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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   High Court's arguments on Bhojshala are not baseless; final decision will come from Supreme Court.

ऐतिहासिक विवाद पर अल्पविराम: भोजशाला पर हाईकोर्ट के तर्क निराधार नहीं, अंतिम फैसला तो सुप्रीम कोर्ट से ही आएगा

Sat, 23 May 2026 08:57 AM IST
Pavan विनय झैलावत, पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता
विनय झैलावत, पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता Published by: Pavan Updated Sat, 23 May 2026 08:57 AM IST
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सार
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भोजशाला के ऐतिहासिक स्थल के मामले में फैसला सुनाकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद को अल्पविराम दिया है। अंतिम फैसला तो सुप्रीम कोर्ट से ही आएगा, लेकिन उच्च न्यायालय ने जिन तर्कों पर फैसला सुनाया है, वे निराधार नहीं हैं।
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High Court's arguments on Bhojshala are not baseless; final decision will come from Supreme Court.
ऐतिहासिक विवाद पर अल्पविराम - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह ठहराया है कि भोजशाला का विवादित ऐतिहासिक स्थल देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर है। ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ और अन्य लोगों द्वारा दायर रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने इस स्थल पर हिंदू पूजा-अर्चना की निरंतरता को अंकित किया है। इसके साथ ही, बेंच ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा 2003 में पारित एक आदेश को उस हद तक रद्द किया, जिस हद तक उसने परिसर के भीतर हिंदुओं के पूजा करने के अधिकारों को प्रतिबंधित किया और मुस्लिम समुदाय को वहां नमाज पढ़ने की अनुमति दी थी।


उच्च न्यायालय ने यह तय किया कि यह विवाद पूरी तरह से पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 की धारा 4(3)(ए) में बताए गए अपवादों के दायरे में आता है। यह धारा साफ तौर पर कहती है कि यह अधिनियम किसी भी ऐसे पूजा स्थल पर लागू नहीं होता, जो कोई प्राचीन या ऐतिहासिक स्मारक हो, या कोई पुरातात्विक स्थल हो, और जो ‘प्राचीन स्मारक तथा पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958’ के तहत आता हो। चूंकि, भोजशाला परिसर 1904 से ही एक संरक्षित स्मारक है, इसीलिए न्यायालय पुरातात्विक सबूतों और वैज्ञानिक आंकड़ों का इस्तेमाल करके, इस अधिनियम की पाबंदियों का उल्लंघन किए बिना, कानूनी तौर पर इसके असली और मूल धार्मिक स्वरूप का पता लगा सकी। ज्ञानवापी मामले की ही तरह, न्यायालय ने भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किए गए बहु-विषयक और वैज्ञानिक अध्ययनों पर काफी हद तक भरोसा किया।


न्यायालय ने यह माना कि विवादित भोजशाला स्थल असल में एक मंदिर और शिक्षण केंद्र था, जिसे 1034 ईस्वी में बनाया गया था। मौजूदा ढांचा उस मंदिर को तोड़कर और उसके बचे हुए हिस्सों का इस्तेमाल करके बनाया गया। खंडपीठ ने हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच पूजा के अधिकार को लेकर चल रहे विवाद का निपटारा करते हुए कहा, ‘समय के साथ नियमों के तहत इस जगह पर हिंदू पूजा-अर्चना की निरंतरता कभी खत्म नहीं हुई।’ इसलिए, न्यायालय ने मुस्लिम समुदाय को इस जगह पर नमाज पढ़ने की दी गई अनुमति रद्द की और उन्हें मस्जिद बनाने के लिए किसी दूसरी जगह के आवंटन हेतु राज्य सरकार से संपर्क करने की अनुमति दी। न्यायालय ने इस नतीजे पर पहुंचने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किए गए सर्वे पर काफी भरोसा किया कि धार में मौजूद ढांचा, असल में परमार काल से जुड़े एक पहले से मौजूद मंदिर के ढांचे पर बनाया गया था। न्यायालय ने पाया कि यह सर्वे पूरी तरह से निष्पक्ष और वैज्ञानिक तरीके से किया गया था।

