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सिंधु जल संधि पर रोक तो एक शुरुआत है: पाकिस्तान के लिए गहरा संकट खड़ा होगा, भारत को बनाने होंगे बांध, नहर...

Fri, 25 Apr 2025 05:51 AM IST
virag gupta विराग गुप्ता
Updated Fri, 25 Apr 2025 05:51 AM IST
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सार
पाकिस्तान के इतिहास में सिंधु घाटी सभ्यता की सांस्कृतिक धरोहर को नकारा जाता है, पर सिंधु जल संधि का बेशर्मी से लाभ उठाया जाता है। पहलगाम पर हुए आतंकी हमले की पृष्ठभूमि में अगर संधि पर रोक प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो पाकिस्तान के लिए गहरा संकट खड़ा हो जाएगा।
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Indus Water Treaty suspension just a beginning deep crisis for Pakistan now India have to build dams canals
सिंधु जल संधि (फाइल) - फोटो : संवाद

विस्तार

पहलगाम में निर्दोष पर्यटकों की पाकिस्तान समर्थित जिहादी उग्रवादियों द्वारा हत्या अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार मानवता के विरुद्ध सबसे बड़ा अपराध है। राष्ट्रीय शोक की इस घड़ी में सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों के साथ वकीलों ने संवेदना व्यक्त करके आतंकवाद के विरुद्ध जंग में देश के सामूहिक संकल्प को पुष्ट किया है। पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई के लिए सरकार द्वारा लिए गए पांच बड़े फैसलों में सिंधु जल समझौते पर रोक शामिल है। यह संधि सिर्फ सिंधु नदी के लिए है, लेकिन इसके दायरे में सतलज, व्यास, रावी, झेलम और चिनाव की पांच अन्य नदियों का पानी भी आ रहा है।



इस संधि पर वर्ष 1960 में प्रधानमंत्री नेहरू और पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सांसद अशोक मेहता ने संसद से संधि को मंजूरी नहीं मिलने पर विरोध दर्ज कराया था, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ने 14 नवंबर, 1960 को उसे अस्वीकार कर दिया। उरी हमले के बाद पीआईएल से यह मांग की गई थी कि राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिलने की वजह से संधि को निरस्त कर देना चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिक तौर पर ही निरस्त करके, याचिका के गुण-दोष का निर्धारण नहीं किया। अब पहलगाम हमले के बाद सुप्रीम कोर्ट में उसी आधार पर फिर से नई पीआईएल दायर की गई है।


कश्मीर के साथ हमदर्दी का दावा करने वाले पाकिस्तान ने बग्लीहार हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट पर अड़ंगेबाजी की थी। उसके बाद वर्ष 2003 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने संधि को रद्द करने का प्रस्ताव पारित किया था। पाकिस्तान के साथ तीन युद्धों के दौरान भारत ने इस संधि को रद्द नहीं किया। लेकिन उरी हमले के बाद भारत सरकार ने संधि को रद्द करने की बात से पाकिस्तान को माकूल जवाब देने का प्रयास किया। 

पाकिस्तान में तानाशाही और आतंकवाद प्रायोजित सरकारों की परंपरा रही है, जबकि भारत में संविधान का शासन है। उसके अनुसार, जल मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति की रिपोर्ट पांच अगस्त, 2021 को संसद में पेश की गई। समिति के अनुसार, वर्ष 1960 में समझौते के समय सिंचाई, बांध और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स का सीमित दायरा था। इसलिए जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसे खतरों के मद्देनजर समझौते पर पुनर्विचार की जरूरत है। संधि के अनुसार, भारत पश्चिम की तीन नदियों में 36 लाख एकड़ फुट पानी के भंडारण का ढांचा बना सकता है। लेकिन इन्हें नहीं बनाने से उत्तर भारत के कई राज्यों में खेती के नुकसान पर समिति ने चिंता जाहिर की थी।

संसदीय समिति ने चीन, पाकिस्तान और भूटान के साथ हुई संधियों के तहत 20 हजार मेगावाट के पावर प्रोजेक्ट्स की संभावनाओं का आकलन करते हुए पाया कि भारत ने सिर्फ 3,482 मेगावाट प्रोजेक्ट्स का निर्माण किया है। संधि के तहत भारत लगभग 13.43 एकड़ सिंचित भूमि का विकास कर सकता है। लेकिन पश्चिम की तीन नदियों से सिर्फ 7.59 लाख एकड़ भूमि ही सिंचित हो पाई है। पूर्व की तीन नदियों में जल के उपयोग के पूरे अधिकार का भारत द्वारा इस्तेमाल नहीं करने पर भी समिति ने चिंता व्यक्त की थी। पंजाब और राजस्थान की नहरों की बदहाल स्थिति पर भी समिति ने रोष व्यक्त किया था।

