यूबीआई कितना व्यावहारिक

ritika khedaरीतिका खेड़ा Updated Tue, 31 Jan 2017 07:30 PM IST
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रीतिका खेड़ा
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हाल में भारत में सार्वभौमिक बुनियादी आय (यूनिवर्सल बेसिक इनकम या यूबीआई), जिसमें सबको नकद राशि दी जाएगी, पर चर्चा होने लगी है। यह विचार क्यों लुभाता है? यूनिवर्सल का मतलब है अमीर-गरीब को छांटने का मुश्किल काम करने की कोई जरूरत नहीं और अगर यूबीआई नकद में दी जाए तो, पहले से परेशान सरकारी तंत्र के लिए प्रशासनिक कार्य भी कम हो जाता है।
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यूबीआई प्रस्तावित करने वाले इस बात पर जोर देते हैं कि सरकार को शिक्षा-स्वास्थ्य-सामाजिक सुरक्षा के इन्फ्रास्ट्रक्चर पर तो खर्च करना ही चाहिए, साथ ही 'बेसिक इनकम' भी देनी चाहिए। यूबीआई का मूल सिद्धांत है कि यह सार्वभौमिक हो। पर अब तक लिखे गए ज्यादातर लेखों में अभी से इसे ‘लक्षित’ करने के फॉर्मूले निकाले जा रहे हैं। दूसरा सिद्धांत यह भी है कि यूबीआई से सरकार के बाकी दायित्व खत्म नहीं हो जाते। हाल ही में सुरजीत भल्ला ने जो प्रस्ताव रखा है, वह इन दोनों नियमों का उल्लंघन करता है। उन्होंने सार्वभौमिक के बजाय पचास फीसदी आबादी को यूबीआई देने और बेसिक इनकम को पीडीसी (जन वितरण प्रणाली) और मनरेगा के बजाय लाने की बात की है।
यूबीआई के सिद्धांत से कई लोग सहमत हैं, पर कुछ मुश्किल सवाल (जैसे इसकी लागत) भी सामने आते हैं। कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यूबीआई से बेहतर होगा कि मनरेगा को ठीक से लागू करने पर जोर दिया जाए। मनरेगा ग्रामीणों के लिए सार्वभौमिक काम के अधिकार जैसा है, जिसमें अमीर-गरीब अपने आप छंट जाते हैं। जैसे ही किसी को ज्यादा मजदूरी वाला काम मिलता है, वह इस योजना से हट जाता है। यूबीआई के प्रस्ताव को हमेशा मनरेगा के साथ जोड़ा जाता है-सब अर्थशास्त्री जानते हैं कि यूबीआई किसी-न-किसी मौजूदा योजना की जगह पर ही लागू हो सकता है। कुछ अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि यूबीआई पर जीडीपी का दस फीसदी खर्च होगा। ये पैसा कहां से आएगा? अभी तक जो प्रस्ताव आए हैं, वे 20 साल पुराने आंकड़ों का सहारा ले रहे हैं, जब ‘नॉन–मेरिट’ सब्सिडी (ऐसी सब्सिडी जिससे सिर्फ व्यक्तिगत लाभ होता है, न कि सामाजिक लाभ) जीडीपी का दस प्रतिशत थी। वह जमाना कब का खत्म हो चुका है। दूसरा सुझाव है कि टैक्स रेवेन्यू फॉर्गान’ (उद्योगों को कर में दी जाने वाली छूट), जो 2016-17 में छह लाख करोड़ रुपये थी, को घटाया जाए। उद्योग इस छूट को क्यों छोड़ेंगे? 2012 और 2016 में सरकार को सोने से हटाए लाभों के प्रस्ताव को वापस लेना पड़ा था, जब सोना व्यापारियों ने लंबी हड़ताल की। और मान लें कि जीडीपी का 5-10 फीसदी उपलब्ध हो जाता है, तो इसे यूबीआई पर क्यों खर्च किया जाए? स्वास्थ्य पर क्यों न खर्च किया जाए, जहां भारत अपेक्षाकृत कम खर्च करता है।
इन व्यावहारिक समस्याओं के कारण यूबीआई को लेकर मेरे सुझाव हैं कि दो सरकारी योजनाओं को यूबीआई के रूप में देखा जाए–एक, वृद्ध, विधवा और विकलांग के लिए पेंशन, जिसके द्वारा लगभग 2.6 करोड़ लाभार्थियों को 200-1400 रुपये प्रति माह मिलते हैं। दूसरी, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत महिलाओं को प्रति बच्चा 6,000 रुपये का मातृत्व लाभ देने का प्रावधान। औपचारिक क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं को मातृत्व लाभ के रूप में चार-छह महीने सवैतनिक छुट्टी मिलती है, असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को खाद्य सुरक्षा कानून में इसके बजाय 6,000 रुपये पाने का हक प्राप्त हुआ, ताकि इससे वे बच्चे की देखरेख कर सकें और अपने लिए पौष्टिक आहार खरीद सकें। यह अब तक लागू नहीं हुआ है।

