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अर्थव्यवस्था: रेटिंग एजेंसियों की मनमानी पर लगाम के लिए वित्तीय संस्थानों को होना पड़ेगा एकजुट

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सार
अब समय आ गया है कि क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की मनमानी और विफलता रोकने के लिए सभी वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं, वित्तीय संस्थान, नियामक निकाय साथ आएं और महत्वपूर्ण कदम उठाएं।
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Financial institutions collectively take action to curb arbitrariness of rating agencies on economy
Fitch Ratings - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

कुछ दिन पहले ग्लोबल रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने भारत की संप्रभु क्रेडिट रेटिंग (एससीआर) पर एक बड़ी घोषणा करते हुए भारत की रेटिंग को बीएए3 पर बरकरार रखा है और देश की दीर्घकालिक स्थिति को स्थिर रखा है। रेटिंग की घोषणा करते हुए मूडीज ने संतुलित टिप्पणी करते हुए कहा है कि पिछले सात से दस वर्षों में भारत की संभावित आर्थिक प्रगति की दर में कमी देखी गई है। लेकिन आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर काफी तेजी से विकास करेगी। यह खबर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भले ही ज्यादा उत्साहवर्धक न हो, पर सुकून देने वाली हो सकती है। क्योंकि किसी भी देश की रेटिंग का उस देश में आने वाले विदेशी निवेश पर प्रभाव पड़ता है। विदेशी निवेशक उसी को देखकर निवेश बढ़ाते या घटाते हैं, साथ ही विदेश से लिए जाने वाले कर्ज की ब्याज दरें भी उस पर निर्भर करती हैं।



कहने को मूडीज, फिच, स्टैंडर्ड ऐंड पूअर, जैसी स्वायत्त निजी क्षेत्र की स्वतंत्र रेटिंग संस्थाएं हैं, पर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को हिलाने में इनका एक बयान ही काफी है। यही कारण है कि समय-समय पर इन संस्थाओं की कार्यशैली, मानकों, रेटिंग के तरीकों पर सवाल उठते रहे हैं। वर्ष 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की विफलता के सबसे प्रमुख उदाहरणों में से एक है। एनरॉन स्कैंडल (2001) सभी को याद है, जिसने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया था। इसके अलावा ग्लोबल क्रेडिट संकट (2002) और यूरोपीय संप्रभु ऋण संकट (2010-12) के दौरान भी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को यूरोपीय ऋण संकट के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था।


अभी हाल ही में भारत के बड़े औद्योगिक समूह अडानी ग्रुप के वित्तीय संकट के दौरान भी इन रेटिंग एजेंसियों की भूमिका संदिग्ध रही है। इसके अलावा भारत में सत्यम घोटाला, पीएनबी संकट, आईएल ऐंड एफएस जैसे वित्तीय संकट इन रेटिंग एजेंसियों की विफलता का ही परिणाम हैं। ये तो मात्र कुछ उदाहरण हैं, जिनमें क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां वित्तीय उत्पादों, निगमों और यहां तक कि पूरे देशों सहित विभिन्न संस्थाओं की साख का सटीक और समय पर आकलन प्रदान करने में विफल रही हैं।

इसके अलावा हजारों ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे, जहां रेटिंग एजेंसियों की धोखाधड़ी या विफलता के कारण निवेशकों को लाखों करोड़ का नुकसान झेलना पड़ा है। ये क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां किसी भी देश के प्रति जवाबदेह नहीं हैं और न ही उनकी कार्यप्रणाली पारदर्शी है। फिर भी इनका विश्व अर्थव्यवस्था पर कड़ा नियंत्रण है, क्योंकि उनकी रेटिंग के परिणामस्वरूप किसी भी देश से पूंजी का पलायन हो सकता है। करीब 95 फीसदी बाजार केवल तीन क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (एस ऐंड पी, मूडीज और फिच) द्वारा नियंत्रित है। इन चिंताओं को दूर करने के लिए कई नियामक सुधार भी पेश किए जा चुके हैं, लेकिन इन एजेंसियों का राजनीतिक, पूंजीपति आधिपत्य इतना मजबूत है कि अब तक कोई सकारात्मक सुधार संभव नहीं हो पाया है।

अब समय आ गया है कि इन रेटिंग एजेंसियों की मनमानी और विफलता रोकने के लिए सभी वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं, वित्तीय संस्थान, नियामक निकाय साथ आएं और महत्वपूर्ण कदम उठाएं। इन एजेंसियों के काम का स्तर उच्च बनाने, वित्तीय निष्पादन और निवेशकों की सुरक्षा में सुधार के लिए इन एजेंसियों का विनियमित करना बहुत आवश्यक है। साथ ही इन एजेंसियों की कानूनी जवाबदेही भी बढ़ाई जानी चाहिए। प्रौद्योगिकी की मदद से पूरी तरह से पारदर्शी इनपुट और आउटपुट के साथ ऐसा ओपन सोर्स मॉडल विकसित किया जाए, जिससे हितों के टकराव पर रोक लगने के साथ गुणवत्ता व पारदर्शिता बढ़ने में मदद मिले। आज समय की मांग है कि सभी वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं एक साथ आएं और इन निजी रेटिंग एजेंसियों पर निर्भर होने के बजाय, अपना खुद का नियामक आयोग बनाते हुए रेटिंग तंत्र विकसित करें।
-केसी त्यागी पूर्व सांसद, एवं बिशन नेहवाल आर्थिक चिंतक हैं।

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