दलाई लामा और शेख हसीना को शरण देने से पड़ोसी नाराज; भारत के सामने कूटनीतिक संतुलन बनाने की चुनौती
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विस्तार
पश्चिम एशिया में ईरान और इस्राइल के बीच या यूक्रेन में पुतिन के युद्ध को लेकर भारतीय कूटनीति के लिए नाजुक संतुलन की बड़ी चुनौतियां हैं। लेकिन इस समय आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा और बांग्लादेश की बेदखल प्रधानमंत्री शेख हसीना की मौजूदगी के चलते भारत को ज्यादा प्रत्यक्ष चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। दलाई लामा के उत्तराधिकार के मामले में भारत का स्पष्ट रुख है कि इस प्रक्रिया को तिब्बती नेताओं और उनके समुदाय पर छोड़ देना चाहिए, जिससे चीन नाखुश है। भारतीय केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू की इस मामले में टिप्पणी से बीजिंग और चिढ़ गया है, क्योंकि रिजिजू अरुणाचल प्रदेश के बौद्ध हैं, जिस पर चीन दावा जताता रहा है। बीजिंग के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दलाई लामा को 90वें जन्मदिन पर बधाई देने पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि चीन अपने आंतरिक मामले में कोई भी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेगा।
बीजिंग की दुविधा : मौजूदा दलाई लामा ने यह कहकर चीन को असमंजस में डाल दिया था कि 2024 के अंत तक वह तय करेंगे कि उनके निधन के बाद दलाई लामा की संस्था जारी रहेगी या नहीं। अगर वह ऐसा करते, तो उत्तराधिकार का कोई मुद्दा नहीं होता और तिब्बती समुदाय का नेतृत्व धर्मशाला स्थित निर्वाचित, निर्वासित सरकार और एक सिक्योंग (राष्ट्रपति) द्वारा संचालित केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के हाथों में चला जाता। दरअसल, दलाई लामा ने तिब्बती समुदाय से जुड़े ज्यादातर मामलों को सिक्योंग और निर्वासित सरकार के हवाले कर दिया है। पर सिक्योंग में दलाई लामा जैसा आध्यात्मिक आकर्षण नहीं होगा, जो तिब्बत के अंदर और बाहर, तिब्बती समुदाय पर अपना निरंतर प्रभाव बनाए रख सके और दुनिया में तिब्बत की विशिष्ट पहचान को जीवित रख सके।
निर्वासित तिब्बती सरकार चीन के लिए एक चुनौती बनी रहेगी, लेकिन अगर दलाई लामा जैसी संस्था नहीं रही, तो बीजिंग निर्वासित सरकार को अलगाववादी बताकर भारत पर दबाव डाल सकता है कि वह उसे अपनी धरती पर शरण और समर्थन न दे। इसी साल प्रकाशित वॉइस फॉर द वॉइसलेस में दलाई लामा ने कहा है कि उनका उत्तराधिकारी एक स्वतंत्र दुनिया में जन्म लेगा, यानी चीन से बाहर, जिससे चीन काफी नाराज था। इसे दलाई लामा के उत्तराधिकार में चीनी सरकार की किसी भी भूमिका को नकारने की एक चतुर चाल के रूप में देखा गया। यदि वर्तमान दलाई लामा चीन के बाहर अपना उत्तराधिकारी घोषित करेंगे, तो चीनी शासक तिब्बतियों पर अपना दलाई लामा थोपने की कोशिश करेगा। नतीजतन दो दलाई लामा होंगे-एक चीन समर्थित दलाई लामा, और दूसरा वर्तमान दलाई लामा के उत्तराधिकार प्रक्रिया के जरिये बनाया गया दलाई लामा।
