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समाधान: इस क्रूरता पर अंकुश कब, सामूहिक प्रतिरोध से ही बनेगी बात

Sat, 12 Aug 2023 07:34 AM IST
taslima nasreen तस्लीमा नसरीन
Updated Sat, 12 Aug 2023 07:34 AM IST
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सार
बांग्लादेश की तरह भारत में भी महिलाएं छोटे-छोटे मामलों में पुरुषों की हिंसा और क्रूरता का शिकार होती हैं। विकसित देशों में स्त्रियों को आजादी उनके लंबे संघर्षों के कारण मिली है, लिहाजा यहां भी स्त्रियों के सामूहिक प्रतिरोध से इस क्रूरता पर अंकुश लगाया जा सकता है।
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indian women need to collective resistance to get freedom from violence and cruelty like developed countries
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत और बांग्लादेश में कई मामलों में मुझे समानता दिखती है। कट्टरवाद और नारी विद्वेष के मामले बांग्लादेश में बढ़े हैं, तो भारत में भी कमोबेश ऐसा ही दिखता है। पिछले महीने उत्तर प्रदेश के देवरिया में नेहा पासवान नाम की एक किशोरी की उसके दादा ने पीट-पीटकर हत्या कर दी, क्योंकि उसने जींस पहनी थी। स्तब्ध कर देने वाली इस घटना पर सहसा विश्वास नहीं होता कि इस 21वीं सदी में भी ऐसा हो सकता है!



जींस एक किस्म का मोटा सूती कपड़ा है। पूरी दुनिया में स्त्री-पुरुष जींस से तैयार पैंट, शर्ट और जैकेट पहनते हैं। सस्ता होने के कारण गरीब भी जींस पहन सकते हैं। एक समय जींस के कपड़े गरीब ही पहनते थे। सवाल उठता है कि नेहा का जींस पहनना उसके चाचा और दादा को गवारा क्यों न हुआ। दरअसल उन्होंने यह मान लिया था कि जींस पुरुषों की पोशाक है। अब भी बहुत सारे समाजों में यह धारणा बनी हुई है कि पुरुषों की पोशाक या उनके कपड़े लड़कियां और महिलाएं नहीं पहन सकतीं। इस धारणा के पीछे वस्तुत: यह सोच काम करती है कि महिलाएं अगर पुरुषों की पोशाक पहन लें, तो उनका आचरण भी पुरुषों जैसा हो जाएगा।


नेहा के चाचा और दादा को क्या यह आशंका हो गई थी कि जींस पहनने की आदत हो जाने पर वह उनके हुक्म नहीं मानेगी, उनके कहे अनुसार नहीं चलेगी? क्या उन्होंने यह सोच लिया था कि जींस पहनने पर नेहा आवारा लड़कों की तरह घर के बाहर समय बिताएगी, गलत लड़कों की संगति में पड़ेगी, सिगरेट-शराब पिएगी और घर लौटकर चीखेगी-चिल्लाएगी। वे चाहते थे कि नेहा स्कूल जाए, स्कूल से लौटकर रसोई में मां का हाथ बंटाए, घर की साफ-सफाई करे, सबको परोसकर खिलाए और पूजा-पाठ करे। नेहा यही सब तो कर रही थी। शांत स्वभाव की वह लड़की वही कर रही थी, जो उसके परिजन चाहते थे।

लेकिन जींस पहनने के उसके फैसले से जैसे एकाएक उसके बारे में बनी-बनाई छवि ही उलट गई। चूंकि उसने लड़कियों के जींस न पहनने से संबंधित अपने परिवार के निर्देश का पालन नहीं किया था, ऐसे में, यह धारणा बनी या बना दी गई कि वह अपने परिवार के बड़ों का आदेश नहीं मानती। किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि गांव की वह लड़की जींस पहनना चाहती थी। कहा यह भी जा रहा है कि पंजाब में, जहां उसके पिता काम करते थे, रहते हुए उसे जींस पहनने की आदत लगी थी। सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है कि जींस पहनने के बाद वह कितनी खुश हुई होगी। लेकिन जिस समाज में पुरुषों की इच्छा और उनके आदेशों को ही सब कुछ समझा जाता है, वहां एक लड़की की इच्छा को भला कितना महत्व दिया जा सकता है! नेहा की इच्छा और उसकी खुशी की भी उसके परिवार में किसी को परवाह नहीं थी।

