आर्थिकी: छोटे कारोबारियों की समझ से परे हैं जीएसटी के नियम, विसंगतियों ने पैदा की जटिलता
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विस्तार
भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद सबसे बड़े आर्थिक सुधार के तहत वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की परिकल्पना की गई। इसे टैक्स वसूली तथा कारोबारियों को राहत देने की दिशा में एक गेम चेंजर माना गया। लेकिन इसकी शुरुआत से लेकर अब तक कई तरह की समस्याएं आती रही हैं। कारोबारियों को बताया गया कि उनके लिए टैक्स भरना पहले से भी आसान होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जीएसटी को सुचारु ढंग से लागू करने के लिए एक जीएसटी काउंसिल बनाई गई थी, जिसमें सभी राज्यों के प्रतिनिधि थे। अब भी जीएसटी काउंसिल ही इसका काम देखती है। यह भारत सरकार के वित्त विभाग के अंतर्गत नहीं है। केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण इसकी अध्यक्षता भर करती हैं। उन्हें अपने बूते कोई फैसला करने का अधिकार नहीं है। वहां जो भी फैसले होते हैं, वे बहुमत से होते हैं।
इसी कारण कई बार कुछ बड़े फैसले अटक जाते हैं। जनता की तरह वित्तमंत्री की भी इच्छा रही है कि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाया जाए, ताकि पूरे देश में इसका मूल्य एक समान हो, पर बहुत से सदस्य इसका विरोध करते हैं। वे अपने राज्य के हित में ऐसा नहीं होने देते। जब भी किसी राज्य को अपना राजस्व बढ़ाना होता है, वह तुरंत ही पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा देता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कर्नाटक, जहां इनकी कीमतें सबसे ज्यादा हैं। अगर यह जीएसटी के दायरे में होता, तो ऐसा संभव नहीं था।
कारोबारी और व्यापारी भी अब तक जीएसटी भुगतान में सहज नहीं हो पाए हैं। जीएसटी में कई विसंगतियां हैं। मसलन, दो तरह के सामान, जो मिलकर एक उत्पाद बनते हैं, उन पर अलग-अलग टैक्स दरें हैं। यह कारोबारियों के लिए एक परेशानी है। अगर हम भारत के पॉपुलर स्नैक बन मस्का को देखें, तो पाएंगे कि बन पर टैक्स की दर अलग है और मस्का यानी मक्खन पर अलग। अब व्यापारी किस दर से टैक्स लेगा? रेस्तरां में रोटी पर कम टैक्स है, तो पराठे पर ज्यादा। बिना एसी वाले रेस्तरां के लिए अलग दर है, तो एसी वाले के लिए अलग। खुले सामान पर कोई टैक्स नहीं है, लेकिन पैकेट में आते ही उस पर टैक्स लगेगा। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जो जीएसटी की विसंगतियां बताते हैं। इसके अलावा कई सेवाओं पर 18 फीसदी का भारी-भरकम टैक्स भी है। एक ओर सरकार जनस्वास्थ्य को लेकर चिंता जताती है, तो दूसरी ओर जीएसटी काउंसिल ने हेल्थ इंश्योरेंस पर 18 फीसदी जीएसटी लगाई है। कारोबारियों की मांग है कि टैक्स दरों में विसंगति न हो और उन्हें तार्किक बनाया जाए।
इस समय टैक्स के चार स्लैब हैं-5,12,18 और 28 फीसदी। इन्हें घटाकर तीन स्लैब करना चाहिए। इन दरों को तर्कसंगत बनाने से वैधानिक मामले कम हो जाएंगे। साथ ही, जीएसटी की रिटर्न प्रणाली और इनपुट टैक्स क्रेडिट नीति में भी बदलाव की जरूरत है। जीएसटी लागू हुए आठ वर्ष हो गए, लेकिन इसके नियमों में हर महीने बदलाव होते रहते हैं, जिससे व्यापारियों में भ्रम पैदा होता है। दूसरी तरफ, सरकार की शिकायत है कि अब भी जीएसटी की बड़े पैमाने पर चोरी हो रही है। कई राज्यों में भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से चोरी हो रही है। वर्ष 2022-23 में देश में दो लाख करोड़ रुपये की टैक्स चोरी पकड़ी गई। पिछले पांच वर्षों में केंद्रीय जीएसटी अधिकारियों ने टैक्स चोरी के 86,717 मामलों का पता लगाया, जिससे 6.79 लाख करोड़ रुपये की हेराफेरी का पता लगा।
जीएसटी नियम निर्माण से लंबे समय जुड़े रहे सुमित दत्त मजूमदार कहते हैं कि जीएसटी के नियमों को इतना सरल कर दिया जाना चाहिए कि छोटे से छोटे कारोबारी को भी यह आसानी से समझ में आ जाए। टैक्सेशन सिर्फ राजस्व उगाही का माध्यम नहीं होना चाहिए, यह जनता के हित में भी होना चाहिए।
कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के संस्थापक और महासचिव प्रवीण खंडेलवाल, जो अब सांसद हैं, कहते हैं कि जीएसटी को बेहतर बनाने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। बिहार के वित्तमंत्री सम्राट चौधरी अभी इसकी कमान संभाल रहे हैं। उन्होंने वित्त मंत्रियों के समूह में इस पर काफी चर्चा की है। इसे और सरल बनाने, स्लैब कम करने एवं व्यापारियों की समस्याओं को सुलझाने के लिए बातचीत हुई है। अगले महीने जीएसटी कांउसिल की बैठक में इन पर विचार होगा। कुछ चीजों और सेवाओं पर जीएसटी की दर घटाने की भी बात चल रही है।
बताया जाता है कि प्रधानमंत्री ने भी इसमें दिलचस्पी दिखाई है, इसलिए उम्मीद है कि जीएसटी काउंसिल इसमें आमूल-चूल बदलाव करेगी। टैक्स के स्लैब घटाए जाएंगे, सरलीकरण की प्रक्रिया पर जोर दिया जाएगा और कुछ सेवाओं एवं वस्तुओं पर टैक्स घटाए जाने की भी उम्मीद है। बस संसद के मानसून सत्र के बाद काउंसिल की बैठक का इंतजार है।