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भारतीय न्याय प्रणाली: हत्या की लापता कहानी से उभरे सवाल और पड़ताल से खुलती मानवीय वृत्तियां
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विस्तार
नोएडा से आई यह खबर सुनकर आम नागरिक दंग हैं, लेकिन असल सवाल कहीं गहरा है कि क्या हमारी जांच प्रणाली अब भी अनुमान और जल्दबाजी पर आधारित है? बिहार के मोतिहारी से कथित रूप से गायब एक महिला को मृत मानकर उसके पति को चार महीनों से जेल में डाल दिया गया, जबकि वह महिला नोएडा में अपने बॉयफ्रेंड के साथ जीवित घूमती मिली। चौंकाने वाली बात यह है कि पुलिस न सिर्फ चार्जशीट दाखिल कर चुकी थी, बल्कि कुछ ही दिनों में मुकदमे की सुनवाई शुरू होने वाली थी। यह सिर्फ एक सनसनीखेज अपराध रिपोर्ट नहीं, बल्कि भारतीय न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता, जिम्मेदारी और वैज्ञानिकता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करने वाली घटना है।असल समस्या यह है कि वर्षों से हमने मान लिया है कि जांच का मतलब सिर्फ एफआईआर से चार्जशीट तक पहुंचना है। मगर इससे केवल खानापूर्ति ही हो सकती है। न्याय की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि साक्ष्य कितना सच बोल रहे हैं। हमें यह समझने की जरूरत है कि कानून चाहे पुराने हों या नए, न्याय तभी मिलेगा, जब जांच ईमानदार, पेशेवर और वैज्ञानिक तरीके से की जाएगी। नोएडा-मोतिहारी कांड इस देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था के सामने यही आईना रखता है।
पिछले साल दंड प्रक्रिया से जुड़े तीन बड़े कानून पारित किए गए-भारतीय नागरिक संहिता, 2023, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023। ये नए कानून भारतीय दंड संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम और दंड प्रक्रिया की जगह पर लाए गए हैं। सरकार का दावा है कि इन कानूनों का उद्देश्य ‘सत्य पर आधारित न्याय’ को सुनिश्चित करना है। लेकिन इस मामले से यह भी स्पष्ट हो गया है कि कानून बदलने से नहीं, बल्कि जांच के तरीकों में सुधार से बदलाव आएगा।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि चार्जशीट दाखिल कैसे हुई? भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 193 अपेक्षा करती है कि अंतिम रिपोर्ट (चार्जशीट) तभी दाखिल की जाए, जब जांच अधिकारी के पास ठोस साक्ष्य हों। इस मामले में यदि कथित मृतका जीवित है, तो ‘ठोस साक्ष्य’ क्या थे? पुलिस ने पहचान का सत्यापन क्यों नहीं किया? क्या फोरेंसिक प्रमाण जुटाया गया था? भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 176 कहती है कि संबंधित तथ्यों की सम्यक जांच और वैज्ञानिक साक्ष्य एकत्र करना जरूरी है। मौजूदा मामले को देखने से साफ होता है कि जांच की पहली सीढ़ी पर ही भारी चूक की गई थी। गुमशुदगी को हत्या मानने से पहले यह जरूरी है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों, मेडिकल रिपोर्ट, डिजिटल लोकेशन और डीएनए विश्लेषण जैसे माध्यमों से पर्याप्त साक्ष्य जुटा लिए जाएं। अब सवाल है कि क्या मृत घोषित महिला की कोई पोस्टमार्टम रिपोर्ट थी? किस आधार पर यह मान लिया गया कि उसकी हत्या हुई है? और अदालत तक पहुंचे दस्तावेज क्या वैज्ञानिक दृष्टि की कसौटी पर खरे उतरते थे?
