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मौद्रिक नीति की दिशा: महंगाई पर आरबीआई की सख्ती, विकास और कीमतों के बीच संतुलन की परीक्षा
Thu, 08 Oct 2026 07:46 AM IST
नितिन गौतम
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Thu, 08 Oct 2026 07:46 AM IST
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आरबीआई
- फोटो :
एआई ग्राफिक्स
विस्तार
ऐसे समय में, जब भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत विकास दर के बावजूद वैश्विक अस्थिरता, महंगे कच्चे तेल, कमजोर रुपये और महंगाई के बढ़ते जोखिमों से जूझ रही है, तब भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का रेपो दर में 25 आधार अंक की वृद्धि कर इसे 5.50 फीसदी करना केवल ब्याज दर में सामान्य बदलाव नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में मौद्रिक नीति की दिशा बदलने का स्पष्ट संकेत भी है। करीब साढ़े तीन वर्ष बाद हुई इस बढ़ोतरी के साथ ही केंद्रीय बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति का रुख तटस्थ से बदलकर कैलिब्रेटेड टाइटनिंग, यानी क्रमबद्ध सख्ती कर दिया है। इसका अर्थ ही है कि निकट भविष्य में दरों में कटौती की संभावना कम है।हालांकि, इसका यह मतलब भी नहीं कि लगातार दरें बढ़ाई जाएंगी, बल्कि अगला कदम आंकड़ों और परिस्थितियों के अनुसार ही तय होगा। उल्लेखनीय है कि रेपो दर वह ब्याज दर है, जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक धन उपलब्ध कराता है। केंद्रीय बैंक के दरों में बढ़ोतरी के फैसले के पीछे तर्क यही है कि बैंकों को महंगा कर्ज मिलेगा, तो बैंक लोगों को महंगा कर्ज देंगे। इससे लोग कर्ज लेने के लिए हतोत्साहित होंगे और कम खर्च करेंगे।
कम खर्च करने से मांग कम होगी और इससे महंगाई काबू में रहेगी। दिलचस्प बात यह है कि रिजर्व बैंक ने यह फैसला ऐसे समय में किया है, जब अर्थव्यवस्था की विकास क्षमता पर उसका भरोसा कायम है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए उसने सकल घरेलू उत्पाद, यानी जीडीपी वृद्धि का अनुमान 6.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है। फिर भी, जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
महंगी ब्याज दरों से मकान, वाहन तथा उपभोक्ता वस्तुओं की मांग पर भी असर पड़ सकता है। खासकर मध्यम वर्ग के लिए, जो पहले से महंगाई और बढ़ती जीवन-यापन लागत का सामना कर रहा है, ईएमआई में मामूली वृद्धि भी घरेलू बजट को प्रभावित कर सकती है। चुनौती बाहरी मोर्चे पर भी है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि महंगाई बढ़ाने के साथ चालू खाते के घाटे और रुपये पर भी दबाव डाल सकती है।
रुपये में कमजोरी आयात को महंगा करेगी, जिससे महंगाई पर दोहरा दबाव बन सकता है। ऐसे में, आरबीआई का रेपो दर बढ़ाने का फैसला केवल महंगाई का जवाब नहीं, बल्कि संभावित जोखिमों के प्रति सतर्कता का संकेत भी है। आरबीआई की मौद्रिक सख्ती का असर तभी टिकाऊ होगा, जब राजकोषीय और आपूर्ति संबंधी नीतियां भी उसके साथ तालमेल बिठाएं। फिलहाल, केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट कर दिया है कि विकास महत्वपूर्ण है, पर महंगाई को अनियंत्रित होने देने का जोखिम वह नहीं उठाना चाहता। अब उसकी परीक्षा इसी संतुलन को बनाए रखने में है।