पूरा हो चुका है, 'इंडोलॉजी' के क्षेत्र में कहां तक पहुंचे हम
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विस्तार
‘इंडोलॉजी’ शब्द का हिंदी अनुवाद किया गया है ‘भारत-अध्ययन’। यह शब्द ‘इंडोलॉजी’ से पहले नहीं था, क्योंकि नवीं शती के बाद कभी भारत के अध्ययन का प्रयास नहीं किया गया था। मुगलों के प्रस्थान के बाद ब्रिटिश विद्वानों ने यह प्रयास आरंभ किया। सर विलियम जोन्स ने बंगाल में द एशियाटिक सोसाइटी की प्रतिष्ठा की। यह 1784 यानी अठारहवीं शती की बात है। ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी के विद्वान जोन्स 1783 में कलकत्ता आए। यहां से भारत के अध्ययन का काम अकादमिक स्तर पर शुरू हुआ। अठारहवीं शती के उत्तरार्ध से लेकर पूरी उन्नीसवीं शती और फिर बीसवीं शती के पूर्वार्ध तक काफी काम हुए। क्या 1784 से लेकर अंग्रेजों के प्रस्थान तक जो काम हुए, वे पर्याप्त थे, क्या उसके बाद भी स्वतंत्र देश में काम हुए? क्या हम यह मान चुके हैं कि भारत के अध्ययन का काम पूरा हो चुका है? देश के विभिन्न सरकारी संस्थानों में ऐसे अध्ययन के केंद्र इसी उद्देश्य से बने। लेकिन क्या हम कह सकते हैं कि इंडोलॉजी के क्षेत्र में हमें उससे आगे भी कोई उपलब्धि मिली है, जितना ब्रिटिश विद्वान कर गए हैं? या अब हमें अध्ययन की कोई जरूरत नहीं रह गई?
करीब एक हजार साल के समय की धूल में छिप गए प्राच्यविद्या के ग्रंथों को ढूंढ़ निकालना, उनका गहन अध्ययन करना और फिर सीधे शास्त्रीय संस्कृत से अंग्रेजी में उनका अनुवाद करना ब्रिटिश विद्वानों की चेतना के केंद्र में रहा है। तब तक एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना बंबई और ढाका में नहीं हुई थी। ये स्थापनाएं क्रमशः 1804 और 1952 में हुई। बंगाल रेजीडेंसी ही तब प्रमुख था। इन विद्वानों के दल को प्राच्य विद्या का एक पृष्ठ भी मिलता, तो वे सोसाइटी की पत्रिका बिब्लियोथिका इंडिका में प्रकाशित कर देते। 'इंडिक माइंड' शब्द भी यहीं से आया और ऐसे अध्ययन को ओरिएंटल स्टडीज भी कहा गया।
इन विद्वानों के लगातार प्रयासों से हम न सिर्फ भारतीय प्राच्यविद्या यानी वेद और इसके प्रातिशाख्य, संस्कृत भाषा, व्याकरण, काव्यशास्त्र, इतिहास, महाकाव्य, गणित और शिल्पशास्त्र को फिर से जान सके, बल्कि इनकी बनाई इतिहास-दृष्टि को इम आज भी पढ़ते और मानते चले आ रहे हैं। विभिन्न उत्खनन से प्राप्त अभिलेखों और शिलालेखों के साथ स्थापत्य अवशेषों, बौद्ध चैत्य व स्तूपों, गुह्यमंदिरों व देवप्रतिमाओं को हमने उन्हीं के कारण देखा और पढ़ा, जिनमें अजंता, एलोरा, ऐलिफेंटा और भीमबेडका दुनिया भर में लोकप्रिय हैं। यदि भारत-अध्ययन का काम ऐसे मनीषियों ने न किया होता, तो हम यह जान ही नहीं पाते कि प्राचीन और मध्यकाल के भारत में क्या कुछ कलात्मक रूप से उत्कीर्ण हुआ है। प्रश्न यही है कि क्या यह काम पूरा हो चुका है और अब हमारे जानने के लिए इस डिजिटल इंडिया में कुछ नहीं है? पिछले सत्तर वर्षों में हमने ऐसा और क्या जाना, जिसे हम उसके आगे की डिस्कवरी ऑफ इंडिया कह सकते हैं?
