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उत्तरकाल: बढ़ती उम्र और ‘आयुष्मान’ का सहारा, सरकार को साधुवाद

Mon, 16 Sep 2024 06:26 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Mon, 16 Sep 2024 06:26 AM IST
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सार
उम्र बढ़ने पर लोगों की चिंता का प्रमुख कारण स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाला खर्च होता है। केंद्र सरकार ने 70 वर्ष से अधिक उम्र के सभी आय वर्गों के बुजुर्गों को आयुष्मान भारत योजना में शामिल कर बड़ी राहत दी है।
 
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Govt give great relief to elderly of all age groups above 70 years by including them in Ayushman Bharat Scheme
आयुष्मान योजना का लाभ। - फोटो : Istock

विस्तार

जैसे-जैसे बुजुर्ग लोगों की उम्र बढ़ती जाती है, खासकर वैसे बुजुर्गों की, जिनके पास न कोई पैतृक संपत्ति होती है, न पेंशन और न घर के किराये से होने वाली आमदनी, भविष्य में चिकित्सा खर्च की बढ़ती लागत उनकी सबसे बड़ी चिंताओं में से एक होती है। मेरे जैसे मध्यमवर्गीय परिवार के एक व्यक्ति को, जिसके पास थोड़ी बचत होती है और सिर पर एक छत होती है, थोड़ी सुविधा रहती है। लेकिन जहां तक स्वास्थ्य देखभाल की बात है, तो सभी जानते हैं कि बीमा कंपनियां भी इलाज के सारे खर्चों को वहन नहीं करती हैं।



ऐसे में, यह अच्छी बात है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 70 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र के बुजुर्गों के लिए आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबीपीएम-जेएवाई) के तहत स्वास्थ्य देखभाल बीमा को मंजूरी दी है, चाहे वे किसी भी आय वर्ग के हों। ऐसे कई परिवार हैं, जो पहले से ही आयुष्मान योजना में शामिल हैं और उनमें वरिष्ठ नागरिक भी हैं। अब वैसे परिवारों को पांच लाख रुपये का अतिरिक्त बीमा कवरेज मिलेगा। हालांकि इसका अंतिम प्रारूप अभी आना बाकी है, तभी पता चलेगा कि इसे विभिन्न राज्यों द्वारा जमीनी स्तर पर कैसे लागू किया जाता है। लेकिन यह भी देखना होगा कि स्वास्थ्य देखभाल पर जेब से किए जाने वाले खर्च के मामले में हम कहां खड़े हैं। आर्थिक सर्वेक्षण, 2023-24 में बताया गया है कि स्वास्थ्य देखभाल पर भारत में जेब से किया जाने वाला खर्च अब भी कुल स्वास्थ्य व्यय का लगभग 50 प्रतिशत है। हालांकि पिछले दस वर्षों में स्थिति में सुधार हुआ है। वर्ष 2019-20 में स्वास्थ्य देखभाल पर जेब से खर्च 47 प्रतिशत से अधिक था, जो निश्चित रूप से 2013-14 के 64 प्रतिशत के उच्च स्तर से कम है, लेकिन यह अब भी तीन साल पहले आर्थिक सर्वेक्षण में सुझाए गए 35 फीसदी की सीमा से बहुत ज्यादा है।


ध्यान रहे कि ज्यादातर भारतीय असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जिसका मतलब है कि उनके पास कोई निश्चित वेतन वाली कमाई नहीं है, जिसमें अन्य लाभ भी होते हैं और सेवानिवृत्ति के बाद उनके लिए सामाजिक सुरक्षा का भी कोई प्रावधान नहीं होता है। भारत की पारंपरिक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली-संयुक्त परिवार तेजी से बिखर रहे हैं। बच्चे अक्सर दूसरे शहरों या देशों में रहते हैं। ऐसे में, उनसे यह उम्मीद करना कि वे स्वास्थ्य देखभाल का पूरा खर्च उठाएंगे, नासमझी होगी।