बीजिंग का वार्ता से इन्कार : चीन द्वारा मौजूदा दलाई लामा को ‘अलगाववादी’ कहने के बावजूद तिब्बती आध्यात्मिक नेता ने तिब्बती स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र विद्रोह का समर्थन नहीं किया है, जैसा कि 1950 के दशक के अंत में उग्र खंपाओं ने सशस्त्र विद्रोह किया था। उन्होंने तिब्बत के भविष्य का फैसला करने के लिए बीजिंग के साथ बातचीत की मांग की है। 2005 में मैंने दलाई लामा का एक साक्षात्कार लिया था, तब उन्होंने तिब्बत लौटने और अपने जीवने के अंतिम वर्ष वहीं बिताने की इच्छा जाहिर की थी। शी जिनपिंग जब राष्ट्रपति बने, तब संकेत मिले थे कि वह दलाई लामा को बातचीत के लिए बुलाएंगे, लेकिन शायद उनकी मजबूत छवि न बिगड़े, इस वजह से वह पीछे हट गए। भारतीय लोकतंत्र में जातीय अलगाववाद को दूर करने के लिए ऐसे समाधान खोजे गए हैं, लेकिन कम्युनिस्ट चीन या सैन्य-प्रधान पाकिस्तान में इन्हें पसंद नहीं किया जा रहा है।
भारत के लिए निहितार्थ : संकेत हैं कि तिब्बत विवाद लंबा चलेगा और इसमें भारत को भी घसीटा जाएगा। सीमा विवाद पर भारत और चीन के बीच कुछ प्रगति हुई है, लेकिन दलाई लामा के उत्तराधिकार को लेकर भारत का रुख बीजिंग को नागवार गुजरेगा, जिससे सीमा वार्ता में खलल पड़ सकता है और चीनी सेना (पीएलए) हिमालयी सीमा पर फिर से घुसपैठ शुरू कर सकती है। भारत पहले से ही भूटान पर बढ़ते चीनी दबाव को लेकर चिंतित है। सीमा विवाद को फिर से शुरू करने और पड़ोस में शत्रुतापूर्ण कदम उठाने के अलावा, चीन भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवादियों को समर्थन देना भी शुरू कर सकता है।
बांग्लादेश की नाराजगी : बीते साल अगस्त में हुए छात्र आंदोलन के बाद से ही बांग्लादेश की बेदखल प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत में शरण ली हुई हैं। बिमस्टेक सम्मेलन से इतर बैंकॉक में हुई बैठक में मोहम्मद यूनुस ने प्रधानमंत्री मोदी से शेख हसीना पर लगाम लगाने का अनुरोध किया था, जिसे मोदी ने यह कहते हुए नकार दिया कि सोशल मीडिया के दौर में अभिव्यक्ति की आजादी से किसी को नहीं रोका जा सकता। यूनुस सरकार पहले ही हसीना के खिलाफ दायर अनगिनत मामलों में मुकदमा चलाने के लिए उनके प्रत्यर्पण की औपचारिक मांग कर चुकी है। अब उनकी अनुपस्थिति में उन पर मुकदमा चलाया जा रहा है। यदि बांग्लादेश सरकार शेख हसीना के प्रत्यर्पण के लिए इसमें इंटरपोल को शामिल करती है, तो भारत खुद को मुश्किल स्थिति में पाएगा, क्योंकि दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि मौजूद है। हसीना लगातार अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से संपर्क में हैं और यूनुस पर आरोप लगाकर उनकी मुसीबतें बढ़ा रही हैं। यूनुस चीन, अमेरिका और पाकिस्तान के चहेते बने हुए हैं, लेकिन भारत में अवामी लीग के हजारों नेताओं और समर्थकों की मौन सहमति यूनुस की चिंता बढ़ा रही है।
दलाई लामा की तरह हसीना को भी भारत समर्थन दे रहा है। दलाई लामा को भारतीय समर्थन आध्यात्मिक कारणों से प्राप्त है, तो हसीना को राजनीतिक कारणों से। हसीना और उनके दिवंगत पिता शेख मुजीबुर रहमान भारत के विश्वसनीय सहयोगी रहे हैं। किसी भी स्थिति में हसीना से समर्थन वापस लेना भारत की कमजोरी के रूप में देखा जाएगा। एक क्षेत्रीय शक्ति के लिए यह विकल्प अस्वीकार्य है, जो एक ऐसे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका निभाने की आकांक्षा रखती है, जो अपनी मजबूत छवि का दावा करता है। इसका मतलब यह भी है कि भारत को इसके नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।