उन्नसवीं शती को हम ईश्वरचंद्र विद्यासागर के कारण भी याद करते हैं। उन्हें और उनके काम को हम सामाजिक पुनर्जागरण के रूप में देखते व याद करते हैं। क्या यहीं बात पूरी हो जाती है? वह संस्कृत साहित्य के अप्रतिम विद्वान थे। बांग्ला वर्णमाला व कुछेक पुस्तकों के अलावा क्या उन्होंने अपने क्षेत्र में कोई काम नहीं किया होगा? हमें जानना चाहिए कि बारहवीं शती में विदेशी आतताइयों के हाथों से भारतीय दर्शन को बचाने के लिए दक्षिण भारत के ऋषि माधवाचार्य ने सर्वदर्शनसंग्रह ग्रंथ की रचना कर इसकी प्रतियों को छिपा दिया था, जिसकी कुछ प्रतियां विद्यासागर महाशय को कलकत्ता और बनारस में मिलीं।
एशियाटिक सोसाइटी के परामर्श पर उन्होंने इसका संस्कृत में संपादन किया। सोसायटी ने इसे प्रकाशित किया और तब दो अन्य विदेशी विद्वानों कॉवेल व गॅफ ने उन विभिन्न भारतीय दर्शनों जैसे शैव दर्शन, आदि के बारे में जाना। इनके बारे में हम तब जान सके, जब उन्होंने कश्मीरी पंडितों के घर से उन दर्शनों से संबंधित ग्रंथों को प्राप्त कर उन्हें हमारे लिए अंग्रेजी में अनूदित किया। क्या भारत अध्ययन केंद्रों का मन ऐसे स्तुत्य प्रयासों से आगे भी काम करने का है? भारतीय भाषा का विकास भी सुनीति कुमार चटर्जी के प्रयासों से अपभ्रंश के बाद अवहट्ट तक हुआ। अभी तक इस भाषा पर, इस भाषा में प्रयुक्त प्राकृत शब्दों पर कोई काम नहीं हुआ। विकास वहीं ठहरा हुआ है। इस भाषा में मिले चर्यापदों और दोहाकोशगीतियों पर कोई काम नहीं हुआ। सिंधु सभ्यता की भाषा की तरह इस भाषा में मिली चर्यागीतियों की भाषा भी दुरूह है। इनका अध्ययन कैसे हो?
उन्नीसवीं शती में जेम्स फर्ग्युसन और भारतेंदु हरिश्चंद्र भी हुए। भारतेंदु के कारण विदेशी विद्वानों ने भरत के नाट्यशास्त्र और वास्तुविद्वान फर्ग्युसन के कारण हमने गहडवालों के समय की वाराणसी, बुद्ध से पहले के महाजनपद काशी, आजीवक और कासिस जनजातियों के बारे में जाना। बीसवीं शती में ब्रिटिश इतिहासकार ए. एल. बैशम ने इस काम को आगे बढ़ाया। इनके काम के आधार पर ही भारतीय विद्वानों ने जाना कि नाट्यशास्त्र की वात्स्यायन और मातृगुप्त-वृत्ति अभी तक हमें नहीं मिली है, कि शुल्बसूत्रों की बौधायन, मानव और आपस्तंभ द्वारा की गई व्याख्या हमें नहीं मिली है, कि मध्यकाल के रंगकर्म के साक्ष्य नहीं मिले हैं, आदि-इत्यादि। क्या इन अध्ययनों के लिए भी हम फर्ग्युसन और बैशम तक सीमित रहेंगे?