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मौन हुए मनमोहन: अजब यकीन-सा उस शख्स के गुमान में था...अलविदा डॉक्टर साहब
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पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ।
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अमर उजाला
विस्तार
अमेरिकी डॉलर की कीमत अब 85 रुपये के करीब है। रुपये की यह ढलान रुकती नहीं दिखती। करेंसी की कीमत घटने-बढ़ने के अपने आर्थिक कारण हैं, लेकिन भारतीय राजनीति के लिए रुपये से रिश्ता बड़ा अतरंगी है। रुपये की गिरावट पर जो राष्ट्रवादी आग्रह कभी हुंकारते थे, वे आज मौन मुस्करा रहे हैं और जो उस वक्त रुपये के अवमूल्यन को जरूरी बताते थे, वे रुपये की उम्र का हिसाब बता रहे हैं।
भारत के आर्थिक पुनर्जीवन के पुरोधा डॉ. मनमोहन सिंह इस भारतीय राजनीति की रुपया ग्रंथि के केंद्र में रहे हैं। आर्थिक सुधारों का उद्घाटन रुपये के अवमूल्यन से ही हुआ था, यह डॉ. सिंह का ऐसा साहसी फैसला, जो रुकते-रुकते लागू हुआ। यह रुपये के एक नहीं, बल्कि दो अवमूल्यन थे, जिन्होंने भारत की आर्थिक किस्मत ही बदल दी। 1991 से आज तक डॉ. मनमोहन सिंह के अलावा भारत की शेष सियासत रुपये की कीमत को लेकर अजीब बौखलाहट में रही है। रुपये का अवमूल्यन डॉ. मनमोहन सिंह का सबसे बड़ा साहस था। मगर इसे समझने के लिए आजादी के बाद भारतीय रुपये के मूल्य निर्धारण के सनसनीखेज रोमांच से गुजरना होगा।
1947 में जाने तक अंग्रेज भारत में मौद्रिक प्रणाली बना चुके थे, जिसकी शुरुआत 1835 में क्वाइनेज कानून के लागू होने से हुई थी। आजादी के वक्त भारतीय रिजर्व बैंक विनिमय दर तय करने के लिए ‘पार वैल्यू’ प्रणाली का पालन कर रहा था। इस प्रणाली में मुद्रा की कीमत किसी दूसरी करेंसी या सोने से तय की जाती थी, रुपये की कीमत ब्रिटिश पाउंड पर आधारित थी, पाउंड की कीमत अमेरिकी डॉलर और डॉलर की सोने पर। वह गोल्ड स्टैंडर्ड का दौर था।
रिजर्व बैंक के आधिकारिक दस्तावेज के मुताबिक 1947 में करीब 4.15 ग्रेन सोना यानी लगभग 0.27 ग्राम सोना एक रुपये के बराबर था। तब एक ब्रिटिश पाउंड में तेरह रुपये आते थे। एक पाउंड करीब 2.73 अमेरिकी डॉलर का था। यानी एक डॉलर लगभग 4.76 रुपये का था। 1949 में रुपये का पहला तकनीकी अवमूल्यन हुआ। 1966 में पहला बड़ा नीतिगत अवमूल्यन, जो इंदिरा गांधी ने किया था। इनके बाद रुपया-सोना विनिमय दर क्रमश: 2.88 ग्रेंस और 1.83 ग्रेंस रह गई। पूरी दुनिया में जोरदार हंगामे और अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन व फ्रांस के टकराव के बाद 1971 में गोल्ड स्टैंडर्ड बिदा हुआ, लेकिन इससे भारत की मौद्रिक नीति में बहुत बड़ा तूफान आ चुका था।
आजादी के बाद भारत का निर्यात न के बराबर था। विदेशी मुद्रा के नाम पर बस विदेशी सहायता आती थी। व्यापार घाटा ऊंचा था। 1962 में चीन से युद्ध के बाद आर्थिक हालात खराब हो रहे थे। राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी बड़ी मुसीबत थी। 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के कारण रक्षा खर्च बेतहाशा बढ़ा। 1965 और 1966 में सूखा भी पड़ा। लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने कुछ ही महीने बीते थे। उन्हें उम्मीद थी कि मौद्रिक नीति बदलने से व्यापार घाटा कम होगा, तो विदेशी पूंजी भी आने लगेगी। वह छह जून, 1966 का दिन था, इंदिरा गांधी ने रुपये का 35.5 फीसदी अवमूल्यन कर दिया। अर्थव्यवस्था इस भूकंप के लिए तैयार नहीं थी। अंतरराष्ट्रीय सहयोग नहीं मिला। महंगाई बढ़ती चली गई। रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नुकसान कम करने की कोशिश की। इधर, 1971 में गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म हो गया। रुपये की कीमत ब्रिटिश पौंड से तय होती थी। दुनिया भर की मुद्राओं में भारी उतार-चढ़ाव हुए। भारतीय रिजर्व बैंक ने कुछ प्रमुख मुद्राओं का एक समूह बनाया, जिसके आधार पर रुपये की कीमत तय की जाती थी। यह प्रणाली 1975 से लागू हुई।