ये दोनों योजनाएं यूबीआई का ही एक प्रारूप हैं, बशर्ते केवल आबादी के उस हिस्से के लिए। इन दोनों को यूबीआई के शुरुआती दौर में लागू करने के पक्ष में कई दलीलें हैं। पहली, मातृत्व लाभ और पेंशन सार्वभौमिक होने के साथ-साथ लक्षित भी हैं : ये जनसंख्या के कमजोर वर्ग के हर व्यक्ति तक पहुंचते हैं। इसमें योग्य लोगों का आसानी से चयन किया जा सकता है (साठ साल से ऊपर, विधवा, विकलांग, गर्भवती महिलाएं)। दोनों सार्वभौमिक हैं, लेकिन कमजोर वर्गों के लिए ही हैं। दूसरा, इनसे शुरू करने से, यूबीआई प्रस्ताव अतिरिक्त बोझ नहीं लगता। वृद्ध और विधवा (जनसंख्या का 10 प्रतिशत) को प्रति माह यदि हजार रुपये पेंशन के रूप में दिए जाएं, तो इस पर डेढ़ लाख करोड़ रुपये खर्च होगा। खाद्य सुरक्षा कानून में प्रति बच्चे पर मातृत्व लाभ के रूप में 6,000 रुपये देने का प्रावधान है। सभी महिलाओं को मातृत्व लाभ देने पर 16,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे। दोनों मिलकर, कुल खर्च जीडीपी का डेढ़ फीसदी।

तीसरा, इन योजनाओं के परिणाम काफी उत्साहजनक हैं। पेंशन बैंक से दी जाती है, और इसमें भ्रष्टाचार कम है। मातृत्व लाभ, हालांकि केवल दो ही राज्यों में लागू है, उनका क्रियान्वयन ठीक-ठाक प्रतीत होता है। ओडिशा और तमिलनाडु अपने बजट से प्रति बच्चा पांच हजार और बारह हजार रुपये देते हैं। कई मुश्किलें रहती हैं, जैसे महंगाई की मार, जिससे यूबीआई में दी जाने वाली राशि की खरीद की क्षमता कम हो जाएगी। पेंशन अच्छा उदाहरण है–केंद्र सरकार ने 2006 से पेंशन राशि नहीं बढ़ाई है। चंडीगड़ में पिछले साल से, खाद्य सुरक्षा कानून के तहत पांच किलो/व्यक्ति/माह देने के बजाय 95 रुपये दिए जा रहे हैं (यानी19 रु./किलो)। इस दर पर पांच किलो आटा खरीदना पहले ही मुश्किल था, आज इससे चार किलो अन्न ही खरीदा जा सकता है।

पेंशन और मातृत्व लाभ का दायरा बढ़ाने से यह फायदा है कि किसी मौजूदा लाभ को बाधित नहीं किया जा रहा, जिससे लोगों को कष्ट कम होगा। हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि भारत में प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र गरीबों के प्रति कितना कठोर है। कुछ अर्थशास्त्री यूबीआई को मनरेगा या पीडीसी के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। नोटबंदी से जूझते लोगों के पैरों तले से मनरेगा या सस्ते अनाज का सहारा सरकार को नहीं खींचना चाहिए।
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