शिवाजी और सावरकर की परंपरा में

Ashok Kumar Updated Mon, 19 Nov 2012 03:07 PM IST
in tradition of shivaji and savarkar
एक व्यंग्य चित्रकार से हिंदू हृदय सम्राट होने तक का सफर तय करने वाले बाला साहब ठाकरे एक ऐसी लीक छोड़ गए हैं, जो अपने में अनूठी ही रहेगी। वह अपनी ही शर्तों पर जिए। वह जो कहते थे, देश सुनता था और जो लिखते थे, वह देश पढ़ता था। कोई उनकी बात से सहमत हो या न हो, इसकी उन्होंने कभी परवाह नहीं की।

राजनीतिक समझौतावाद अथवा मौसम के अनुसार वक्तव्य देना उन्होंने मंजूर नहीं किया। वह जो कहते थे, एजेंडा बन जाता था। आपातकाल में उन्होंने इंदिरा गांधी का साथ दिया, तो उसके बाद अयोध्या आंदोलन से जुड़कर प्रखर हिंदुत्व के ऐसे पुरोधा बने कि लोगों ने उन्हें हिंदू हृदय सम्राट की उपाधि दे डाली। पिछले राष्ट्रपति चुनाव में मराठा स्वाभिमान के नाम पर उन्होंने प्रतिभा ताई का समर्थन किया था और इस बार शालीनता और विद्वता के नाम पर प्रणब मुखर्जी का।

हिंदुत्व, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा सैनिक सम्मान जैसे मुददों पर उनके वक्तव्य प्रक्षेपास्त्रों की तरह पूरे उपमहाद्वीप में गूंजते थे। पाकिस्तान के आतंकवादियों में अगर किसी का खौफ था, तो वह बाला साहब और शिवसेना का था। लाहौर के मेरे एक वरिष्ठ संपादक मित्र ने कहा था कि हिंदुओं की दब्बू, धोती-चोटी और व्यापारी वाली छवि बाला साहब ने बदली और यह माहौल बनाया कि उन पर हमला होगा, तो जबर्दस्त प्रतिकार भी होगा।

पांचजन्य का संपादक होने के नाते कुछ वर्ष पूर्व बांद्रा स्थित उनके सुप्रसिद्ध बंगले मातोश्री में उनसे मिला था। तब हिंदू संगठनों की परिस्थिति से वह प्रसन्न नहीं थे। उनका कहना था कि अगर अल्पसंख्यक वोटों के भय से समझौता वाली मानसिकता नहीं बदली, तो भविष्य अच्छा नहीं है। उनके ये शब्द आज भी कानों में गूंजते हैं कि कांग्रेस जैसे बनकर कांग्रेस को पराभूत नहीं किया जा सकता, अपनी खासियत और अलग पहचान बनाए रखते हुए ही हम जीत सकते हैं। इसीलिए देश में किसी भी राष्ट्रीय घटना पर उनका वक्तव्य और सामना में संपादकीय सर्वाधिक धारदार होता था।

उनके शब्द में शक्ति थी। क्योंकि वह जो कहते थे, उसे कर दिखाने का भी उनमें साहस और सामर्थ्य था। यद्यपि उन्हें अति मराठावादी, मुसलिम-विरोधी तथा प्रांतीयता का पोषक कहकर सेक्यूलरों की जमात ने उन पर सवाल उठाए। लेकिन बाला साहब की प्रगाढ़ मैत्री का विराट दायरा प्रांत, भाषा और मजहब के दायरों से कहीं ऊपर था। दोस्ती निभाने में वह दुनिया के किसी कोने तक, किसी भी सीमा तक जाने को तैयार रहते थे।