इसलिए जींस पहनने के जुर्म में नेहा को उसके चाचा और दादा ने आंगन में पटककर पीटा। उसके पिता घर में नहीं थे, पंजाब में थे, जहां वह काम करते थे। अगर वह उस दिन घर में होते, तो संभवत: उस लड़की की वैसी निर्मम पिटाई नहीं होती। घर में हालांकि उसकी मां थी, लेकिन पुरुषवर्चस्ववादी समाज में अपनी बेटी को पिटते देखने के सिवा वह असहाय औरत और कर भी क्या सकती थी! नेहा का सिर फोड़कर उसके चाचा और दादा उसे गंडक नदी में फेंकने गए थे। उन्होंने उसे नदी में फेंका भी, लेकिन पुल की रेलिंग से टकराकर उस लड़की का शरीर उसी में अटक गया। अगर उसे नदी में फेंक दिया जाता, तो शायद उसके बारे में पता भी नहीं चलता। रोज ही लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ अपराध होते हैं, कहीं न कहीं रोज इन्हें मार डाला जाता है। क्रूरता की अनेक घटनाओं के बारे में तो पता भी नहीं चलता। चूंकि नेहा का शव रेलिंग से अटका हुआ था, और वहां से आने-जाने वालों के लिए वह कौतूहल का विषय बना, इसलिए इस बारे में पता चला।

जींस नहीं पहन सकते, पुरुषों वाली शर्ट नहीं पहन सकते, बाल छोटे नहीं कर सकते, पुरुषों की तरह चल नहीं सकते, उनकी तरह जोर से हंस नहीं सकते-लड़कियों को ऐसे असंख्य निर्देशों का पालन करना पड़ता है। उन्हें यह बात घुट्टी में पिला दी जाती है कि शादी से पहले उन्हें सिर झुकाकर, मुंह बंद कर रहना होगा, और शादी के बाद पति और ससुराल वालों के कहे अनुसार चलना होगा। अब भी गांवों में यही मानसिकता काम करती है। एक समय शहरों में महिलाओं के बारे में यही सोच थी। यह सच्चाई किसी एक देश की नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप समेत ज्यादातर विकासशील देशों का सच यही है। यह बात स्वीकारनी ही होगी कि पूरी दुनिया में महिलाओं को अपने अधिकार धीरे-धीरे मिले हैं। जिन विकसित देशों में आज महिलाओं को अपने फैसले लेने की आजादी है, वहां भी एक समय उन्हें पुरुषों के कहे अनुसार चलना पड़ता था। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उन देशों में भी अपने अधिकारों के लिए महिलाओं को लड़ाई लड़नी पड़ी है।

मैं बांग्लादेश के चटगांव की एक किशोरी को जानती हूं। वह हमेशा पुरुषों की पोशाक में रहती है। उसने अपने बाल छोटे कर रखे हैं और जूते भी वह पुरुषों के पहनती है। पहली नजर में कोई भी उसे पुरुष ही समझेगा। पुरुषों के वेश में वह अनायास सड़कों से अकेली गुजरती है और बाजार जाती है। उसने शायद समझ लिया है कि पुरुषवर्चस्ववादी समाज में पुरुषों की वेशभूषा में ही वह सुरक्षित रह सकती है। लेकिन जिस दिन किसी पुरुष को पता चलेगा कि यह पुरुष नहीं, नारी है, उसी दिन वह सड़कों पर असुरक्षित हो जाएगी। सच यह भी है कि दुनिया भर की लड़कियां-स्त्रियां सार्वजनिक जगहों पर अपनी स्त्री पहचान के साथ ही घूमती हैं, लेकिन ज्यादातर पिछड़े समाज में ही नारियों को कमजोर मानकर उन्हें निशाना बनाया जाता है। विकसित देशों में स्त्रियों पर अत्याचार कम नहीं होते। लेकिन वहां महिलाओं की अपनी पहचान है, उनकी पहचान अपने पिता या पति के कारण नहीं है। विकसित देशों में लड़कियों को जींस पहनने के कारण मरना नहीं पड़ता। हालांकि नेहा की मृत्यु के बारे में स्थानीय पुलिस का कहना था कि जींस पहनने के कारण उसकी पिटाई नहीं हुई थी। लेकिन इससे महिलाओं की स्थिति नहीं बदल जाती। न ही इससे नेहा पासवान पर जुल्म ढाने वालों का अपराध कम होता है।

नेहा पासवान के चाचा और दादा जैसे लोग हमारे आसपास भरे पड़े हैं। याद रखना होगा कि स्त्रियों के सामूहिक प्रतिरोध से ही इस क्रूरता पर अंकुश लगाया जा सकता है।

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