1966 का अवमूल्यन इंदिरा गांधी की साख पर भारी पड़ा था। इसके बाद आर्थिक नीतियों की दिशा पलट गई। लाइसेंस परमिट राज आ गया। एमआरटीपी एक्ट बना। निजी बैंकों में जमा धन को जनता तक पहुंचाने के वादे के साथ बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। पर भारतीय अर्थव्यवस्था अपने खोल में सिमटकर बुरी तरह पिछड़ गई। इसके खौफनाक तजुर्बे के बाद रुपये की विनिमय दर भारतीय राजनीति सबसे वर्जित विषय बन गई। 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो रहा था। भुगतान संतुलन का संकट था। 21 जून, 1991 को पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने। डॉ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बने। डॉ. सिंह मुतमइन थे कि रुपये का अवमूल्यन किए बिना आर्थिक सुधारों का नारियल नहीं फूटेगा। इधर, रुपये के अवमूल्यन को लेकर प्रधानमंत्री राव असहज थे या यों कहें 1966 में इंदिरा गांधी के अवमूल्यन की असफलता ने उन्हें डरा रखा था। 1991 के विदेशी मुद्रा संकट के बीच भारत के पास विकल्प सीमित थे। लंबी मशक्कत के बाद वित्त मंत्री डॉ. सिंह ने प्रधानमंत्री राव को रुपये के लगातार दो अवमूल्यनों पर राजी कर लिया। पहला एक जुलाई और दूसरा तीन जुलाई 1991 को होना था। रुपये की कीमत क्रमशः 7 व 9 फीसदी घटाई जानी थी। पहला अवमूल्यन तो ठीक-ठाक हो गया, पर प्रधानमंत्री राव इससे इतना डर गए कि 3 जुलाई की सुबह उन्होंने वित्त मंत्री डॉ. सिंह को बुला लिया। तत्कालीन मंत्री जयराम रमेश की किताब में इस किस्से का जिक्र है कि प्रधानमंत्री राव ने वित्त मंत्री डॉ. सिंह को निर्देश दिया कि अब दूसरा अवमूल्यन नहीं होगा।
डॉ. सिंह ने समझाने की भरसक कोशिश की, पर प्रधानमंत्री सहज नहीं हुए। अंततः प्रधानमंत्री के निर्देश पर तीन जुलाई को सुबह 9:30 बजे डॉ. सिंह ने रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर डॉ. सी. रंगराजन को फोन किया, ताकि अगला अवमूल्यन रोका जा सके, लेकिन तब तक देर हो गई थी। रिजर्व बैंक के पास दो अवमूल्यनों का आदेश पहले ही पहुंच चुका था। गवर्नर ने डॉ. सिंह को बताया कि सुबह नौ बजे रुपये के दूसरे और पहले से बड़े अवमूल्यन को लागू किया जा चुका है। डॉ. सिंह ने राहत की सांस ली और प्रधानमंत्री को फैसला सूचित कर दिया। उस वक्त तक यह रुपये का सबसे बड़ा नीतिगत अवमूल्यन था, वह भी सिर्फ 72 घंटों में। इस फैसले ने भारत को बदल दिया। अर्थव्यवस्था ने फिर पीछे पलटकर नहीं देखा। रुपये के अवमूल्यन के बाद संसद में लंबे समय तक प्रधानमंत्री राव व वित्त मंत्री डॉ. सिंह को अपनी ही पार्टी और विपक्ष की लानतें झेलनी पड़ी थीं। 1991 में रुपये के अवमूल्यन के बाद राज्यसभा में एक बहस हुई, जिसमें डॉ. सिंह का हस्तक्षेप ऐतिहासिक दस्तावेज है, उन्होंने कहा था कि मुद्रा विनिमय दर केवल एक मूल्य मात्र है, जिसका प्रतिस्पर्धात्मक होना जरूरी है। अंग्रेज भारत को प्राथमिक उत्पादों का निर्यातक बनाकर रखना चाहते थे, औद्योगिक उत्पादों का निर्यातक नहीं। इसलिए घरेलू मुद्रा को हमेशा ताकतवर रखने के संस्कार भर दिए गए। रुपये का संतुलित अवमूल्यन हमें प्रतिस्पर्धात्मक बनाता है, तो वह राष्ट्र विरोधी कैसे हो जाएगा? आज टूटते रुपये के बीच डॉ. मनमोहन सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए भाजपा और कांग्रेस रुपये के अवमूल्यन को लेकर अपने-अपने राजनीतिक अतीत याद करना चाहेंगी? ‘अजब यकीन-सा उस शख्स के गुमान में था, वो बात करते हुए भी नई उड़ान में था।’ -ताबिश कमाल, ...अलविदा डॉक्टर साहब