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बाजार: घर और बाहर, दोनों से निवेश आना चाहिए, तभी आएगी स्थिरता

Mon, 26 Aug 2024 06:51 AM IST
Ajay Bagga अजय बग्गा
Updated Mon, 26 Aug 2024 06:51 AM IST
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सार
भविष्य को देखते हुए, नीति निर्माताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे ऐसे माहौल को बढ़ावा दें, जो घरेलू निवेश को प्रोत्साहित करे और यह सुनिश्चित करे कि विदेशी निवेशक बाजार का अभिन्न अंग बने रहें। घरेलू और विदेशी, दोनों निवेशकों के हितों को संतुलित करना शेयर बाजार में विकास और स्थिरता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
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Investment should come from both country and abroad, only then there will be stability in the market
निवेश - फोटो : Istock

विस्तार

हाल के वर्षों में भारतीय शेयर बाजार में शेयरों के स्वामित्व में महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया है। शेयरों के स्वामित्व के मामले में घरेलू निवेशक विदेशी निवेशकों से आगे निकल रहे हैं। ऐसे में इस प्रवृत्ति में योगदान देने वाले कारकों, भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों के लिए इसके निहितार्थ और भारत में घरेलू और विदेशी निवेश के भावी दृष्टिकोण को समझना दिलचस्प है। पारंपरिक रूप से, विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई), जिन्हें विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) भी कहा जाता है, भारतीय शेयर बाजार में प्रमुख भूमिका निभाते थे। उनकी भागीदारी से पर्याप्त पूंजी प्रवाह हुआ, जिससे बाजार में तरलता और समग्र आर्थिक विकास में योगदान मिला। हालांकि, 2010 के दशक के अंत और 2020 के दशक की शुरुआत में परिदृश्य बदलना शुरू हो गया, क्योंकि खुदरा और संस्थागत निवेशकों सहित घरेलू निवेशकों ने बाजार में अपनी पकड़ बनाना शुरू कर दिया।



वित्त वर्ष 2014 से, जब एफआईआई स्वामित्व 22 फीसदी था और घरेलू खुदरा और घरेलू संस्थागत स्वामित्व 18 फीसदी था, संरचना उलटने लगी। वित्त वर्ष 2024 में एफआईआई स्वामित्व 18 फीसदी तक कम हो गया है, जबकि घरेलू स्वामित्व 24 फीसदी तक बढ़ गया है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, भारतीय परिवारों ने ऐतिहासिक रूप से अपनी बचत का एक बड़ा हिस्सा बैंक जमा, सोना और रियल एस्टेट जैसे पारंपरिक साधनों में लगाया है। लेकिन हाल के वर्षों में शेयर बाजारों में उनकी रुचि बढ़ती देखी गई है। अनुमान है कि 2024 तक भारत में कुल घरेलू बचत का लगभग 8-10 फीसदी हिस्सा इक्विटी में निवेश किया जाएगा। यह भारतीय परिवारों में शेयर बाजार निवेश की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।


खुदरा निवेश में यह वृद्धि कई कारणों से हुई है, जिसमें बढ़ी हुई वित्तीय साक्षरता, ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म का प्रसार और शेयर बाजार तक आसान पहुंच भी शामिल है। कोविड-19 महामारी ने इसे और तेज कर दिया, जिससे नए डीमैट खातों और बाजारों में नए निवेशकों के प्रवेश में उछाल आया। पिछले एक दशक में भारतीय शेयर बाजारों के शानदार प्रदर्शन ने खुदरा निवेशकों को आकर्षित किया। पारंपरिक बचत साधनों की तुलना में उच्चतर रिटर्न की संभावना ने परिवारों को अपनी बचत का अधिकाधिक हिस्सा शेयर में लगाने के लिए प्रोत्साहित किया है। राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) और इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम्स (ईएलएसएस) जैसी कर-बचत योजनाओं ने शेयर बाजार में निवेश को प्रोत्साहित किया है, जिससे यह अधिक आकर्षक बन गया है। युवा आबादी वित्तीय बाजारों में निवेश करने के लिए अधिक इच्छुक है। वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने और शेयर बाजार में निवेश को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से की गई विभिन्न सरकारी पहलों ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के फंड का एक हिस्सा शेयर बाजारों में निवेश करने के सरकारी आदेश से भी घरेलू निवेशक श्रेणी में पर्याप्त प्रवाह हुआ है। भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण वैश्विक बाजारों में अस्थिरता ने विदेशी निवेशकों को सतर्क बना दिया है। इसके विपरीत, घरेलू निवेशक, जो अक्सर वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव के प्रति अधिक लचीले होते हैं, ने निवेश करना जारी रखा है।

