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मुद्दा: इंडिया दैट इज भारत; संविधान में खुले हैं दोनों विकल्प
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भारत
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विस्तार
अपने देश के नाम को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। शुरुआत एक निमंत्रण पत्र को लेकर हुई, जिसे राष्ट्रपति की ओर से लिखा गया है। उसमें राष्ट्रपति के पद नाम को 'भारत गणतंत्र का राष्ट्रपति' लिखा गया है। कुछ लोग मानते हैं कि चूंकि इसके लिए पारंपरिक तौर पर 'रिपब्लिक ऑफ इंडिया' का इस्तेमाल होता रहा है, इसलिए इसमें कोई छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।हमारे संविधान के पहले अनुच्छेद में ही कहा गया है, 'इंडिया दैट इज भारत शैल बी यूनियन ऑफ स्टेट्स।' यानी 'इंडिया अर्थात भारत राज्यों का संघ होगा।' अनुच्छेद- 1 में ही यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हमारे देश का नाम इंडिया और भारत, दोनों है और इसमें से किसी भी नाम से इसे संबोधित किया जा सकेगा। आम तौर पर किसी घटना या कार्यक्रम को अखिल भारतीय स्वरूप देने के लिए इंडिया या भारत शब्द का इस्तेमाल होता है। जैसे, राहुल गांधी जी की 'भारत जोड़ो यात्रा।' इसी तरह वंदे भारत ट्रेन, अतुल्य भारत से राष्ट्रीय गौरव के बारे में जागरूकता अभियान, स्वच्छ भारत मिशन के नाम से पोर्टल तथा दूसरी सरकारी गतिविधियां भी भारत नाम से जुड़ी हुई हैं।
अंग्रेजी नाम वाली गतिविधियों या कार्यक्रमों का भी जब हिंदी अनुवाद किया जाता है, तो वहां इंडिया की जगह भारत शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, जैसे डिजिटल इंडिया के लिए डिजिटल भारत। भारत सरकार के राजपत्र को अंग्रेजी में गजट ऑफ इंडिया और हिंदी में भारत का राजपत्र कहा जाता है।
हर संप्रभु राष्ट्र को अपना नाम रखने का अधिकार होता है। हमारे देश को अलग-अलग समय पर अलग-अलग नाम से संबोधित किया जाता रहा। वर्ष 1857 के बाद जब ब्रिटेन की सरकार ने पूरे देश का शासन सूत्र अपने हाथ में ले लिया, तो एकरूपता बनाए रखने के लिए इंडिया नाम पर मुहर लग गई। कानूनों में भी इंडिया शब्द का प्रयोग किया गया, जैसे 1861 में इंडियन काउंसिल ऐक्ट तथा 1909, 1919 और 1935 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट के तीन अलग-अलग संस्करणों में भी इंडिया शब्द का इस्तेमाल किया गया। आजादी से संबंधित 1947 के कानून को गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट नाम दिया गया। संविधान सभा में भी हमारे राष्ट्र के नामकरण को लेकर चर्चा हुई थी। 18 सितंबर, 1948 को संविधान के अनुच्छेद-1 से जुड़ा संशोधन हरि विष्णु कामत पेश कर रहे थे। देश के नामकरण के मुद्दे पर उन्होंने कहा, ‘कुछ लोग कह रहे हैं कि नाम की जरूरत क्या है, इस देश को इंडिया तो कहा ही जाता है, लेकिन जो लोग भारत या भारतवर्ष या भारतभूमि नाम रखना चाहते हैं, उनका तर्क है कि यह इस धरती का सबसे पुराना नाम है।’ कामत की बात पर संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर खड़े हो गए थे। दक्षिण और गैर हिंदीभाषी राज्यों के सदस्यों ने भी भारत नाम पर आपत्ति जताई। उसके बाद सदन में भारत अर्थात इंडिया प्रस्ताव पर वोटिंग कराई गई, जो गिर गया। दूसरे कई प्रस्ताव भी गिर गए। आखिर में ‘इंडिया दैट इज भारत शैल बी यूनियन ऑफ स्टेट्स’ नामकरण सदन से पारित हो गया।
यह अलग बात है कि समय-समय पर इंडिया की जगह भारत नाम रखने की बात हुई। वर्ष 2004 में मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री काल में उत्तर प्रदेश की विधानसभा ने इंडिया के बजाय देश का नाम भारत रखे जाने से संबंधित प्रस्ताव पारित किया था। ऐसे ही, वर्ष 2015 में केंद्र की मोदी सरकार ने एक जनहित याचिका के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय से कहा था कि देश को इंडिया के बजाय भारत न कहा जाए। बाद में खुद सुप्रीम कोर्ट ने भी इंडिया के बजाय भारत कहे जाने से संबंधित जनहित याचिका खारिज कर दी थी। अगर सरकार प्रस्तावना में 'वी द पीपल ऑफ इंडिया' की जगह भारत शब्द जोड़ना चाहती है, तो उसे संविधान में संशोधन करना होगा। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से इसे पारित कराना होगा। साथ ही, देश की आधी विधानसभाओं की मंजूरी भी चाहिए। इसके बाद भी यह न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है।
(लेखक तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के प्रोफेसर और अधिष्ठाता, विधि संकाय हैं।)