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पंद्रह अगस्त: भारतीय जनता की मुक्तिगाथा और अपनी अस्मिता की पहचान का दिन
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स्वतंत्रता दिवस (फाइल फोटो)
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पीटीआई
विस्तार
पंद्रह अगस्त सिर्फ एक तारीख नहीं है। भारत की जनता के लिए यह अपनी अस्मिता की पहचान की तिथि है। इसी दिन हम ब्रिटिश कॉलोनी के नागरिक न रहकर स्वतंत्र भारत के नागरिक बने। इसी दिन स्वतंत्रता की हवा का आनंद इस विशाल देश की जनता ने अनुभव किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए इस देश के असंख्य लोगों ने अपनी जान गंवाई। हजारों लोगों को कारावास की हवा खानी पड़ी, अनेक लोगों को कालापानी की सजा मिली। ये कथाएं नहीं, वास्तविक घटनाएं हैं। भारत को मिली स्वतंत्रता में हजारों-लाखों लोगों के त्याग और समर्पण की भूमिका रही है। यह भी सच है कि देश के अलग-अलग कोनों के सैकड़ों अनाम लोगों ने देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया, लेकिन उनकी संघर्ष कथा हमारे स्वीकृत इतिहास ग्रंथों में कहीं दर्ज नहीं है।
स्वतंत्रता संग्राम के दौर की एक विशेषता यह भी थी कि देश के एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश की दूरियां मिट गईं। अंग्रेजी के साथ हिंदी भारत की भाषा के रूप में उभरकर सामने आई। एकता का यह अदृश्य सूत्र जनमानस में पैठ बनाता गया। स्वतंत्रता संग्राम और नवजागरण के क्रियाकलापों ने मिलकर सर्वत्र धार्मिक सद्भाव की लहरें फैलाईं। संकीर्णताएं मिटती चली गईं। जातिगत भेदभाव की दीवारें भी ढहने लगीं। कई प्रकार की विभिन्नताओं के बावजूद स्वतंत्रता एक बड़े देश की जनोन्मुखी आकांक्षा बन गई, जिसके लिए सर्वस्व न्योछावर करने की भावना तीव्र थी। भारतीयता की भावना स्वीकृत होती जा रही थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान बना, जिसमें भारत को लोकतंत्र घोषित किया गया। लोकतंत्र की परिकल्पना में मानवीय मूल्यों को सर्वाधिक महत्व दिया गया। न्याय, समभाव और सौहार्द को संविधान में प्रमुखता मिली। भारतीय संविधान सही अर्थों में समावेशी बना।
इसमें कोई शक नहीं कि भारत निरंतर विकास के पथ पर अग्रसर है। पूरी दुनिया में भारत का नाम आदर से लिया जाता है, जो हमारे लिए गर्व की बात है। लेकिन जब हम अपने देश के यथार्थ को निकट से देखते हैं, तो कई नकारात्मक स्थितियां भी सामने आती हैं। इसलिए जब हम अपनी स्वतंत्रता प्राप्ति पर विचार करने लगते हैं, तो हर्ष के स्थान पर विषाद हमें घेरने लगता है। कई प्रकार की अराजक स्थितियां उद्भासित होती दिखती हैं। इसमें अधिकार का केंद्रीकरण सबसे प्रमुख है। यह अधिकार धन केंद्रित भी है। इस प्रवृत्ति ने समता और सहोदर भाव को नष्ट कर दिया है। यह भीषण अवस्था तब दोगुनी-चौगुनी होने लगती है, जब उसमें जातिगत व धर्मगत भेदभाव प्रवेश करता है। क्या हम पूरे साहस के साथ कह सकते हैं कि हमारी लोकतांत्रिक परिघटना में धर्म और जाति का प्रवेश नहीं है! चुनावी राजनीति ने इसे और विकराल बना दिया है।