खंडपीठ ने जिन मुख्य सबूतों पर भरोसा किया, उनमें से एक पूर्वी खंभों वाली गैलरी में लगे शिलालेखों से जुड़ा था। यह भी देखा गया कि संस्कृत और प्राकृत भाषा के सभी शिलालेख अरबी और फारसी भाषा के शिलालेखों से पहले के थे, जिससे यह पता चलता है कि इस जगह पर पहले संस्कृत और प्राकृत बोलने वाले लोगों का कब्जा था और वे ही इसका इस्तेमाल करते थे। इसके अलावा, उस जगह पर मिले सबसे पुराने सिक्के इंडो-सासानियन काल के हैं, जिन्हें 10वीं-11वीं सदी का माना जा सकता है। यह वह समय था, जब परमार राजा मालवा पर राज करते थे और उनकी राजधानी धार थी।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने बताया कि सबूतों से यह साबित होता है कि भोजशाला, देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर होने के साथ-साथ राजा भोज द्वारा स्थापित एक संस्कृत शिक्षा केंद्र भी था। इसमें कई ऐतिहासिक प्रकाशनों का जिक्र किया गया। इनमें इंपीरियल गैजेटियर ऑफ इंडिया 1908 भी शामिल है। इसमें इस इमारत को राजा भोज का स्कूल बताया गया था। इसे बाद में एक मस्जिद में बदल दिया गया। रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के 1904 के एक और प्रकाशन में इस जगह को ‘राजा भोज का मदरसा’ कहा गया। इसमें कहा गया है कि कमल-उल-दीन की मजार से लगी हुई यह मस्जिद, हिंदू आबादी के बीच ‘राजा भोज का मदरसा’, यानी ‘राजा भोज का स्कूल’ के नाम से जानी जाती है। खंडपीठ ने जी यजदानी की 1929 की किताब मांडूरू द सिटी ऑफ जॉय का भी जिक्र किया। इसमें इस इमारत को एक ऐसी मस्जिद बताया गया, जिसे पहले से मौजूद एक हिंदू मंदिर के बचे हुए हिस्सों से बनाया गया। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 1972-73 की पुरातत्व समीक्षा का भी हवाला दिया। इसमें भोजशाला के आसपास हुई खोदाई का जिक्र है, जिसमें मंदिर की वास्तुकला के टुकड़े, परमार काल के मिट्टी के बर्तन, लोहे की चीजें और भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति मिली थी।

न्यायालय ने कहा कि वक्फ संपत्ति पर मस्जिद बनाई जा सकती है। लेकिन, न्यायालय के अनुसार, ऐसा कोई भी सबूत नहीं है, जिससे यह पता चले कि जमीन के जिस हिस्से का नंबर 604 (पुराना नंबर 313) है, वह वक्फ की संपत्ति है और उसे वक्फ के लिए समर्पित किया गया या किया जा सकता था। उच्च न्यायालय द्वारा 1935 के ‘ऐलान’ की भी जांच की, जिसे धार रियासत ने जारी किया था और जिसमें कहा गया था कि यह जगह एक मस्जिद है। न्यायालय ने पाया कि यह ऐलान संविधान बनने से पहले का एक प्रशासनिक आदेश था।

संविधान के अनुच्छेद 13 और 130 का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 13 उन कानूनों को अमान्य ठहराता है, जो मौलिक अधिकारों के विपरीत हैं। यह कानून को परिभाषित करता है (सिवाय अनुच्छेद 13 के अपने उद्देश्यों के लिए)। अनुच्छेद 130 संदर्भ-आधारित है और यह संविधान बनने से पहले जारी किए गए हर प्रशासनिक आदेश या अधिसूचना को अपने-आप वैध नहीं बना सकता। रियासत के शासक द्वारा जारी किया गया कोई भी आदेश तभी तक कानून माना जाएगा, जब वह संविधान में तय की गई कसौटी पर खरा उतरेगा। इस तरह, खंडपीठ ने पाया कि यह आदेश शिलालेखों, धर्मग्रंथों और लगातार चली आ रही सरकारी मान्यता के विपरीत था।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले ने भले ही तात्कालिक रूप से विवाद को अल्पविराम दे दिया हो, लेकिन अंतिम लड़ाई सर्वोच्च न्यायालय में ही लड़ी जाएगी। पर्दे के पीछे राजनैतिक खेल और मोल-तोल तो प्रारंभ हो ही चुका है और लंबे समय तक यह निरंतर चलता रहेगा। - edit@amarujala.com
 
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