उनसे मित्रता और सम्मान प्राप्त करने की एकमात्र कसौटी थी-भारत के प्रति अगाध निष्ठा और सम्मान। प्रांत और संप्रदाय का स्थान भारत के सामने गौण था। ठीक है कि प्रारंभ में महाराष्ट्र में गैर मराठियों के विरुद्ध शिवसेना खड़ी हुई, लेकिन उसे बाला साहब महाराष्ट्र की संस्कृति और पारंपरिक वातावरण की रक्षा करने वाले सामाजिक ताने-बाने के संदर्भ में समझाते थे। क्षेत्र की विशिष्टता और जमीनी सुगंध बचाना ही उस प्रारंभिक आंदोलन का हेतु था।

उन्हें कट्टर हिंदू और पाकिस्तान परस्त कहने वाले लोग वही सेक्यूलर हैं, जिनके लिए कश्मीरी हिंदुओं का अस्तित्व नहीं, जो अरुंधति राय, अली शाह गिलानी और यासीन मलिक की भाषा में भारत की धर्मनिरपेक्षता को परिभाषित करते हैं तथा अफजल और कसाब के मानवाधिकारों की चिंता करते हैं। ऐसे लोगों के आरोप की बाला साहब ने कभी चिंता नहीं की।

उन्हें चिंता इस बात की होती थी कि हिंदुत्व के संगठनों में आपसी फूट न बढ़े तथा हिंदू मुद्दों पर समझौतावादी घुटने टेक मानसिकता न अपनाई जाए। पाकिस्तान हम पर लगातार हमला करता रहे, आतंकवादियों को पोषित और प्रोत्साहित करता रहे, और हम उसके साथ क्रिकेट खेलें, यह कैसे हमारी देशभक्ति को परिभाषित कर सकता है? बाला साहब के इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं होता था। पिटते और मरते हुए भारतीय पाकिस्तान के साथ मनोरंजन की कव्वालियां गाएं, यह उन्हें कभी मंजूर नहीं हुआ।

उन्होंने अपना रास्ता खुद बनाया। भाजपा के साथ उनके गहरे रिश्तों के मूल में हिंदुत्वनिष्ठ दलों के वोटों को बंटने से रोकने की चिंता भी थी, ताकि कांग्रेस को लाभ न मिले। यह गठबंधन अपने आप में शानदार मिसाल बना। मतभेद रहे, कार्यक्रमों पर शत-प्रतिशत मतैक्य भी नहीं रहा, पर उसे मनभेद और बंटवारे में तबदील नहीं होने दिया गया। यही कारण रहा कि हर प्रकार के अवरोधों के बावजूद संसद से लेकर विधानसभा तक गठबंधन अपना प्रभाव जमाए रहा।

जीवन के संध्याकाल में बाला साहब को राज ठाकरे के अलग होने से गहरा झटका लगा। इसे उन्होंने कांग्रेस की एक चाल के रूप में देखा। जीवन के अंतिम कुछ वर्षों में बाला साहब का रुख काफी नरम और सर्वसमावेशी होता गया। वह काफी आध्यात्मिक भी हो गए थे। उनके पिता महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध प्रबोधनकार तथा भगवद्भजन के लिए विख्यात थे। जीवन का पहला सबसे बड़ा सदमा उन्हें अपनी धर्मपत्नी मीना ताई के देहांत से मिला था। तब से वह आत्मचिंतन में ज्यादा समय लगाने लगे थे। लेकिन सामना में उनके संपादकीय तथा प्रक्षेपास्त्रों के समान प्रहारक टिप्पणियां जारी रहीं, जिनसे न उनके सहयोगी दलों के नेता अछूते बचे और न ही अन्य।

कभी सावरकर ने प्रखर हिंदुत्व को बिना किसी लाग-लपेट और क्षमावादी समझौतापरस्त तेवर के साथ प्रस्तुत किया था। छत्रपति शिवाजी की सिंह गर्जना का अनुसरण करते हुए बाला साहब आग्रही हिंदुत्व की बात करने के लिए विख्यात रहे। उनकी वाणी और कलम की ताकत ने देश के बहुत बड़े वर्ग को प्रेरित किया, यह असंदिग्ध है। वह भरपूर जीवन जीकर सम्राट की तरह विदा हुए।

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