स्वतंत्रता का अर्थ अत्यंत गंभीर है। सही नागरिक बोध से युक्त एक स्वतंत्र समाज ही लोकतंत्र को बल प्रदान करता है। इस संदर्भ में हमें आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। क्या हमारा समाज स्वतंत्र है? एक समाज तभी स्वतंत्र महसूस करता है, जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो। यदि उसकी आधारशिला असंतुलित है, तो उसे स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता। आर्थिक असंतुलन की बात करें, तो समाज का एक तबका सुविधाजनक जीवन जी रहा है, तो दूसरा वर्ग विपन्नता की अग्नि में झुलस रहा है। यहां संविधान द्वारा परिकल्पित समता की भावना अर्थहीन हो जाती है।
हमारे देश की अधिकांश आबादी सामान्य स्तर की शिक्षा पा रही है। शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण ने इस फासले को बहुत बढ़ा दिया है। यह स्वतंत्र समाज के विकास के लिए घातक है। शिक्षा के अधिकार का आशय ही समान शिक्षा का अधिकार है। हमारे देश के कुछ बच्चे जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्यालयों में पढ़ते हैं, वहीं अधिकांश बच्चे मामूली स्कूलों में शिक्षा पाते हैं, जहां बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। क्या यह स्थिति एक स्वतंत्र समाज के लिए प्रीतिप्रद है? यहां मुझे चंद्रकांत देवताले की कविता- थोड़े-से बच्चे और बाकी बच्चे याद आ रही है- थोड़े-से बच्चों के लिए/एक बगीचा/उनके पांव दूब पर पड़ रहे हैं/ असंख्य बच्चों के लिए/कीचड़, धूल और गंदगी से पटी/गलियां हैं जिनमें वे/अपना भविष्य बीन रहे हैं। विभाजित समाज कतई स्वतंत्र समाज नहीं है। विभाजित समाज को लेकर राजनेताओं, अधिकारियों एवं पूंजीपतियों के अपने-अपने तर्क होंगे, पर एक विचारशील नागरिक के लिए ये तर्क उतने महत्वपूर्ण नहीं हो सकते, क्योंकि स्वतंत्रता को वे अगंभीर दृष्टि से देखना पसंद नहीं कर सकते।
हमारे पूर्वजों ने आजादी के लिए जो लड़ाई लड़ी, वह समतामूलक और अविभाजित समाज के निर्माण के लिए थी। अधिकार जब परम मूल्य हो जाता है, तब अस्वतंत्रता की प्रदूषित हवा सर्वत्र व्यापित होने लगती है। अधिकार समाज को कई खंडों में विभाजित करता है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने पूंजी केंद्रित अधिकार को बढ़ावा दिया है। उसके सामने सामान्य जीवन का कोई अर्थ नहीं रह गया है। जो भी सामान्य है, जमीनी है, यथार्थ है, वह धीरे-धीरे रद्द होता चला गया। लोकतंत्र की संवादात्मकता सबसे पहले खत्म हो गई। अधिकार की राजनीति में संवाद के लिए कोई जगह नहीं रही। मूल्याधारित संस्कृति बहिष्कृत होती गई। प्रौद्योगिकी को, जो विकास के लिए अनिवार्य है, अधिकार ने ग्रस लिया और अधिकार ने बाजार को जन्म दिया, जो सब कुछ तय करता है। इन कुछ स्थितियों के तहत क्या एक समाज स्वतंत्र हो सकता है?
वैश्विक संदर्भ में वर्तमान समय के समानांतर एक महावर्तमान भी जीवंत है। वस्तुतः वही सारे देशों को, उसके विकास-अविकास को, स्वतंत्रता को नियंत्रित कर रहा है। आज जो नव उपनिवेशवाद का दौर चल रहा है-महावर्तमान का-वह कई मायनों में अदृश्य है। उसका असर हमारे काल और हमारी भाषा पर पड़ता है। अस्वतंत्रता का अदृश्य आवरण हर कहीं है, अदृश्य शिकंजे की तरह। केंद्रीभूत अधिकार का यह आवरण स्वतंत्रता की पारदर्शिता के लिए घातक है। 15 अगस्त भारतीय जनता की मुक्तिगाथा और एक विशाल देश की सर्वस्वतंत्र कल्पनाओं से जुड़ी तारीख है। हमारे स्वत्व का प्रयाण इसी दिन हुआ था। यह स्वतंत्रता का प्रयाण था, लेकिन हमें अपने सीने पर हाथ रखकर पूछना चाहिए कि क्या हम पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं!