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नीतियों की बुनियाद: पखवाड़े से हिंदी को बाहर निकालिए... तभी सही मायने में अपना स्थान ग्रहण कर पाएगी भाषा
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हिंदी दिवस (सांकेतिक)
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अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी
विस्तार
पितरों को समर्पित सनातन परंपरा का श्राद्ध पक्ष हिंदू मान्यता के अनुसार, शुभ कार्यों के लिए वर्जित है। लेकिन संविधान सभा में श्राद्ध पक्ष में भी बहसें हुईं और फैसले भी हुए। वर्ष 1949 में आठ सितंबर से 22 सितंबर के बीच श्राद्ध पक्ष था। इसी पखवाड़े में महज ढाई दिनों की बहस के बाद हिंदी को राजभाषा स्वीकार किया गया। लगता है कि शुभ कार्यों के लिए वर्जित श्राद्ध पक्ष में हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने का जो शुभ कार्य हुआ, उस पर अशुभ छाया पड़ गई। वास्तविकता के धरातल पर वैधानिक दर्जे के लिए जूझती हिंदी को देखकर ऐसी सोच विकसित होना स्वाभाविक है।
जिस तरह श्राद्ध पक्ष में हर बार पितरों को याद किया जाता है, उसी तरह हिंदी के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। श्राद्ध पक्ष के साथ ही तकरीबन हर साल हिंदी पखवाड़ा आता है। हिंदी को लेकर सरकारी दफ्तरों में नव उत्साह का संचार हो जाता है। वाद-विवाद, टाइपिंग, निबंध लेखन, आशु लेखन, भाषण आदि की प्रतियोगिताओं के चलते सरकारी दफ्तर हिंदीयाना रौनक से भर जाते हैं। कुछ लोगों को पुरस्कार मिलता है और कार्यालय के हर व्यक्ति के लिए चाय-नाश्ते का इंतजाम हो जाता है। इस तरह पखवाड़े भर तक हिंदी का एक तरह से तर्पण होता है और फिर दफ्तरी दुनिया अपने पुराने ढर्रे पर फिर से लौट आती है, जिसकी कल्पना 1835 में मैकाले ने की थी।
हिंदी का भविष्य कैसा होगा, इसे समझने के लिए 14-15 अगस्त, 1947 की दरम्यानी रात को हुए कार्यक्रम को देखना होगा। ‘ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी’ भाषण ने ही तय कर दिया कि भारत में हिंदी का भविष्य क्या होने वाला है। तर्क हो सकता है कि नेहरू का मशहूर भाषण अंग्रेजी में इसलिए हुआ, क्योंकि दुनिया को बताना था कि हजार साल से चली आ रही गुलामी की बेड़ियों को भारत ने काट डाला है। यह ठीक है कि तब दुनिया की निगाह भारत पर थी, लेकिन दुनिया हिंदी में दिए भाषण का अनुवाद करा सकती थी। नियति के साथ समझौते का सीधा प्रभाव भारत और भारतीयों पर पड़ना था, दुनिया पर नहीं। बेशक नियति के साथ भारत के समझौते की विलायती परत को भारतीय रंग देने की कोशिश अगले दिन गांधी ने जरूर की, जब उन्होंने एक विदेशी संवाददाता को भाषा को लेकर स्पष्ट संदेश दिया। तब उन्होंने कहा था, 'पूरी दुनिया को बता दो कि गांधी अंग्रेजी नहीं जानता।' गांधी की तमाम बातों के साथ उनके इस संदेश को भी भुला दिया गया।
तभी से सितंबर के पहले पखवाड़े या कुछ दफ्तरों में पूरे सितंबर हिंदी का तर्पण करने की परंपरा शुरू हो गई। हिंदी को किनारे रखने में द्रविड़ राजनीति की बड़ी भूमिका रही है। हालांकि हिंदी को लेकर बेहतर रूख बाकी दलों का भी नहीं रहा। भारतीय राजसत्ता के इतिहास में हिंदी को लेकर जमीनी स्तर तक प्रभाव डालने वाले कदम उठाने की कोशिश शायद ही नजर आती है। हिंदी को लेकर ज्यादातर रस्मी अंदाज में कदम उठाए गए। ठोस बदलाव लाने की कोशिश नहीं दिखती है। हिंदी को लेकर सरकारी दफ्तरों में एक निश्चित अवधि के लिए कार्यशालाओं का विधान है, जिनमें कुछेक कर्मचारियों के अलावा किसी की भागीदारी नहीं होती। अधिकारी तो हिंदी को लेकर होने वाली ऐसी बैठकों में जाना भी अपनी तौहीन समझते हैं।
