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कैसे होगा समावेशी विकास

संजय चक्रवर्ती, एस चंद्रशेखर और कार्तिकेय नारापराजू Updated Mon, 01 Jan 2018 06:19 PM IST
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समावेशी विकास, जिसे 'गरीब समर्थक' विकास भी कहा जाता है, भारत के विकास-विमर्श में एक महत्वपूर्ण विचार बन गया है। इसे व्यापक समर्थन मिला है, क्योंकि यह विकास के दो महत्वपूर्ण विचारों को जोड़ता है-एक आय में वृद्धि और दूसरा, प्रगतिशील वितरण। समावेशी विकास शब्द का पहली बार इस्तेमाल पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार द्वारा 2000 के दशक की शुरुआत में किया गया था। उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राजग सरकार ने भी इसे अपनाया। लेकिन क्या 'समावेशी विकास' 'सबका साथ सबका विकास' की तरह एक नारे से ज्यादा कुछ नहीं है?
वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के सरकार के लक्ष्य के आलोक में हमने नेशनल सैंपल सर्वे संगठन के वर्ष 2003 में किए गए किसानों की स्थिति और वर्ष 2013 में खेतिहर परिवारों की स्थिति के सर्वे का विश्लेषण कर 'सबका विकास' मुद्दे की जांच की। चूंकि कृषि देश में लगभग आधे श्रम बल को रोजगार देती है, लेकिन प्रति व्यक्ति सबसे कम उत्पादन करती है और इसलिए गरीबी के सबसे उच्चतम स्तर से जुड़ी हुई है, इससे यह साफ है कि अगर भारत में समावेशी विकास होगा, तो इसकी शुरुआत कृषि क्षेत्र से करनी होगी। अगर सर्वेक्षणों के बीच समग्र आय में वृद्धि होती, और आय वितरण के निचले पायदान (छोटे एवं सीमांत भूस्वामियों) के लोगों की आय बड़े भूस्वामियों की तुलना में तेजी से बढ़ती, तो यह निष्कर्ष निकालना संभव होता कि समावेशी विकास हुआ है।

हमने कृषि क्षेत्र में समावेशी विकास के सबूतों की तलाश की। वर्ष 2003 से 2013 के बीच हमें वास्तविक अर्थों में समग्र आय में 1.34 कारक की वृद्धि का सबूत मिला। हालांकि हमने यह भी देखा कि जिन किसानों को पास ज्यादा भूमि है, उनकी आय में तेज वृद्धि हुई, जबकि कम भूमि वाले किसानों की आय में वृद्धि सुस्त रही। जिन खेतिहर परिवारों के पास दस एकड़ से ज्यादा भूमि थी, उनकी आय दोगुनी हो गई। असल में न्यूनतम एक हेक्टेयर भूमि वाले खेतिहर परिवारों की आय में कम से कम 1.5 गुना की वृद्धि हुई। छोटे किसानों की आय में सबसे कम वृद्धि हुई, 0.4 हेक्टेयर से कम भूमि वाले सीमांत किसानों की आय में मुश्किल से 1.1 गुना की वृद्धि हुई। सामान्य रूप से छोटे भूस्वामियों की आयवृद्धि सुस्त रही। जहां तक भूस्वामित्व की बात है, तो समावेशी विकास के विपरीत-एक प्रतिगामी विकास की स्थिति देखने को मिली।

औसतन यह अंतर उच्च आय असमानता का संकेत था। हमने आय असमानता को मापने के लिए गिनी कॉफिशिएंट का उपयोग किया, जिसका मान शून्य और एक के बीच होता है, जिसमें शून्य का मतलब वास्तविक समानता है और उससे उच्च मान उच्चतर असमानता का द्योतक है। हमें वर्ष 2003 से 2013 के बीच करीब 0.6 गिनी कॉफिशिएंट मिला। यह अपेक्षाकृत कम है, क्योंकि जैसा कि सभी जानते हैं, सर्वेक्षण आय वितरण के शीर्ष पायदान पर खड़े लोगों तक पहुंचने में अक्षम होते हैं। इसे संदर्भ में रखते हुए अगर आय के इस स्तर को पूरे राष्ट्र के लिए लागू करें, तो यह असमानता के मामले में दुनिया के शीर्ष स्तरों में होगी। इसमें एक गंभीर चेतावनी है, जो कृषि क्षेत्र से परे जा रही है। हमारे निष्कर्ष संकीर्ण मगर उभरती आम सहमति को मजबूती देती है कि भारत में आय असमानता बहुत ज्यादा है।

