फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Forests start burning even before summer, effective management is necessary for protection

वनाग्नि: गरमी से पहले ही धधकने लगे जंगल, रक्षा के लिए जरूरी है प्रभावी प्रबंधन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी

Sat, 22 Feb 2025 06:56 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Sat, 22 Feb 2025 06:56 AM IST
विज्ञापन
सार
उत्तराखंड में वनाग्नि ने फरवरी में ही अपना प्रचंड रूप दिखाना शुरू कर दिया है। इसके प्रभावी प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीकों के साथ स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
loader
Forests start burning even before summer, effective management is necessary for protection
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

भारत में छिटपुट घटनाओं के साथ ही वनाग्नि का सीजन गत नवंबर में शुरू हो चुका था, जिसका चरमकाल अब फरवरी से शुरू हो रहा है। वन सर्वेक्षण विभाग के अनुसार, इस साल अब तक वनाग्नि की घटनाओं में कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड शीर्ष पर चल रहे थे, लेकिन फरवरी शुरू होते ही उत्तराखंड ने इन राज्यों पर बढ़त ले ली है। वनाग्नि हमारे देश में वनों के क्षय के प्रमुख कारणों में से एक है। इससे बहुमूल्य वन संसाधन और कार्बन स्टॉक नष्ट हो जाते हैं। यह आपदा छोटे और रेंगने वाले जीवों के लिए विनाशकारी साबित होती है। यह पर्यावरण के लिए बहुत बड़ी क्षति है। वनों को धरती का फेफड़ा माना जाता है। जब फेफड़ा ही जलने लगे, तो धरतीवासियों की सांसों की कल्पना ही की जा सकती है!



भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल वन क्षेत्र का 36 प्रतिशत भाग बार-बार लगने वाली आग के प्रति संवेदनशील पाया गया है। इसके अलावा, चार प्रतिशत वन क्षेत्र अत्यधिक अग्नि संभावित और छह प्रतिशत वन क्षेत्र बहुत अधिक अग्नि संभावित हैं। देश के एक दर्जन से अधिक राज्यों में हर साल वनाग्नियां बड़े क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं। भले ही अब वन राज्य क्षेत्र से हटकर समवर्ती सूची में आ गए हैं, फिर भी वनों की सुरक्षा का मुख्य दायित्व राज्य सरकारों का ही है। केंद्र सरकार केवल आर्थिक मदद और अनुसंधान के लिए टेक्निकल सपोर्ट और सूचना आदि ही दे सकती है। लेकिन राज्य सरकारें कितनी चिंतित हैं, यह जानने के लिए जब हम 71 प्रतिशत वनावरण वाले उत्तराखंड के वन विभाग के वनाग्नि डैशबोर्ड पर जाते हैं, तो विभाग वनों और खासकर वृक्ष निधि के प्रति तो गंभीर नजर आता है, पर कुल पर्यावरण और वन्यजीव सुरक्षा के प्रति उसकी चिंता कहीं नजर नहीं आती। इस डैशबोर्ड के अनुसार, एक नवंबर, 2024 से छह फरवरी, 2025 तक वनाग्नि की 16 घटनाएं हुई हैं, जिससे 35.1 हेक्टेयर वन क्षेत्र जला है, जिसमें 2.5 हेक्टेयर पर पौधारोपण प्रभावित होने के साथ कुल 36,900 रुपये की हानि हुई। लेकिन वन्यजीवों की कोई हानि नहीं हुई। हैरानी की बात है कि इतना बड़ा वन क्षेत्र जल गया, मगर एक चींटी तक नहीं मरी, जबकि वनों में असंख्य जीव पाए जाते हैं, जिनमें कीट, रीढ़धारी, अरीढ़धारी, सरीसृप और अन्य कई प्रजातियां शामिल हैं। ये सभी जैव विविधता बनाए रखने और पारिस्थितिक संतुलन स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


वनाग्नि वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की हानि, मृदा क्षरण और जल संकट को बढ़ाती है। वनाग्नि के कारण भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित होती हैं, जो जलवायु परिवर्तन की गति बढ़ाती हैं। पेड़-पौधे और वन्यजीवों के जलकर नष्ट होने से जैव विविधता को भारी क्षति होती है। कई दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियां समाप्त होने के कगार पर आ जाती हैं और पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ जाता है। वनस्पति और जीव एक-दूसरे के पूरक होते हैं। इसलिए वनाग्नि के नुकसान में केवल पेड़ों की क्षति नहीं, बल्कि संपूर्ण पर्यावरण के नुकसान को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इस संकट से निपटने, इसकी रोकथाम और प्रभावी प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीकों, सटीक निगरानी प्रणाली और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed