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आधी आबादी: अब तक संकोच के दायरे में, सोच बदलने के लिए समाज और सरकार की पहल जरूरी

Wed, 24 Jan 2024 07:37 AM IST
Amit Rajput अमित राजपूत
Updated Wed, 24 Jan 2024 07:37 AM IST
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सार
माहवारी के विषय पर आज भी समाज में चर्चा से बचने की प्रवृत्ति दिखती है, जिसे बदलने के लिए सरकार व समाज, दोनों को पहल करनी होगी।
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Govt and society need to take initiative on tendency to avoid discussion on menstruation topic
सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

हम 21वीं सदी में भले पहुंच चुके हों, पर महिलाओं की कुछ समस्याएं समाज की दकियानूसी के चलते आज भी बनी हुई हैं। इनमें से एक है, रजोनिवृत्ति से जुड़ी समस्या। मेरी बचपन की दोस्त सुनीता (काल्पनिक नाम) की शादी  कुछ वर्षों पहले एक टियर-2 शहर में हुई थी। हाल ही में उसने मुझे बताया कि वह अपने दकियानूस ससुराल वालों के कारण काफी बीमार हो गई थी, जिससे अब तक उबर नहीं पाई है। मानना मुश्किल है, लेकिन उसके पति समेत ससुराल के लोग मासिक धर्म से जुड़ी स्वच्छता को लेकर उसे सहयोग नहीं करते थे। वह बताती है कि महीने में एकाध सेनेटरी पैड उपलब्ध कराने को छोड़कर उसका पति कभी उसकी मदद नहीं करता था, जिसके चलते उसे लंबे समय तक संक्रमण से जूझना पड़ा था।



यह कहानी सिर्फ सुनीता की नहीं, देश की तमाम महिलाओं की है, जो समाज की पुरानी सोच और अपने संकोच के चलते कष्ट झेलती रहती हैं। जल आपूर्ति एवं स्वच्छता सहयोग परिषद द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट की मानें, तो एक महिला को चालीस वर्ष में लगभग हर महीने अधिकतम पांच से छह दिनों तक मासिक-धर्म होता है, जो करीब 3,000 दिनों या करीब आठ वर्षों के बराबर है। हालांकि दुनिया की आधी आबादी पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है और मानव जीवन-चक्र में इसकी निर्णायक भूमिका है। इसके बावजूद  माहवारी अब भी एक ऐसा विषय है, जिसकी चर्चा करना भी लोग पसंद नहीं करते। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में इस संदर्भ में देश में बेहतर प्रयास हुए हैं। पहली बार केंद्र सरकार ने मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (एमएचएम) के विषय को नीतिगत मुद्दा बनाया है।


प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 2020 में लाल किले से अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में मासिक धर्म से जुड़े स्वच्छता प्रबंधन के बारे में बात की। संयुक्त राष्ट्र द्वारा भी पानी और स्वच्छता तक पहुंच को मानवाधिकारों के रूप में मान्यता दी गई है। हाल ही में, सुलभ स्वच्छता मिशन फाउंडेशन द्वारा मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन पर एक व्यापक शोध रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें देश के दूर-दराज के इलाकों में विभिन्न समुदायों वाले 22 ब्लॉकों और 84 गांवों की 4,839 महिलाओं और बालिकाओं के नमूने शामिल किए गए।

इस रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि स्कूल के शौचालयों में पानी, साबुन, स्वच्छता की कमी और दरवाजे नहीं होने की वजह से बालिकाएं मासिक धर्म के दौरान इनका उपयोग करने में झिझकती हैं। इसी कारण मासिक धर्म के चक्र से गुजरने वाली बालिकाएं एक वर्ष में करीब 60 दिन स्कूलों से अनुपस्थित रहती हैं।

यही हाल निजी-सरकारी क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं का भी है। सामुदायिक मान्यताओं और वर्जनाओं को दर्शाते इस अध्ययन में देश के सात राज्यों- असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र, ओडिशा और तमिलनाडु के 14 जिलों को शामिल किया गया था।
इसमें संदेह नहीं है कि मासिक धर्म के दौरान रक्त-प्रवाह को अवशोषित करने के लिए स्वच्छता उत्पादों तक बालिकाओं की पहुंच न होना एक मौलिक समस्या है, जिसे सरकारों और समाज को आसान बनाना है। सरकारें और स्वयंसेवी संस्थाएं इस ओर ध्यान दें और हर घर सेनेटरी पैड उपलब्ध कराने की महती योजना बनाएं। समाज को भी इसमें भागीदार बनना पड़ेगा। इसका सबसे सरल रास्ता है कि वह अपने घर की बेटियों और महिलाओं से इस बारे में खुलकर बातें करने का माहौल तैयार करें।

बेहतर होगा यदि स्थानीय निकायों द्वारा हर मोहल्ले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की तर्ज पर उनके सभासदों या पार्षदों की देखरेख में हर जरूरतमंद महिला तक सेनेटरी नैपकिन की उपलब्धता को निःशुल्क मुहैया कराना सुनिश्चित किया जाए। तब निश्चित रूप से यह प्रयास दुनिया को मार्ग दिखाने वाला होगा और महिलाओं की माहवारी के स्वच्छता-संबंधी प्रयासों में मौलिक और प्रभावकारी सिद्ध हो सकेगा। हमें समझना होगा कि बालिकाओं और महिलाओं में माहवारी के दौरान स्वच्छता का विषय केवल शारीरिक स्वच्छता तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके आराम, गर्व, सम्मान, आत्मविश्वास और इससे संबंधित मांग को भी पैदा करने की बात करता है, ताकि महिलाएं और बालिकाएं बिना किसी शर्म और डर के समाज में गर्व के साथ जी सकें।

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