तो फिर उपाय क्या है? इस मामले में हम एशिया के कुछ अन्य देशों से सीख सकते हैं। जैसे, पड़ोसी देश थाईलैंड उच्च मध्यम आय वाला देश है। राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद स्वास्थ्य देखभाल के मामले में इसका रिकॉर्ड बेहतर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक, थाईलैंड में वर्ष 2021 में स्वास्थ्य पर नौ फीसदी खर्च जेब से हुआ था, जबकि भारत में यह आंकड़ा 49.82 प्रतिशत था। यह देखते हुए कि वर्ष 2007 में भारत में स्वास्थ्य देखभाल पर जेब से किया जाने वाला खर्च कुल स्वास्थ्य व्यय का 70 प्रतिशत से अधिक था, हम कह सकते हैं कि भारत की स्थिति में पहले से सुधार हुआ है, लेकिन हमें अब भी एक लंबा रास्ता तय करना है।

थाईलैंड में बूढ़ी होती आबादी के साथ अन्य चुनौतियां भी हैं, लेकिन वहां सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल (यूएचसी) महज एक वादा नहीं, बल्कि हकीकत है। यूएचसी का लक्ष्य प्रत्येक व्यक्ति को बिना वित्तीय समस्या के गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करना है। वर्ष 2002 में ही वहां यूएचसी लागू किया गया और थाईलैंड स्वास्थ्य देखभाल पर अपनी जीडीपी का पांच फीसदी खर्च करता है, जिसका 70 फीसदी हिस्सा सरकार देती है। कई अन्य उच्च मध्य आय वाले देशों की तुलना में स्वास्थ्य पर कम खर्च करने के बावजूद थाईलैंड काफी कुछ करने में सफल रहा है। वर्ष 2000 से 2021 के बीच वहां जीवन प्रत्याशा 72.3 वर्ष से बढ़कर 78.7 वर्ष हो गई। नवजात मृत्युदर 1.67 फीसदी से घटकर मात्र 0.62 फीसदी रह गई है और स्वास्थ्य देखभाल पर जेब से खर्च 34.2 फीसदी से घटकर नौ फीसदी रह गया है।

थाईलैंड में तीन मुख्य सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा योजनाएं हैं, जो लगभग वहां की पूरी आबादी के लिए हैं। इनमें शामिल हैं, लोक सेवक स्वास्थ्य लाभ योजना (सीएसएमबीएस), जिसमें सरकारी कर्मचारी और उनके रिश्तेदार आते हैं और इसका प्रबंधन वित्त मंत्रालय करता है। सामाजिक सुरक्षा योजना (एसएसएस), जिसमें संगठित क्षेत्रों के निजी कर्मचारियों को कवर किया जाता है, जिसका खर्च कर्मचारी, नियोक्ता और सरकार, तीनों उठाते हैं और इसका प्रबंधन श्रम मंत्रालय करता है और यूनिवर्सल कवरेज योजना (यूसीएस) के तहत शेष बची ज्यादातर आबादी को कवर किया गया है, जिसका खर्च सामान्य कराधान से पूरा किया जाता है और राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा कार्यालय (एनएचएसओ) इसका प्रबंधन करता है। लोक स्वास्थ्य मंत्रालय इसकी देखभाल करता है, जबकि एनएचएसओ यूसीएस के लिए देखभाल क्रेता के रूप में कार्य करता है, तथा देखभाल प्रदान करने में क्रय शक्ति और दक्षता सुनिश्चित करता है।

यूसीएस को गोल्ड कार्ड भी कहा जाता है, जो थाईलैंड की तीनों योजनाओं में सबसे बड़ी है और सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करती है। यूसीएस ज्यादातर आबादी को कवर करती है और इसकी फंडिंग सीधे राष्ट्रीय बजट से होती है तथा एनएचएसओ द्वारा प्रति व्यक्ति आधार पर बजट आवंटित किया जाता है। यह कार्यक्रम वर्ष 2002 में शुरू हुआ था। अब वर्ष 2024 में थाईलैंड की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रही है, जिसमें यूनिवर्सल कवरेज योजना के तहत ‘सभी बीमारियों का इलाज किसी भी जगह’ कराने जैसे प्रयास शामिल हैं।

थाईलैंड की स्वास्थ्य देखभाल सहित कोई भी स्वास्थ्य व्यवस्था पूर्ण नहीं है और न ही किसी स्वास्थ्य व्यवस्था की हूबहू नकल किसी दूसरे देश में की जा सकती है, खासकर भारत जैसे विशाल और विविधता पूर्ण देश में, लेकिन हम अपने एशियाई पड़ोसियों से काफी कुछ सीख सकते हैं। विशेषकर उन देशों से, जिनका अपना स्वास्थ्य तंत्र काफी मजबूत है।

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