जब पति चार महीने से जेल में था, तो यह ‘न्यायिक हिरासत’ थी, जो एक गंभीर कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन अदालत तक पहुंचने से पहले जो सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, वह है जांच की गुणवत्ता। यदि जांच ही दोषपूर्ण है, तो पूरी न्यायिक प्रक्रिया दोषपूर्ण हो जाती है। मामले का दूसरा पक्ष सांविधानिक अधिकार का है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है-‘किसी भी व्यक्ति का जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता कानून की प्रक्रिया के बिना नहीं छीने जा सकते।’ यहां ‘प्रक्रिया’ तो चल रही थी, लेकिन वह नियमानुकूल नहीं थी। और यदि गलत जांच के कारण निर्दोष व्यक्ति जेल में है, तो यह लोकतंत्र में अन्याय का सबसे क्रूर रूप है। नई नागरिक सुरक्षा संहिता में कई सुधार ऐसे हैं, जिनका उद्देश्य इसी तरह की गलतियों को रोकना है। इस कानून में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर जांच की अपेक्षा की गई है। मोबाइल लोकेशन, बैंक रिकॉर्ड और कैमरा फुटेज आदि के आधार पर महिला की मौजूदगी आसानी से पता लगाई जा सकती थी। हत्या तथा अन्य गंभीर मामलों में उच्च अधिकारी की जिम्मेदारी है कि वे जांच की निगरानी करें। लेकिन इस निगरानी का पालन हुआ या नहीं, यह अपने-आप में जांच का विषय है। वहीं धारा 176 के तहत हर गंभीर अपराध में फोरेंसिक जांच अनिवार्य है। फिर डीएनए जांच और पहचान परीक्षण क्यों नहीं हुआ?
इन सबके बावजूद, अदालत की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। चार्जशीट प्रस्तुत किए जाने के बाद धारा 196 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट, मृत्यु के कारणों की जांच कर सकते हैं। वह चार्जशीट के आधार की भी जांच कर सकते हैं। अदालतों से अपेक्षा की जाती है कि वे हर केस का सम्यक मूल्यांकन करने के बाद ही आगे बढ़ें। अदालत यदि इस ‘फिल्टर’ को मजबूत करे, तो ऐसे मामले शुरुआत में ही रोक दिए जाएं। यह केवल एक आरोपी का नहीं, बल्कि कई स्तरों पर पीड़ितों का मामला है। निर्दोष व्यक्ति जेल में रहा, उसका परिवार सामाजिक शर्म और अविश्वास का बोझ ढोता रहा, राज्य की पुलिस प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए और सबसे अहम बात-कानून पर आम आदमी का भरोसा कमजोर हुआ। यह किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक बात है।
सुधार करने के सुझाव स्पष्ट हैं। प्रथम, प्री-चार्जशीट ऑडिट शुरू होना चाहिए-जिला स्तर पर ‘केस रिव्यू बोर्ड’ बनाए जाएं। दूसरा, हर हत्या के मामले में डीएनए परीक्षण अनिवार्य किया जाए। तीसरा, गलत चार्जशीट पर जांच अधिकारियों की जवाबदेही तय हो और चौथा, इंग्लैंड की तरह ‘निर्दोष रिहाई एवं मुआवजा कानून’ लाया जाए। नोएडा-मोतिहारी घटना कोई अपवाद नहीं है। यह ‘जांच बनाम सत्य’ की लड़ाई का संकेत है। अदालत का सम्मान तभी बढ़ेगा, जब मामला अदालत तक पहुंचने से पहले ईमानदार और वैज्ञानिक जांच से होकर गुजरे। नए कानूनों ने रास्ता साफ कर दिया है, अब आवश्यक है कि पुलिस प्रशासन इसे ‘कानूनी औपचारिकता’ नहीं, बल्कि ‘सत्य की खोज’ मानकर लागू करे। कानून तभी जीवित होते हैं, जब उनकी आत्मा पर अमल हो। नहीं तो, चार्जशीट की फाइलें अदालतों में बढ़ती रहेंगी और निर्दोष लोग जेलों में। इस घटना ने हमें याद दिलाया है कि न्याय केवल सजा देना नहीं, बल्कि सच्चाई साबित करना है। edit@amarujala.com