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मंथन: गांधी परिवार और भाजपा का वर्चस्व, लेकिन बड़ा सवाल है सामर्थ्य का

Sun, 31 May 2026 07:51 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 31 May 2026 07:51 AM IST
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सार
भाजपा सरकार को हटाने की सामर्थ्य राहुल और प्रियंका गांधी में नहीं दिखती। सवाल यह है कि जब आर्थिक कुप्रबंधन, बेरोजगारी आदि पर असंतोष चरम पर होगा, तब कौन सा नेतृत्व बदलाव का विश्वास जगा पाएगा?
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Gandhi family and BJP dominate, but the bigger question is their strength.
गांधी परिवार और भाजपा का वर्चस्व - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

वर्ष 2024 के आम चुनावों के बाद मेरी मुलाकात कांग्रेस के एक युवा विधायक से हुई। उन्होंने मुझसे राहुल गांधी के लिए पांच सलाहें मांगीं। मैंने कहा कि मेरे पास केवल एक सलाह है-प्रियंका गांधी को वायनाड से लोकसभा चुनाव नहीं लड़ना चाहिए। साथ ही यह भी जोड़ा कि मुझे पूरा विश्वास है, इस सलाह को अनसुना कर दिया जाएगा।


इसमें कोई संदेह नहीं कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा ने उनकी विश्वसनीयता बढ़ाई और उन्हें जनता से जुड़े हुए नेता के रूप में स्थापित किया। लेकिन चुनावों के बाद कांग्रेस द्वारा फिर से एक पारिवारिक संस्था की तरह व्यवहार करने से यात्रा से मिले लाभ काफी हद तक बेकार हो गए। प्रियंका गांधी ने वायनाड की सीट जीती-जो उनके लिए उतनी ही सुरक्षित थी, जितनी अमित शाह के लिए गांधीनगर-प्रियंका ने बड़े दावे करते हुए कहा कि वह और उनके भाई देश को जोड़ रहे हैं, वह दक्षिण का प्रतिनिधित्व करती हैं और राहुल उत्तर का। संविधान की 75वीं वर्षगांठ पर संसद में हुई बहस के लिए कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को मुख्य वक्ता चुना, जबकि दादी ने आपातकाल लगाकर संविधान की भावना को नुकसान पहुंचाया था।


इसी बीच, आम चुनाव में कांग्रेस के 99 सीटें जीतने से राहुल गांधी के आस-पास मौजूद चाटुकारों के समूह को यह प्रचार करने का अवसर मिल गया कि वह अब ‘भविष्य के प्रधानमंत्री’ हैं। दिल्ली के कुछ बुद्धिजीवियों और पत्रकारों ने इन दावों को बढ़ावा दिया। हिंदुत्व-विरोधी रुख के कारण जिनकी छवि मजबूत मानी जाती थी, उनकी समझदारी शायद सत्ता के पास रहने के आकर्षण के मोह में धुंधली पड़ गई। लेकिन अब साफ दिख रहा है कि वह उत्साह समय से पहले पैदा हुआ था। कांग्रेस की कुछ राज्य इकाइयां, जैसे केरल अब भी संगठित हैं और कभी-कभार विधानसभा चुनाव जीतने की क्षमता रखती हैं, लेकिन देश के अधिकांश हिस्सों में पार्टी लगातार कमजोर होती गई है। राहुल गांधी इस गिरावट को रोक पाने में असफल रहे हैं।

द प्रिंट की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2008 से देश भर में कांग्रेस विधायकों की संख्या लगभग आधी रह गई है-यह 1204 से घटकर 676 पर आ गई है। मैं राहुल गांधी से मिल चुका हूं और पत्राचार भी कर चुका हूं, इसलिए जानता हूं कि वह व्यक्तिगत रूप से एक सज्जन इन्सान हैं। इस सीमित परिचय के बिना भी मुझे उनके प्रति सहानुभूति होती, क्योंकि उन्होंने निजी जीवन में गंभीर त्रासदियां झेली हैं और 55 वर्ष की आयु में भी वह अपनी मां की इच्छा के एक साधन भर बने हुए दिखाई देते हैं। इसमें शायद ही कोई संदेह हो कि उन्होंने सोनिया गांधी के कहने पर राजनीति में प्रवेश किया और उनके कहने पर ही कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे हैं।

राहुल गांधी में अनुशासन, गंभीरता और ठोस अनुभव-तीनों की कमी दिखाई देती है। जब वह किसी महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाते भी हैं, जैसे चुनाव आयोग के पक्षपातपूर्ण रवैये का सवाल, तो उसे लगातार और व्यवस्थित तरीके से आगे नहीं बढ़ाते। कभी-कभार ‘वोट चोरी’ पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर देते हैं और उसके बाद यूरोप या लैटिन अमेरिका की यात्रा पर निकल जाते हैं। वास्तव में, अपने 22 वर्षों के राजनीतिक जीवन में केवल भारत जोड़ो यात्रा के कुछ महीनों के दौरान ही राहुल गांधी ने ऐसा दिखाया कि वे उस प्रकार का निरंतर और केंद्रित परिश्रम कर सकते हैं, जैसा भाजपा के नेता लगातार करते रहते हैं।

राहुल गांधी में गंभीरता की कमी उनके प्रतीकात्मक और दिखावटी तौर-तरीकों में भी झलकती है। 2004 में सांसद बनने से पहले राहुल गांधी क्या काम करते थे, यह वास्तव में कोई नहीं जानता। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के 10 वर्षों के शासनकाल में भी उन्होंने कभी मंत्री पद स्वीकार नहीं किया। ऐसे में भारतीय मतदाता क्यों भरोसा करें कि वे इतने विशाल, विविधतापूर्ण और चुनौतीपूर्ण भू-राजनीतिक परिस्थितियों वाले देश के प्रभावी प्रधानमंत्री साबित होंगे? राहुल गांधी में अपनी पिछली गलतियों से सीखने की स्पष्ट कमी दिखाई देती है। 2019 में ‘चौकीदार चोर है’ अभियान बुरी तरह उल्टा पड़ा था, फिर भी वे आज भी प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत हमले करते रहते हैं। कांग्रेस के भीतर बहुत-से लोग इन आलोचनाओं को स्वीकार करते हैं, लेकिन गांधी परिवार के प्रति आजीवन निष्ठा के कारण उनका मानना है कि अब राहुल की जगह उनकी बहन प्रियंका गांधी को ‘भावी प्रधानमंत्री’ के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यह सही है कि प्रियंका गांधी हिंदी में अपने भाई की तुलना में कहीं बेहतर वक्ता हैं और हिंदी देश के बहुत बड़े हिस्से द्वारा समझी जाती है। लेकिन वे भी वंशवाद से मिलने वाले विशेषाधिकार के बोझ से मुक्त नहीं हैं, बल्कि संभव है कि मतदाताओं को आकर्षित करने में वे अपने भाई से भी कम सफल साबित हों। जिस एकमात्र अवसर पर प्रियंका गांधी ने किसी चुनाव अभियान का नेतृत्व किया-2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में-कांग्रेस का वोट शेयर मात्र 2.27 प्रतिशत रहा।

हाल के विधानसभा चुनावों से एक दिलचस्प और शायद अनदेखा सबक भी मिलता है। मतदाताओं ने वंशवादी राजनीति के प्रति नकारात्मक संकेत दिया। असम में कांग्रेस अभियान का नेतृत्व तरुण गोगोई के बेटे द्वारा किए जाने से भाजपा को लाभ मिला। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी द्वारा अपने भतीजे अभिषेक को आगे बढ़ाने से भी भाजपा को फायदा हुआ। तमिलनाडु में स्टालिन द्वारा अपने बेटे उदयनिधि को प्रमुखता देने से विजय को मदद मिली, जबकि केरल में विजयन द्वारा अपने दामाद को आगे बढ़ाने का लाभ कांग्रेस को मिला। इसमें कोई संदेह नहीं कि मई 2014 के बाद गणराज्य की इस गिरावट के मुख्य जिम्मेदार नरेंद्र मोदी, अमित शाह और उनकी पार्टी भाजपा हैं।

लेकिन अब यह भी उतना ही स्पष्ट हो चुका है कि सत्ता प्राप्त करने और उसे मजबूत बनाए रखने की उनकी कोशिशों में-चाहे जानबूझकर या अनजाने में-सोनिया गांधी, राहुल गांधी और उनके आसपास मौजूद चाटुकारों ने भी सहयोगी की भूमिका निभाई है। इस समय मोदी के नेतृत्व में भाजपा अजेय दिखाई देती है। दुर्भाग्य से राहुल या प्रियंका गांधी के बारे में ऐसा कहना कठिन है। यह पूरी तरह संभव है कि आज जो अजेयता का माहौल भाजपा को घेरे हुए है, वह आने वाले वर्षों में टूट जाए। सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था अव्यवस्था का शिकार है, नीट घोटाला इसका एक उदाहरण है। केंद्र सरकार की आर्थिक कुप्रबंधन की कीमत अब साफ दिखाई देने लगी है। 2029 के आम चुनाव के करीब आते-आते अधिक हिंदू मतदाता यह समझ सकते हैं कि मुसलमानों के प्रति घृणा फैलाकर महंगाई, सम्मानजनक रोजगार की कमी और अपने बच्चों के असुरक्षित भविष्य जैसी समस्याओं की भरपाई नहीं की जा सकती।

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के मीम्स की सफलता संकेत देती है कि बहुत-से युवा भारतीय अब सत्तारूढ़ दल के झूठ और प्रचार को समझने लगे हैं। सवाल यह है कि जब यह असंतोष और गहरा होगा, तब कौन इसे एक प्रभावी राजनीतिक चुनौती का रूप देगा? कौन-से नेता देशभर के मतदाताओं को प्रेरित कर पाएंगे। यह संभावना बहुत कम दिखाई देती है कि यह भूमिका राहुल और प्रियंका गांधी निभा पाएं।
 
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