{"_id":"650cf396993eb48a2e0f4248","slug":"india-strategy-in-afghanistan-kept-eye-on-terrorist-groups-and-steps-of-china-pakistan-2023-09-22","type":"story","status":"publish","title_hn":"विश्लेषण: काबुल में भारत की रणनीति यानी एक तीर से कई निशाने","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
विश्लेषण: काबुल में भारत की रणनीति यानी एक तीर से कई निशाने
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
तालिबान (फाइल)
- फोटो :
ANI
विस्तार
हाल ही में चीन ने अफगानिस्तान में अपना स्थायी राजदूत तैनात किया है। चीन वह पहला देश है, जिसने तालिबानी शासन स्थापित होने के बाद ऐसा किया है। इसके विपरीत, भारत लो-प्रोफाइल कूटनीति के जरिये तालिबान शासित काबुल में अपनी मौजूदगी स्थापित करने की उम्मीद रखता है, ताकि मानवीय सहायता के माध्यम से अफगानी लोगों के बीच सद्भावना बरकरार रखी जा सके। भारत द्वारा फूंक-फूंककर कदम उठाने का अघोषित मतलब यह है कि एक तरफ जहां अफगानिस्तान में सक्रिय भारतीय हितों के लिए हानिकारक विभिन्न आतंकवादी गुटों पर नजर रखी जा सके, वहीं चीन और पाकिस्तान की गतिविधियों पर भी नजर रखी जा सके, जिनके हित पूरी तरह न सही, पर काफी हद तक मिलते हैं।
गोवा में इसी साल हुई शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में हमारे विदेश मंत्री एस जयशंकर ने टिप्पणी की थी कि 'हमारी तात्कालिक प्राथमिकता में मानवीय सहायता प्रदान करना, एक समावेशी और प्रतिनिधि सरकार सुनिश्चित करना, मादक पदार्थों की तस्करी एवं आतंकवाद से मुकाबला करना तथा महिलाओं, बच्चों एवं अल्पसंख्यकों के अधिकारों का संरक्षण करना है।'
आम अफगानी लोगों के बीच सद्भावना बरकरार रखते हुए भारत ने तालिबान नेतृत्व के एक वर्गे, जैसे कि तालिबान के उप विदेश मंत्री शेर मोहम्मद अब्बास स्टानिकजई के साथ, जिन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी में प्रशिक्षण लिया, संपर्क बनाए रखा है। गौरतलब है कि तालिबान शासन का जुड़ाव हक्कानी परिवार से है, जिसने अतीत में भारत के हितों को नुकसान पहुंचाया था, इसलिए नई दिल्ली सावधान है कि उसके संबंधों को तालिबान के कूटनीतिक आलिंगन या विरोधी शासन मॉडल के समर्थन में न देखा जाए। बाकी दुनिया की तरह भारत भी तालिबानी शासन को मान्यता नहीं देता है। बिना किसी चुनौती के सत्ता में आए तालिबान से यह उम्मीद नहीं है कि वे विश्व समुदाय की मांग के अनुरूप अपनी महिलाओं और जातीय अल्पसंख्यकों के साथ बेहतर व्यवहार करेंगे। अनिवार्य रूप से यह अफगानिस्तान का घरेलू मामला है, लेकिन इस मामले में वैश्विक दबाव काफी हद तक अप्रभावी रहा है। इसलिए अफगानिस्तान के आतंकवाद का केंद्र बनने की चिंता स्वाभाविक एवं गंभीर है।
महिलाओं के खिलाफ तालिबान के धर्मयुद्ध का ताजा खुलासा पिछले महीने तब हुआ, जब दुबई में एक विश्वविद्यालय में समायोजित होने की उम्मीद करने वाले कम से कम 60 संभावित विद्वानों को काबुल हवाई अड्डे से निकाल दिया गया था। इसके बाद इसी तरह की कई घटनाएं हुईं, जो लड़कियों के माध्यमिक या उच्च शिक्षा के अधिकारों को छीनने से लेकर सहायता एजेंसियों में काम करने वाली महिलाओं पर प्रतिबंध और ब्यूटी पार्लरों पर प्रतिबंध तक फैली हुई है। दोहा वार्ता के दौरान अफगानिस्तान के वार्ताकारों ने संकेत दिया था कि तालिबान 2.0 पाकिस्तान और सऊदी समर्थित अपने पुराने अवतार से अलग होंगे। लेकिन उन्होंने अफगानिस्तान छोड़ने के लिए उत्सुक अमेरिकियों को बेवकूफ बनाया।