भारतीय विनियामक ढांचा घरेलू निवेशकों को सहायता देने के लिए विकसित किया गया है। पारदर्शिता बढ़ाने और निवेशकों के हितों की रक्षा करने के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा की गई पहलों ने स्थानीय निवेशकों के लिए अधिक अनुकूल वातावरण को बढ़ावा दिया है। महामारी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने और सकारात्मक विकास संभावनाओं ने घरेलू निवेशकों को बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया है। बुनियादी ढांचे के विकास, डिजिटलीकरण और विनिर्माण पर सरकार के जोर देने से भी निवेशकों का भरोसा बढ़ा है।

शेयरों के घरेलू स्वामित्व में यह वृद्धि बाजार में अधिक स्थिरता लाएगी। घरेलू निवेशक आम तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक विकास से ज्यादा जुड़े होते हैं, जिससे विदेशी निवेशकों के साथ होने वाली अचानक बिक्री का प्रभाव कम हो जाता है। स्वामित्व की गतिशीलता में यह बदलाव भारतीय शेयर बाजार में मूल्यांकन पैमाने को भी प्रभावित करेगा। जैसे-जैसे घरेलू निवेशक बाजार की गतिविधियों के प्राथमिक चालक बनते हैं, उनकी निवेश रणनीतियां और प्राथमिकताएं बाजार के रुझान को आकार देंगी। घरेलू निवेशकों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होने के कारण, कंपनियों को कॉरपोरेट प्रशासन और प्रदर्शन के संबंध में अधिक जांच का सामना करना पड़ सकता है। इस बदलाव से कॉरपोरेट प्रथाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही में सुधार हो सकता है।

लेकिन इन सकारात्मक रुझानों के बावजूद, घरेलू निवेशकों के लिए कई चुनौतियां बनी हुई हैं, जो बाजार की भावना से प्रभावित हो सकते हैं, जिससे संभावित अस्थिरता हो सकती है। मुद्रास्फीति, ब्याज दर में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आर्थिक स्थितियां अब भी घरेलू निवेश पैटर्न को प्रभावित कर सकती हैं। विनियमन या कराधान नीतियों में अचानक कोई बदलाव निवेशकों के विश्वास और बाजार की गतिशीलता को प्रभावित कर सकता है। निष्कर्ष के तौर पर, भारतीय शेयरों के स्वामित्व में विदेशी निवेशकों की तुलना में घरेलू निवेशकों का आगे निकल जाना अर्थव्यवस्था और इसके विकास की क्षमता में घरेलू निवेशकों के बढ़ते विश्वास को दर्शाता है। हालांकि चुनौतियां बनी हुई हैं, पर घरेलू निवेशकों की बढ़ती भागीदारी से दीर्घावधि में अधिक लचीले और स्थिर बाजार में योगदान की संभावना है। घरेलू निवेशकों की भूमिका पूंजी बाजारों के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण होगी।

भविष्य को देखते हुए, नीति निर्माताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे ऐसे माहौल को बढ़ावा दें, जो घरेलू निवेश को प्रोत्साहित करे और यह सुनिश्चित करे कि विदेशी निवेशक बाजार का अभिन्न अंग बने रहें। घरेलू और विदेशी, दोनों निवेशकों के हितों को संतुलित करना शेयर बाजार में विकास और स्थिरता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होगा।

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