हिंदी के बढ़ते प्रसार को लेकर हिंदी प्रेमी आए दिन खुश होते रहते हैं, लेकिन वह प्रसार राजकीय कम, लोकपक्षीय ज्यादा है। कॉरपोरेट जगत ने बाजार तक अपनी सीधी पहुंच बनाने के लिए हिंदी समेत भारतीय भाषाओं को अपना हथियार बना लिया है। लेकिन नीतियों, प्रशासन और ऐसे ही दूसरे कार्यों के लिए कॉरपोरेट जगत में हिंदी उतनी ही बेगानी है, जितनी संविधान के तहत कार्य करने वाली संस्थाओं और सरकारी दफ्तरों की दीवारों के पीछे है। इस तरह कह सकते हैं कि हिंदी कमाई की भाषा तो है, लेकिन उसे नियंत्रित करने वाली सोच की भाषा अंग्रेजी ही है। लोहिया के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन को समाजवादी खेमा बहुत शानदार मानता है, लेकिन लगता है कि इस आंदोलन ने हिंदी विरोधियों की कुंठा को अभिव्यक्त होने का जोरदार मौका दिया। इसी कुंठा की उपज है कि गैर-हिंदीभाषी राज्यों में हिंदी को लेकर तिरस्कार और अंग्रेजी के प्रति सम्मान दिखता है। लोहिया के आंदोलन ने द्रविड़ दलों में गहरे तक हिंदी को लेकर प्रतिक्रिया बोध को स्थापित किया। यह विडंबना ही है कि आज लोहिया के अनुयायी समाजवादी धारा के दल उन द्रविड़ दलों के साथ खड़े हैं, जो हिंदी को लेकर जहर उगलते हैं और वे चुप्पी साधे रखते हैं। आजादी के बाद की कांग्रेस न तो हिंदी समर्थक रही और न ही विरोधी। परिस्थिति और जगह के हिसाब से उसकी हिंदी नीति चलती रही। जबकि भाजपा ने मोदी-शाह के दौर में हिंदी को प्रतिष्ठित करने की कोशिश की, लेकिन नौकरशाही का रूख नहीं बदला। नौकरशाही का रवैया अब भी अंग्रेजी समर्थक ज्यादा है।
बहरहाल राजकाज की नीतिगत भाषा अब भी हिंदी ही है। संसदीय हिंदी समिति की सिफारिशें हों या फिर राजभाषा कानून के दूसरे प्रावधान, अब भी हिंदी के कथित उत्थान और विकास के लिए रस्म ही पूरी की जाती है। नीतियां अब भी अंग्रेजी में ही बनती हैं, और हिंदी या भारतीय भाषाओं में उनका अनुवाद परोसा जा रहा है। अनुवाद वाली भाषा के जरिये राजकाज को जमीनी हकीकत बनाया तो जा सकता है, लेकिन उस राजकाज में लोक की आत्मा नहीं रहती।
गांधी ने जब हिंद स्वराज में भावी स्वाधीन भारत के लिए हिंदी की कल्पना की थी, तो उसका उद्देश्य था, राजकाज और उसकी नीतियों में भारत की आत्मा को सहजता से शामिल करना। आज अगर राजकाज की नीतियां जमीनी हकीकत से दूर दिखती हैं, तो इसकी एक बड़ी वजह नीति निर्माण में लोक भाषाओं की अनुपस्थिति भी है।
ऐसे माहौल में हिंदी सिर्फ सालाना दफ्तरी रस्मों में सिमट कर रह जाती है। कार्यालय की हिंदी वह तब होगी, जब रोजाना उसके जरिये दफ्तरी कामकाज निबटाए जाएंगे। जब हिंदी में सोचा जाएगा, और उस सोच के आधार पर नीतियां बनेंगी, तभी उन नीतियों में राष्ट्रीय लोक की आत्मा होगी। यहां ध्यान रखना होगा कि हिंदी का मतलब सिर्फ हिंदी से नहीं है, बल्कि दूसरी भारतीय भाषाओं से भी है। भारतीय भाषाएं सहोदरी हैं। हिंदी को जब पखवाड़े की मर्यादा से बाहर निकाला जाएगा, तभी वह सही मायने में अपना स्थान ग्रहण कर पाएगी। तभी वह नीतियों की बुनियाद होगी, जिसमें भारतीय राष्ट्रीय लोक की आत्मा गहरे तक समाहित होगी।