पिछले महीने, बामियान में बंद-ए-अमीर राष्ट्रीय उद्यान को महिलाओं के लिए प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया था। असल में तालिबान महिलाओं को बाहर निकलने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी आधिकारिक प्रतिक्रिया है कि महिलाओं के लिए दर्शनीय स्थलों की यात्रा करना जरूरी नहीं है। असहाय दुनिया को यह लग रहा है कि तालिबान अफगानिस्तान के भविष्य को नष्ट कर रहे हैं। लेकिन बड़ी शक्तियों की वर्चस्व की होड़ से अलग कुछ समझदार लोगों के समक्ष यह साफ है कि महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह विकसित और अविकसित सहित सभी समाजों में अलग-अलग स्तर तक व्याप्त हैं।
यह रुककर इंतजार करने का वक्त है। सद्दाम हुसैन के इराक में परमाणु शस्त्रागार की 'खोज' से पहले 2001 में तत्कालीन अमेरिकी प्रथम महिला, लौरा बुश ने अफगान महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार को एक मुद्दा बनाया था, जो अफगानिस्तान पर हमले का एक बहाना बना। कुछ अमेरिकी पत्रकारों ने माना है कि सोवियत समर्थित शासन के दौरान शहरी अफगानिस्तान में महिलाओं को अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए सबसे कम पाबंदियों का सामना करना पड़ा।
कम्युनिस्ट शासित अफगानिस्तान में एक महिला मंत्री अनाहिता रातेब्जाद थीं, जो अफगान संसद के लिए चुनी गई पहली महिलाओं में से एक थीं और 1980 से 1986 तक मुल्क की उप प्रमुख रहीं। वर्ष 1985 में काबुल विश्वविद्यालय में 7,000 छात्रों में से 65 प्रतिशत महिलाएं थीं, जो पिछले समय में या अमेरिका/नाटो की मौजूदगी के दौरान अकल्पनीय थी, जब अमेरिका द्वारा प्रशिक्षित अफगान मुजाहिदीन ने अधिकांश स्वतंत्रता खत्म कर दी और लड़कियों को पढ़ाने वाले शिक्षकों का गला काट दिया। अब तालिबान सरकार की नीतियों के कारण अफगानिस्तान उन कुछ देशों में से एक है, जहां पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा आत्महत्या करती हैं।
किसी भी देश ने औपचारिक रूप से तालिबान शासन को मान्यता नहीं दी है, यहां तक कि तालिबान के पुराने अवतार के प्रायोजक-पाकिस्तान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने भी नहीं। काबुल के साथ संबंध रखते हुए भारत अभी तटस्थ है, जबकि पाकिस्तान, चीन, रूस, ईरान, तुर्किये, कजाकिस्तान और कुछ अरब एवं अफ्रीकी देशों में अफगान दूतावास तालिबान द्वारा नियुक्त राजनयिकों के अधीन कार्य कर रहे हैं।
चर्चा है कि अफगानिस्तान संभवतः मानवाधिकारों के उल्लंघन से बेपरवाह चीनी संस्थाओं को अपनी धरती के नीचे दबे दुर्लभ खनिजों के दोहन की अनुमति देकर मुनाफा कमा रहा है। तालिबान इस बात को लेकर उत्सुक हैं कि चीन तांबे का पता लगाकर उसका खनन करे, जिसका उसके पास विशाल भंडार है। इस तरह की गतिविधियों से अफगानिस्तान को स्पष्ट रूप से लाभ हो सकता है, क्योंकि उसकी सबसे आकर्षक उपज, अफीम, हेरोइन का मुख्य घटक है।
अफगान लोगों के अतीत और मौजूदा दुर्दशा में अनेक देशों का योगदान है, लेकिन अभी उनकी नियति तालिबान के हाथों में है। दो दशकों तक पाकिस्तान ने तालिबान की मेजबानी की और उन्हें सत्ता में वापसी की सुविधा प्रदान की, लेकिन उन्होंने दिखा दिया कि वे अपने पूर्ववर्ती मददगार के भी खिलाफ जा सकते हैं, भले ही वह बाहरी दुनिया तक पहुंचने और उनकी रोजमर्रा की जरूरतों का प्रमुख स्रोत हो। तालिबान अपनी शर्तों पर दुनिया से निपटेंगे, चाहे वहां के लोगों के साथ जो भी सुलूक हो।