बिहार तथा पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में आय में ठहराव और कई प्रमुख राज्यों में आय स्रोतों में विविधता की कमी समावेशी विकास और आय असमानता पर सीधे सवाल खड़ा करती है। वर्ष  2013 में खेती ने कुल आय का करीब आधा (49 फीसदी) प्रदान किया और आधी से ज्यादा आय कई महत्वपूर्ण राज्यों-पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र, असम, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और बिहार में केंद्रित रही। जबकि मजदूरी महत्वपूर्ण थी और जिसने 2013 में करीब 31 फीसदी आय प्रदान की। खेती से आय की तुलना में मजदूरी बहुत सुस्त गति से बढ़ रही थी। सबसे कम महत्वपूर्ण आय स्रोत गैर कृषि व्यवसाय (आठ फीसदी) था। ध्यान देने वाली बात है कि गैर-कृषि व्यवसाय तीन राज्यों-केरल, प. बंगाल और तमिलनाडु को छोड़कर कहीं भी आय में दस फीसदी से ज्यादा का योगदान नहीं कर रहा था। हमें जो पैटर्न मिला, वह हाल ही में नीति आयोग द्वारा दिए गए विमर्श पत्र से मेल नहीं खाता, जिसमें कहा गया है कि 'दो तिहाई ग्रामीण आय अब गैर-कृषि व्यवसायों से पैदा होती है।'

खेती से निम्न आय स्तर और निरंतर कृषि भूमि के विखंडन को देखते हुए समावेशी विकास की संभावना के प्रति हम कैसे आशावादी हो सकते हैं? वर्ष 2010-11 में औसत कृषि भूमि का आकार 1.15 हेक्टेयर था। पिछले चालीस वर्षों में, जबसे कृषि जनगणना शुरू हुई है, कृषि भूमि का औसत आकार घटकर आधा रह गया है और सीमांत किसानों की संख्या में तीन गुना वृद्धि हुई है। कृषि भूमि के निरंतर विखंडन का आय उत्पादन और कृषि क्षेत्र में आय असमानता, दोनों पर गंभीर असर पड़ा है। हमने पाया कि खेती से आय का निर्धारण करने में भूमि पर अधिकार प्रमुख कारक था, जो हमारी गणना में आय असमानता का आधा हिस्सा था, और इसलिए आय असमानता का महत्वपूर्ण तत्व था।

बड़े पैमाने पर अर्थव्यवस्थाओं को साकार करने, कर्ज तक पहुंचने या निर्वाह खेती के विरोध में बाजारोन्मुख खेती के दौर में छोटे किसानों की समस्याओं को देखते हुए इसकी बहुत संभावना है कि उत्पादकता में वृद्धि के लिए तैयार की जाने वाली अधिकांश नीतियां बड़े किसानों को लाभान्वित करती हैं। यह उत्पादकता की वृद्धि के खिलाफ तर्क नहीं है, बल्कि यह याद दिलाना है कि छोटे और सीमांत किसानों को ऐसी नीति से कम लाभ होगा, जिसका उद्देश्य भूमि के विखंडन के मुद्दे के निपटारे के बगैर वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करना है। अगर किसानों की आय को दोगुना करना संभव भी हो गया, तो यह निश्चित रूप से बड़े किसानों की आय वृद्धि पर आधारित होगा। भूमि के निरंतर विखंडन से निश्चित रूप से कृषि क्षेत्र में समावेशी विकास संभव नहीं होने वाला है।

-संजय चक्रवर्ती टेंपल यूनिवर्सिटी में भूगोल और शहरी अध्ययन के प्रोफेसर हैं, एस चंद्रशेखर मुंबई स्थित इंदिरा गांधी विकास अनुसंधान में प्रोफेसर हैं और कार्तिकेय नारापराजू इंदौर स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान में सहायक प्रोफेसर हैं।

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