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हालात : हमारे समाज का हिस्सा हैं गिग वर्कर्स, उनके हितों पर ध्यान दें स्टार्टअप

mukul shrivastava मुकुल श्रीवास्तव
Updated Sat, 22 Feb 2025 12:15 AM IST
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सार
गिग कर्मचारियों के हित में सरकार ने कुछ प्रावधान किए हैं। पर जरूरी यह भी है कि स्टार्टअप अपने विस्तार के साथ उन कर्मचारियों के हितों का भी ख्याल रखें, जो उनके लिए मशक्कत करते हैं।
 
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Gig workers are a part of our society, startups should pay attention to their interests
(प्रतीकात्मक) - फोटो : एएनआई

विस्तार

उभरते हुए स्टार्टअप कल्चर के साथ ही देश में एक नए प्रकार की कामकाजी संस्कृति का चलन तेजी से बढ़ रहा है, जिसे गिग इकनॉमी कहा जाता है। गिग इकनॉमी का मतलब ऐसी बाजार प्रणाली से है, जिसमें लोग किसी कंपनी में स्थायी कर्मचारी बनने के बजाय अस्थायी, फ्रीलांस, या कांट्रैक्ट-बेस पर काम करते हैं। उदाहरण के लिए, अर्बन कंपनी, उबर-ओला, और जोमैटो जैसी कंपनियां कुछ समय के लिए स्वतंत्र कामगारों के साथ कांट्रैक्ट करती हैं और उनके द्वारा किए गए काम के घंटे या प्रत्येक कार्य के लिए एक निश्चित राशि का भुगतान करती हैं।



गिग इकनॉमी आर्थिक अवसरों का एक नया मॉडल पेश कर रही है, जो पारंपरिक नौकरियों की तुलना में अधिक लचीलापन और स्वतंत्रता प्रदान करता है। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, देश की गिग वर्कफोर्स में आईटी सर्विसेज, डिलीवरी, कैब सर्विसेज और अन्य पार्ट टाइम जैसी नौकरियों में साल 2020-21 में करीब 77 लाख श्रमिक कार्यरत थे, जिनकी संख्या साल 2029-30 तक बढ़कर करीब ढाई करोड़ पहुंचने की उम्मीद है। गिग इकनॉमी कोई नई अवधारणा नहीं है, बल्कि यह हमेशा से हमारे समाज का हिस्सा रही है। फर्क बस इतना है कि अब इसका तरीका डिजिटल हो चुका है। जैसे ऑटो और कैब चालक, जो सड़क पर सवारी का इंतजार करते थे, अब वे ओला और उबर जैसे प्लेटफॉर्म्स पर ऑन डिमांड उपलब्ध होते हैं। स्टार्टअप कंपनियां तकनीक की मदद से भारत के असंगठित रोजगार को ऐप्स के जरिये बड़े पैमाने पर संगठित कर रही हैं।


फोरम फॉर प्रोग्रेसिव गिग वर्कर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय अर्थव्यवस्था में गिग इकनॉमी ने साल 2024 में 455 अरब डॉलर का योगदान दिया था और साल-दर-साल यह इंडस्ट्री 17 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। गिग इकनॉमी ने उन लोगों के लिए भी नौकरी के कई अवसर खोले हैं, जिन्हें पारंपरिक नौकरियों में दिक्कत आती थी, जैसे दिव्यांग, छात्र और गृहिणियां, जो अब घर बैठे भी फ्रीलांसिंग कर सकते हैं। संस्था पैगाम और यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया द्वारा भारत में ऐप बेस्ड वर्कर्स पर किए गए एक शोध में सामने आया है कि भारत में गिग श्रमिक दिन में 8 से 12 घंटे और कभी-कभी उससे भी अधिक घंटे प्रतिदिन काम करते हैं।

हाल ही में संसद में पेश बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को पहचान पत्र, ई-श्रम पोर्टल पर उनका पंजीकरण और पीएम जन आरोग्य योजना के तहत पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवरेज मुहैया कराने का एलान किया है। सरकार के इस फैसले से करीब एक करोड़ गिग वर्कर्स को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से फायदा पहुंचेगा। हालांकि समस्या यह भी है कि अगर सरकार न्यूनतम वेतन, काम के घंटे सीमित करना जैसे कड़े रेगुलेशन ले आए, तो इससे इस सेक्टर को नुकसान हो सकता है। ऐसा करने से कंपनियां अपनी हायरिंग कम कर सकती हैं, साथ ही नियमों के बोझ के चलते अनावश्यक लालफीताशाही या इंस्पेक्टर राज को बढ़ावा मिल सकता है। दूसरी ओर, अनियोजित श्रम में आपूर्ति मांग से हमेशा अधिक होने की संभावना रहती है। ऐसे में, इस विषय पर सरकार और स्टार्टअप कंपनियों को गहन चिंतन की जरूरत है कि वे क्या कदम उठा सकती हैं, जिससे एक बेहतर संतुलन बनाया जा सके। संस्थापकों और निवेशकों को भी केवल अपने स्टार्टअप्स का विस्तार करने के बजाय उन्हें बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए।

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