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समाज: गांधी विचार पर विवाद के बजाय नए सिरे से हो विचार, सर्व सेवा और स्वयं सेवा का अंतर समझना जरूरी

Sat, 08 Jul 2023 07:44 AM IST
Sandeep Joshi संदीप जोशी
Updated Sat, 08 Jul 2023 07:44 AM IST
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सार
सर्व सेवा और स्वयं सेवा का अंतर समझे बिना गांधी विचार को समझा नहीं जा सकता। सेवा भाव रहेगा, तभी सरकारें या संस्थाएं चलती रह सकती हैं।
 
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Gandhi thought controversy new thought needed public service and self service Sarva Seva Sangh
महात्मा गांधी - फोटो : facebook

विस्तार

महात्मा गांधी ने दो बातें साफ तौर पर जीते-जी ही कह दी थीं। एक तो 'मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। इसलिए जो कुछ भी मैंने लिखा या बोला, उसे छोड़ दें। जो मैंने किया, उसे ही ध्यान में रखें।' दूसरा, 'यदि किसी विषय पर मेरे पहले और बाद के वक्तव्यों में अंतर दिखे, तो आखिर में दिए गए को ही मेरा वक्तव्य मानें।' इन दो बातों से हम समझ सकते हैं कि गांधी दूरदर्शिता में कितने प्रगतिशील थे। थोपी गई या उधार ली गई सभ्यता को गांधी जी किसी भी देश के लिए अपनाए जाने लायक नहीं मानते थे। समाज अपनी सभ्यता, अपनी समझ, अपने विवेक और अपने व्यवहार से गढ़ा जाता है। गांधीजन क्या गांधी विचार के इस आधुनिक मॉड्यूल को समझकर आज अपना विकास कर सकते हैं?



पिछले दिनों गांधी नाम को लेकर दो विवाद सामने आए। दोनों विवादों में गांधी विचार नदारद ही रहे। सर्व सेवा संघ के बनारस परिसर में वर्षों से बंद पड़े गांधी विद्या संस्थान की जमीन हड़पने का आरोप इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र पर लगा। सर्व सेवा संघ के कर्मचारी इस संस्थान की भूमि अधिग्रहण के मसले को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। सर्व सेवा संघ को गांधी जी के जाने के बाद विनोबा जी ने बनाया था। गांधी जी चाहते भी थे कि स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस पार्टी सर्व सेवा संघ का रूप ले। और, गांधी विद्या संस्थान जयप्रकाश नारायण द्वारा बनाई गई संस्था है। रेलवे और सर्व सेवा संघ के बीच वर्षों से बेवजह भूमि विवाद चला आ रहा है। समय के साथ जो नहीं बदलता है, समय उसको बेदखल कर देता है। इन सबके बीच खबर आई कि गीता प्रेस, गोरखपुर को केंद्र सरकार ने गांधी शांति पुरस्कार दे दिया। सरकार के विरोध की बेवजह कोशिश हुई। गीता प्रेस ने एक करोड़ की पुरस्कार राशि ठुकरा दी।


गांधी नाम में ऐसा क्या है? प्रधानमंत्री अपनी हर विदेश यात्रा पर पूरी दुनिया के सामने महात्मा गांधी की प्रतिमा पर फूल चढ़ाते, नमन करते देखे जा सकते हैं। लेकिन जब उनके किए या न किए का विरोध जताने वाले देशवासी गांधी प्रतिमा के सामने आंदोलन करते हैं, तब सरकार के पास सवाल के जवाब नहीं होते। आज गांधी विचार को लेकर केंद्र सरकार की मंशा जगजाहिर है, लेकिन गांधी विचार हर कीमत पर राज करने से परे है।

कुदाल आयोग (1982) की स्मृति सबको है, जब इंदिरा गांधी के सत्ता में लौटने के बाद गांधी संस्थाओं में कोष के दुरुपयोग पर जांच बैठाई गई थी। गांधी के जाने के बाद उनके नाम पर ली, दी या ग्रहण की गई भूमि या जमीन पर गांधी अपना कोई दावा नहीं करते, न ही ऐसी जमीन से गांधी का कोई वास्ता रहा। गांधी विचार का वास्ता तो समरस भावना के सर्वहारा समाज और उससे जुड़ी सर्व सेवा से रहा। सर्व सेवा संघ ने अपना जो हाल किया, उसे देखते हुए गांधी आज होते, तो संभवतः इसको भी भंग कर देते। गांधी ने संस्थाएं केवल सेवा कार्य के उद्देश्य से बनाईं, और इसलिए भी कि सेवाकर्मी संस्थाओं के कार्य से अपना जीवन भी चला सकें।

बेशक बंद पड़े गांधी विद्या संस्थान भूमि की कीमत करोड़ों में होगी, लेकिन उसके खुले रहने से ही समाज में फैले भ्रम को खाक में मिलाया जा सकता है। गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार देने का विवाद भी गांधी विचार से विमुख है। सरकारें सत्ता के ही काम में लगती हैं। समाज की अध्यात्म जागृति के लिए गीता प्रेस के योगदान को सभी मानते हैं। गांधी जी के पढ़े-लिखे को समझें, तो उनके मन में भी गीता प्रेस के योगदान के प्रति कोई संदेह नहीं दिखेगा। बेशक, गीता प्रेस के संपादक और गांधी जी के आध्यात्मिक विश्वास में फर्क रहा होगा, लेकिन अध्यात्म के प्रचार-प्रसार में गीता प्रेस के योगदान को गांधी जी भी नकार नहीं पाते। इसलिए भाजपा द्वारा गांधी को गीता प्रेस से और कांग्रेस द्वारा गीता प्रेस से गांधी को भिड़वाने का क्या औचित्य हो सकता है?

ऐसा क्यों होता है कि गांधी नाम को तो हम सब अपनाना चाहते हैं, लेकिन गांधी विचार को विवाद में पड़ने देते हैं। गांधी विचार पर विवाद के बजाय नए सिरे से विचार भी हो। सर्व सेवा और स्वयं सेवा का अंतर समझे बिना गांधी विचार को समझा नहीं जा सकता। सेवा भाव रहेगा, तभी सरकारें, संघ या संस्थाएं चलती रह सकती हैं।

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