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विश्लेषण: भूटान के साथ भारत को निभानी होगी बड़े पड़ोसी की भूमिका, इसी में है दोनों देशों का हित

Thu, 09 Nov 2023 08:07 AM IST
Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Thu, 09 Nov 2023 08:07 AM IST
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सार
भारत और भूटान की नियति आपस में जुड़ी हुई है, जिसे बिना किसी परेशानी के आगे बढ़ाया जा सकता है। भले ही भारत सोचता है कि चीन नई दिल्ली एवं थिंपू के बीच दरार पैदा कर रहा है, लेकिन अब उसे देखना होगा कि थिंपू क्या चाहता है। भूटान की तरक्की में मदद करना भारत के हित में है।
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India big role in Bhutan progress fruitful for both countries India-Bhutan Relations
PM Modi with Bhutan King - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

हिमालयी स्वर्ग माने जाने वाले भूटान की पहुंच दुनिया तक हो रही है और जैसा कि एक बड़े पड़ोसी के रूप में भारत को करना चाहिए, वह अपने छोटे एवं भूमि से घिरे पड़ोसी राष्ट्र की मदद कर रहा है। भूटान के पांचवें नरेश जिग्मे खेसर नामग्याल वांग्चुक की भारत यात्रा ने रिश्ते में तेजी से बदलते पैटर्न को रेखांकित किया है, जिसकी अनिवार्यता का राष्ट्रों के निजी हितों के साथ-साथ क्षेत्र की भू-राजनीति द्वारा निर्धारित साझा हितों की रक्षा करते हुए सम्मान करना चाहिए। उनकी यात्रा की समाप्ति के बाद भारत निश्चित रूप से इसका विश्लेषण करेगा कि भूटान नरेश और उनके दल ने तात्कालिक और दीर्घकालिक दृष्टि से भारत की चिंताओं का कितना ध्यान रखा। चूंकि चीन एक अपरिहार्य कारक है, इसलिए भारत को क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर चाहते या न चाहते हुए भी भूटान के भू-राजनीतिक संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका को बदलकर उसके साथ साझेदारी का रिश्ता बनाना होगा।



इसमें भूटान को अपना साझेदार चुनने की इजाजत देना शामिल है और यह अब तक के करीबी और सौहार्दपूर्ण रिश्ते का सबसे जटिल पहलू है। भले ही भारत सोचता है कि चीन नई दिल्ली एवं थिंपू के बीच दरार पैदा कर रहा है, लेकिन अब उसे इस बात के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है कि थिंपू क्या चाहता है। इसने वर्षों तक दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक संबंधों को रोका है। पर दोकलाम सीमा पर सैन्य झड़प होने के बाद भी भारत उस भूटान को सीमा विवाद पर बीजिंग के साथ बैठक करने से नहीं रोक सका, जिसकी रक्षा में वह मदद करता है। भले ही भारत की चिंता बड़ी है, लेकिन भूटान-चीन सीमा विवाद ऐसा है, जिस पर भूटान को भी पूरा ध्यान देना चाहिए। मई, 2023 में 'भूटान-चीन सीमा मुद्दे' पर 'विशेषज्ञ समूह' की 12वीं बैठक थिंपू में आयोजित की गई थी। उसके तुरंत बाद अगस्त में उसकी 13वीं बैठक बीजिंग में हुई। भूटान-चीन बैठक के हफ्ते भर बाद भूटान नरेश ने भारत का दौरा किया है।


इससे पहले, इसी वर्ष अप्रैल में भूटानी प्रधानमंत्री लोटे शेरिंग ने एक इंटरव्यू दिया था, जिससे भारतीय मीडिया के एक वर्ग में विवाद पैदा हो गया था, जिसमें अटकलें लगाई जा रही थीं कि भूटानी प्रधानमंत्री क्यों भूटानी क्षेत्र पर चीन के कब्जे से इन्कार कर रहे हैं और क्या भूटान ने चीन के साथ कोई क्षेत्रीय समझौता किया है। यह स्पष्ट होने के बाद कि भूटान का इरादा कोई नीतिगत बदलाव करने का नहीं है, भूटान और भारत, दोनों ने इस मुद्दे को शांत करने की कोशिश की। भारत की इस धारणा के मद्देनजर कि चीन उसे पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में घेरने की कोशिश कर रहा है, चिंताएं बनी हुई हैं, जो सभवतः कभी भी सामने आ सकती हैं और सीमा पर दिख सकती हैं।