संधि को लागू करने के लिए दोनों देशों के सदस्यों के साथ स्थायी आयोग का प्रावधान है। वर्ष 2022 तक 118 से ज्यादा संयुक्त बैठकों के बावजूद पाकिस्तान संधि में संशोधन के लिए राजी नहीं हुआ। बाध्य होकर जनवरी, 2023 और फिर अगस्त, 2024 में अनुच्छेद-12 (3) के प्रावधानों के अनुसार, भारत सरकार ने संधि में संशोधन के लिए पाकिस्तान को नोटिस जारी किया था। समझौते के अनुसार, सिंधु और सहायक नदियों से भारत को सिर्फ 20 फीसदी पानी मिलता है, लेकिन विश्व बैंक के दबाव पर हुई संधि को एकतरफा तौर पर रद्द करना मुश्किल है। अंतरराष्ट्रीय संधियों में विवाद के निपटारे के लिए वियना कन्वेंशन, 1969 में प्रावधान हैं। लेकिन मुकदमेबाजी और मध्यस्थता की कानूनी लड़ाई में अंतहीन समय लग सकता है। दक्षिण अफ्रीका में नाइजर नदी के पानी के इस्तेमाल के लिए 1964 में संधि हुई थी। नाइजीरिया और पड़ोसी देशों ने सहमति और संवाद से पुरानी संधि को 1980 के समझौते से संशोधित कर लिया था। आतंकियों को पनाह और समर्थन देने वाले पाकिस्तान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंचों से अगर कोई फैसला आया, तो उसे लागू कराना भी टेढ़ी खीर रहेगा। एकतरफा तौर पर रद्द करने से संधि के प्रावधानों का उल्लंघन होगा। उसके बजाय संधि पर रोक लगाने का फैसला समर नीति, अंतरराष्ट्रीय कानून और संधि के प्रावधानों के तहत तर्कसंगत माने जा सकते हैं। 

संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत अंतरराज्यीय नदियों का विषय केंद्र सरकार के अधीन है, लेकिन नदी और पानी का मामला राज्य सरकारों के अधीन आता है। इस कमी को ठीक करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2012 में नदियों को जोड़ने (आईएलआर) वाले फैसले में केंद्र सरकार को निर्देश दिया था। फैसले पर अमल के लिए केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के साथ मिलकर आईएलआर कमेटी का गठन किया था। उस समिति में सॉलिसिटर जनरल के साथ मैं भी शामिल था। 

दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड जैसे अनेक इलाकों में पानी का भारी संकट है। आईएलआर जैसे किसी भी प्रोजेक्ट से जल संकट दूर करने के लिए पानी को संविधान की समवर्ती सूची में लाने की जरूरत है। इस बारे में आईएलआर समिति के सामने मैंने विस्तृत नोट दिया था, लेकिन संघीय व्यवस्था में राज्यों के बीच असहमति और सियासी मनमुटाव की वजह से उस पर अब तक अमल नहीं हुआ।

पाकिस्तान के इतिहास में सिंधु घाटी सभ्यता की सांस्कृतिक धरोहर को नकारा जाता है, लेकिन सिंधु जल संधि का बेजा फायदा उठाने के लिए पाकिस्तानी सरकार बेशर्मी से आमदा है। कानून के अलावा इस मामले में सामरिक और दूसरे पहलू शामिल हैं। तिब्बत पर कब्जे के बाद भारतीय उपमहाद्वीप की अधिकांश नदियों के उद्गम पर चीन का अधिकार है। ब्रह्मपुत्र नदी पर दुनिया का सबसे बड़ा बांध बना रहा चीन, सिंधु नदी मामले में भारत की कार्रवाई में बाधा डालने की कोशिश कर सकता है। सिंधु और सहायक नदियों के पानी को पाकिस्तान जाने से रोकने के लिए भारत में बांध, नहर, हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट्स का विकास करना होगा, जिसमें समय लग सकता है। बहरहाल, पाकिस्तान के लिए यह एक बड़ा झटका तो है ही।  

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