भूटानी शाही दंपति उच्च शिक्षित एवं स्पष्टवादी हैं। भूटान नरेश अनुभवी हैं और उन्होंने बांग्लादेश की शेख हसीना की तरह अपने देश में भारत के खिलाफ सक्रिय आतंकवादियों के शिविर को कई वर्ष पूर्व खत्म कर अपनी साख साबित की है। इसलिए बहुत ज्यादा रक्षात्मक हुए बिना भूटान के उदय में मदद करना भारत के हित में है, क्योंकि दक्षिण एशिया के लिए चीन का रुख प्रतिस्पर्धी है, न कि प्रशंसात्मक और चीन का उद्देश्य भारत को उसके पारंपरिक मैदान में मात देना है। भूटान चीन के साथ सीमा साझा करता है और चीनी प्रभाव एवं दबाव को लेकर ज्यादा संवेदनशील है। दशकों से भारत पर्यटन, व्यापार, कई तरह के निवेश/अनुदान के साथ, जिसमें प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं के लिए वित्तपोषण एवं जानकारी शामिल है, भूटान का प्रमुख आर्थिक आधार बना हुआ है, जिसके चलते भूटान भारत को अधिशेष बिजली का निर्यात करता है।

भूटान पर्यावरण अनुकूल उद्योगों एवं वाणिज्यिक उद्यमों में भी निवेश करना चाहेगा, इसलिए भूटान नरेश ने पहली बार मुंबई की यात्रा की, जहां उन्होंने संभावित निवेशकों के साथ बातचीत की। वह भूटान की अर्थव्यवस्था से जुड़े मंत्रियों और अधिकारियों के साथ आए। भूटान के गलेफू में एक स्मार्ट सिटी शुरू होने वाला है, जिसमें एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भारत के रेल मार्ग से जुड़ेगा। थिंपू भी आईटी युग में छलांग लगाना चाहता है और भारत इसमें उसकी सबसे बेहतर मदद कर सकता है।
संयुक्त बयान में कहा गया कि साझेदारी के नए क्षेत्रों के संदर्भ में, जिसमें अब स्टार्ट-अप, अंतरिक्ष और एसटीईएम शिक्षा शामिल है, दोनों पक्षों ने अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग की प्रगति का स्वागत किया, जिसमें भारत और भूटान द्वारा संयुक्त रूप से विकसित पहले उपग्रह का प्रक्षेपण और इस वर्ष थिंपू में उपग्रह के ग्राउंड अर्थ स्टेशन का उद्घाटन शामिल है। भूटान नरेश श्रमिक बन जाने या पलायन करने वाले अपने युवाओं को शिक्षित करना चाहते हैं। भूटान की 7,70,000 की आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सेवा की जरूरत है। भारत ने असम के मेडिकल कॉलेजों में तीन सीटें आरक्षित करके अच्छा काम किया है।

संयुक्त बयान में भूटान के भीतर और उसके भारतीय पड़ोस में कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर दिया गया है। भारत भूटान-बांग्लादेश सहयोग की सुविधा भी प्रदान कर रहा है, जो सबके लिए लाभप्रद है। बांग्लादेश भूटान के आयात-निर्यात के लिए समुद्री मार्ग उपलब्ध करा रहा है। दोनों देश बांग्लादेश के साथ भूटान के व्यापार के लिए हल्दीबाड़ी (पश्चिम बंगाल)- चिलाहाटी (बांग्लादेश) रेल मार्ग को एक अतिरिक्त व्यापार मार्ग के रूप में मान्यता देने पर राजी हुए हैं। दोनों देश व्यापारिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर राजी हुए, जिसमें दादगिरी (असम) में मौजूदा भूमि सीमा शुल्क स्टेशन को भारत सरकार के समर्थन से एकीकृत चेक पोस्ट में उन्नयन के साथ-साथ भूटान के गलेफू में सुविधाओं का विकास भी शामिल है।

भारत और भूटान की नियति आपस में जुड़ी हुई है और बिना किसी परेशानी के इसे आगे बढ़ाया जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने भूटान के साथ मित्रता और सहयोग के अनूठे रिश्ते के प्रति भारत की प्रतिबद्धता जताई और भूटान सरकार की प्राथमिकताओं एवं नरेश के दृष्टिकोण के अनुसार भूटान के सामाजिक-आर्थिक विकास में पूर्ण समर्थन का वचन दोहराया।

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